भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

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विशेष—सांख्यदर्शन ने आत्म की असंगता का प्रतिपादन किया है—असंगता का तात्पर्य है सर्वात्मस्वरूपावस्थान, जो सिद्धसिद्धान्त है। महर्षि कपिल का वचन है : असङ्गोऽयं पुरुष इति ॥ ( सांख्यदर्शन १ । १५ ) न्यायदर्शन में दुःख की आत्यन्तिक निवृत्ति अथवा अभाव ही स्वरूपस्थिति- अपवर्ग अथवा निःश्रेयस या ब्रह्मप्राप्ति है, जड़ तथा चेतन का विवेक (तत्त्वज्ञान) ही दुःखनिवृत्ति का साधन है, जिससे स्वरूप-स्थिति सिद्ध होती है। दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदन्तराभा- वादपवर्गः ।' ( न्यायदर्शन १ । १ । २ ) जयन्त भट्ट ने भी न्यायवादी महर्षि गौतम के मत की पुष्टि की है। स्वरूपेण व्यवस्थानमतो मोक्ष : ( न्यायमञ्जरी ) वैशेषिक-दर्शन में आत्मा के शाश्वत अखण्ड स्वरूप का ही प्रतिपादन किया गया है। महर्षि कणाद का कथन है। सदकारणवन्नित्यम् ( वैशेषिकदर्शन ४ । १ । १ ) पूर्वमीमांसक महर्षि जैमिनि ने एक परमात्मा को ही सर्वोपरि कहा है। 'एकत्वेऽपि परम् ।' ( पूर्वमीमांसासूत्र २ । ४ । १३ ) इसी तरह वेदान्तदर्शन में महर्षि व्यास ने आत्मा के स्वरूप-प्रतिपादन में कहा है। तस्य च नित्यत्वात् । ( वेदान्तसूत्र २ । ४ । १६ ) इस तरह अत्याश्रमी योगी अवधूत सर्वथा आत्मस्वरूप में स्वस्थ होता है। १५० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति