सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहमारे सिद्धामृतमार्ग में इसी सिद्धान्त का पोषण है कि जो मन्त्रोपदेश या करूणावलोकन मात्र से शिष्य को परम विश्राम में अधिष्ठित कर देता है, वही सद्गुरु है । गोरखनाथजी की शिक्षा है :- अतएव परमपदप्राप्त्यर्थं सद्गुरुः सदावन्दनोयः । ( सिद्धसिद्धान्तपद्धति ५।७० ) यह निर्विवाद है कि गुरु के कृपापात्र शिष्य की सम्पूर्ण मानसिक वृत्तियों का आत्मस्वरूप में लय हो जाने पर उसे स्वतः जीवात्मा-परमात्मा के ऐक्य का रसानुभव सुलभ हो जाता है। सांसारिक बाह्य विषयों में आसक्त बुद्धि में शान्ति और मुक्ति की अमृतमन्दाकिनी की अजस्र धारा प्रवाहित हो उठती है। पिण्डपद- सामरस्य का आनन्द प्राप्त हो जाता है । गोरखनाथजी ने 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में अवधूत योगी के लक्षण का निरूपण कर संन्यास की वास्तविक गरिमा प्रकाशित की है। उनकी योगदृष्टि में अवधूत योगी वह है, जो सामरस्य के आदर्श को पूर्णतया सिद्ध कर लेता है और स्वसंवेद्य परमतत्त्व का रसास्वादन करता रहता है। अवधूत योगी अहंकार, अज्ञान, संकीर्ण दृष्टिकोण तथा समस्त इच्छाओं, वासनाओं, चिन्ताओं, दुःखों और द्वन्द्वों तथा बन्धनों से मुक्त होकर आत्मस्वरूप में निरन्तर प्रवृत्त रहता है। वह उन्मनी समाधि की अवस्था में परमपद का प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त कर लेता है, निरपेक्ष अनुभूति के प्रकाश से अपनी चेतना के बौद्धिक, मानसिक और प्राणीय स्तरों को भी प्रकाशित कर देता है। सांसारिक जीवन और लोकव्यवहार के सामान्य कार्यों को करते हुए भी उसकी समाधि-अवस्था निर्विकार और सहज बनी रहती है। ऐसा अवधूत योगी वास्तव में नाथ कहा जाता है। वह स्वामी होता है, सद्गुरु होता है। गोरखनाथजी साक्षात् शिव अवधूत थे, उनका योगदर्शन वास्तव में पूर्ण आत्मज्ञान के आलोक से सम्पन्न मनःस्थिति में स्वयं उनके तथा अन्य सिद्ध महा- योगियों के द्वारा अनुभूत सत्य के प्रकाश में निम्नस्तरीय सामान्य मानवीय अनुभूतियों तथा चेतना के सामान्य ऐन्द्रिक स्तर एवं पूर्ण ज्ञानालोकित स्तर के मध्यवर्ती असामान्य स्तर की रहस्यमयी अनुभूतियों की व्याख्या प्रस्तुत करता है। गोरखनाथजी की दृष्टि में अवधूत योगी वह है, जो अविद्या, अस्मिता, रागद्वेष, अभिनिवेश, पंच क्लेशों के पाश-बन्धन से तथा बाल्य, यौवन और जरा, जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति के प्रपंच से मुक्त होकर मन को उन्मन कर अलख निरंजन में रम जाता है। गोरखनाथजी के वचन हैं :- १४ ]