सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनरक है। सकाम कर्म ही बन्धन का कारण है। संकल्परहितता और निर्विकल्पता ही मुक्ति है। यद्यपि अज्ञानी इस निर्विकल्पता को निद्रारूप मानते हैं, तथापि वह अखण्ड आत्मबोधरूप स्थिति है, इस बोध-स्थिति में जागते रहना ही जीवन्मुक्ति है। योगी इस जीवन्मुक्ति में निरन्तर रमण कर समष्टि-पिण्ड—ब्रह्माण्ड और व्यष्टिपिण्ड—शरीर में तात्विक एकात्मकता का रसास्वादन करता है। यत्सुखं तत्स्वर्गं, यद्दुःखं तन्नरकं, यत्कर्मतद्वन्धनं, यन्निर्विकल्पं तन्मुक्तिः, स्वरूपदशायां निद्रादौ स्वात्मजागरः शान्तिर्भवति । एवं सर्वदेहेषु विश्वरूपपरमेश्वरः परमात्माऽखण्डस्वभावेन घटे घटे चित्स्वरूपो तिष्ठति ।। एवं पिण्डसंवित्तिर्भवति । ( सिद्धसिद्धान्तपद्धति ३।१३ ) असीम, अखण्ड, निरंजन परमेश्वर प्रत्येक शरीर में विद्यमान है, यही परम सद्विवेक अथवा महायोगज्ञान है। हमारे नाथयोग में जीवात्मा का शिव और शक्ति के साथ योगज्ञानपूर्वक अभेद होना ही समरसरूप मोक्ष कहा जाता है। 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में परमात्मा की निजाशक्ति की महिमा का विलक्षण विवेचन हमारे महायोगी गोरखनाथ ने किया है। यह परमेश्वर की स्वकीया शक्ति है। यह तत्वतः परमकैवल्यस्वरूपिणी महामाया है, मोक्षदायिनी परमेश्वरी है। सिद्धसिद्धान्त के अन्तर्गत शिव को शक्ति की आत्मा कहा जा सकता है और शक्ति शिव का अभिव्यक्ति-माध्यम है। शिव के पारमार्थिक स्वरूप में निहित शक्ति एक अनन्त और शाश्वत रूप में सक्रिय ऊर्जा है। शिव शक्ति की आत्मा है तो शक्ति शिव का शरीर है। शरीर का तात्पर्य आकार से है। शिव शक्ति का पारमार्थिक रूप है तो शक्ति शिव का प्रापंचिक स्तर है। शिव से भिन्न और स्वतंत्र शक्ति का अस्तित्व ही नहीं है। महायोगी गोरखनाथजी ने अपनी 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' रचना में कुण्डलिनी के जागरण और महत्ता पर मौलिक प्रकाश डाला है। शरीर में कुण्डलिनी अप्रबुद्ध और प्रबुद्ध रूप में विद्यमान है। मूलाधार में स्थित कुण्डलिनी जबतक योगसाधना के द्वारा प्रबुद्ध नहीं की जाती, तबतक देहासक्त संसार के विषयभोगों में आबद्ध लोगों के लिये यह शोक, मोह, चिन्ता व्यापार आदि के द्वारा बन्धन- कारिणी है। जबतक यह मूलाधार में प्रसुप्त है, अधोमुखी है, तबतक प्राणियों को जन्म, मरण के फल से प्रभावित करती रहती है। प्रबुद्ध कुण्डलिनी जब समुत्थित होकर सहस्रार का भेदन कर परमशिव में अन्तर्लीन हो जाती है, तब वह योग- १० ]