भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

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परमेश्वर की स्वच्छन्द सृजनेच्छा या इच्छा से शासित होती है। यह सर्वथा निर्विवाद है कि एकही परमात्मा अपनी असीम आध्यात्मिक शक्ति के द्वारा इन समस्त विभिन्नताओं के रूप में अभिव्यक्त होकर उनमें रमण करता है । शिवशक्ति की ब्रह्माण्ड और पिण्ड से प्रापंचिक आत्माभिव्यक्ति की प्रक्रिया व्यक्तियों में आनन्दमय आध्यात्मिक चेतना और अस्तित्व के समस्त स्तरों की आध्यात्मिकता और एकता के प्रकट होनेपर पूर्ण हो जाती है, इसकी सिद्धि तत्वज्ञानी योगियों के जीवन में होती है । सिद्धसिद्धान्त में योगसिद्धि के लिये मन, बुद्धि आदि सभी आध्यात्मिक सत्तायें हैं। योगी का लक्ष्य एक आत्मा को समस्त प्रकार के शरीर में देखना और समस्त प्रापंचिक सत्ताओं के मौलिक आध्यात्मिक स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करना है। यही पिण्ड, प्रापंचिक सत्ता तथा ब्रह्माण्ड-व्यवस्था का मौलिक ज्ञान है। ज्यों-ज्यों योग विज्ञानी अपनी आन्तरिक शक्तियों को उत्तरोत्तर उन्नत करने वाले चक्रों, आधारों आदि को कुण्डलिनी-जागरण, नादानुसन्धान तथा प्राणसाधना और मन के उन्मनीकरण द्वारा सक्रिय अथवा उर्ध्वमुख करता है, त्यों-त्यों उसे ऐसा प्रतीत होता है कि उसका व्यष्टिपिण्ड ( शरीर ) शुद्ध आध्यात्मिक चेतना के प्रवाह में स्थूलता और भौतिकता से ऊपर उठकर अधिक तेजस्वी रूप में आध्यात्मिक स्वरूप में प्रतिष्ठित होता जा रहा है। जब व्यावहारिक चेतना यथेष्ट शुद्ध और आलोकित हो जाती है, तब पूर्ण का प्रत्येक अंश में पूर्ण रूप में अनुभव किया जाता है । सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड-व्यवस्था प्रत्येक पिण्ड में अनुभवगम्य हो जाती है और समस्त व्यष्टि-पिण्डों की मौलिक एकता स्वतः अभिव्यक्त हो उठती है । योगी की दृष्टि वस्तुओं के धरातल का ही स्पर्श कर नहीं लौटती, वह तो समस्त वस्तुओं की आत्मा में, चिन्मय सत्ता में प्रवेश करती है। उसके लिये ब्रह्माण्ड में स्थित सूर्य, चन्द्र, लोक-लोकान्तर, द्वीप, सागर, नक्षत्र आदि व्यष्टि-पिण्ड में आध्यात्मिक धरातल पर सच्चिदानन्दस्वरूप में आभासित होते हैं। पांचभौतिक व्यष्टिशरीर में ही व्यावहारिक रूप से अनन्त शाश्वत ब्रह्माण्ड-व्यवस्था के दर्शन किये जा सकते हैं। योगदृष्टि की प्राप्ति होनेपर योगी स्वयं को विराट् पुरुष के रूप में अनुभव करने लग जाता है । योगी विभिन्न स्वरूप में अभिव्यक्त परमात्मा को और समस्त लोकों को अपने भीतर प्रत्यक्ष देखता है और ब्रह्माण्डदर्शन का आनन्दोपभोग करता है। वह जाति, वर्ग, सम्प्रदाय, वर्ण आदि से ऊपर उठकर अपने व्यष्टिपिण्ड में सभी को एकात्मभूत समझता है । 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में गोरखनाथजी ने स्वयं अपना अनुभव व्यक्त करते हुए कहा है कि इस शरीर में जो सुख है, वही स्वर्ग है और जो दुःख है, वही [ ६