भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

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सिद्ध पुरुष के जन्म-मरण दुःखरूप फलों को देनेवाले कर्म ( के प्रभाव ) और मन के विकारों को नष्ट करने में समर्थ होती है । समस्त जागतिक बन्धनों-अविद्या- अन्धकार के परिणामों और विपाकों का प्रबुद्ध कुण्डलिनी के ब्रह्मरन्ध्र में प्रवेश करने पर अन्त हो जाता है । योगी पूर्णकाम और शिवपद में स्वस्थ हो जाता है, वह परमपद में अलख निरंजन की ज्योति से महिमान्वित हो उठता है । गोरखनाथ ने कहा है :- सा विमर्शरूपिणी योगिनः स्वस्वरूपमवगच्छन्तीति सुप्रसिद्धा । ( सिद्धसिद्धान्तपद्धति ४ । १५ ) यह कुण्डलिनी समस्त कार्यों के ऊपर विद्यमान है, यह विमर्शरूपविद्या है, यह प्रबुद्ध होने पर योगियों को आत्मा के स्वरूप का व्यापक ज्ञान करा देती है । योगी की दृष्टि में यही आत्मदर्शन है । यद्यपि कुण्डलिनी एक है पर स्थान और स्थूल-सूक्ष्मभेद से अधः, मध्य और ऊर्ध्व कही गयी है । गोरखनाथजी ने कुण्डलिनी- जागरण के द्वारा परमपद की प्राप्ति का संकेत किया है :- मध्यशक्तिप्रबोधेन अधः शक्तिनिकुञ्चनात् । ऊर्ध्वशक्तिनिघातेन प्राप्यते परमं पदम् ॥ ( सिद्धसिद्धान्तपद्धति ४ । १६ ) हमारे नाथयोग में शक्ति के अभ्युत्थान से परमपद में योगसाधक का प्रतिष्ठित होना ही उसकी महती योगसिद्धि है। जिस महामाया-मूलशक्ति अथवा मूलमाया के बल पर परमेश्वर जगत् की रचना करता है, वह मूलाधार में स्थित है, उस शक्ति को जगाकर उसके ध्यान से जब योगी सम्पूर्ण चैतन्यस्वरूप में आत्माभिव्यक्त हो उठता है, तब वह सृजन और सहार में परमेश्वर की ही तरह समर्थ हो जाता है । उसकी सम्पूर्ण सत्ता, अहंता, क्रियाशक्ति, सच्चिदा- नन्दपरमेश्वर की महाशक्ति में अन्तर्लीन हो उठती है । मूलाधार में स्थित कुण्डलिनी समस्त प्राणिमात्र का जीवनाधार है, यह प्रत्येक जीवात्मा के शरीर में व्यापक और अतिसूक्ष्म है । यह अपने स्थूल रूप में स्थूल सृष्टि की रचनात्मक शक्ति है, इसलिये इसे सृष्टि-कुण्डलिनी कहा जाता है । मध्यमा कुण्डलिनी चिद्रूपिणी है । यही जीव का वास्तविक स्वरूप है । यह शक्ति चंचल मन और इन्द्रियों के विषय-भोगों के रस में रमण करने वाले जीवात्मा को अपने निर्मल, शुद्धस्वरूप में—आत्मचैतन्य-प्रकाश में स्थापित कर देती है । [ ११