भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

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नाथ निरंजन की आरती नाथ निरंजन आरती साजै । गुर के सबदूं झालरि बाजै ॥ टेक ॥ अनहद नाद गगन में गाजै । परम जोति तहां आप विराजै ॥ १ ॥ दीपक जोति अखंडत बाती । परम जोति जगै दिन राती ॥ २ ॥ सकल भवन उजियारा होई । देव निरंजन और न कोई ॥ ३ ॥ अनत कला जाकै पार न पावै । संष मृदंग धुनि बेनि बजावै ॥ ४ ॥ स्वाति बूंद लै कलस बंदाऊँ । निरति सुरति ले पहुप चढ़ाऊँ ॥ ५ ॥ निज तत नांव अमूरति मूरति । सब देवां सिरि उदबुदि सूरति ॥ ६ ॥ आदिनाथ नाती मच्छेन्द्रनाथ पूता । आरती करै गोरष अवधूता ॥ ७ ॥ [ गोरखबानी पद—६२ ]