भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

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अवधूततनुर्योगी निराकारपदे स्थितः । सर्वेषां दर्शनानाञ्चस्वस्वरूपं प्रकाशते ॥ ( सिद्धसिद्धान्तपद्धति ६ । ३३ ) गोरखनाथजी ने सहज सिद्धमत का ही आश्रय ग्रहण करने का उपदेश दिया है । तस्मात् सिद्धमतं स्वभावसमयं धीरः सदा संश्रयेत् । ( सिद्धसिद्धान्तपद्धति ६ । ७५ ) जब योग की साधना में शुद्ध स्वरूपानन्द का बोध हो जाता है, तब अविद्यारूप भ्रान्ति और सुख-दुःखादि द्वन्द्वात्मक प्रपंचों की स्वतः सहज निवृत्ति हो जाती है। योगी निरतिशयानन्द की प्राप्ति करता है । नाथयोगियों में व्यवहृत 'आदेश' शब्द का गोरखनाथजी ने बड़ा उपयुक्त आशय व्यक्त किया है । आत्मा, परमात्मा और जीवात्मा की अभेदता ही सत्य है, इस सत्य का अनुभव या दर्शन हमारे सिद्धामृत मार्ग में 'आदेश' कहलाता है । व्यावहारिक चेतना की आध्यात्मिक प्रबुद्धता जीवात्माऔरआत्मा तथा परमात्मा की अभिन्नता के साक्षात्कार में निहित है । इन तथ्यों का ध्यान रखते हुए जब योगी एक-दूसरे का अभिवादन करते हैं अथवा गुरुपद में प्रणत होते हैं तो 'आदेश- आदेश' का उच्चारण कर जीवात्मा, विश्वात्मा और परमात्मा के तादात्म्य का स्मरण कराते हैं । आत्मेति परमात्मेति जीवात्मेति विचारणे । त्रयाणामैक्यसंभूतिरादेश इति कीर्तितः ॥ आदेश इति सद्वाणीं सर्वद्वन्द्वक्षयापहाम् । यो योगिनं प्रतिवदेत् सयात्यात्मानमैश्वरम् ॥ ( सिद्धसिद्धान्तपद्धति ६ । ६४-६५ ) 'आदेश' के उच्चारण मात्र से ही समस्त दुःखों का नाश हो जाता है । 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' परमेश्वरसम्बन्धी सिद्धयोगशास्त्र है, यह महादिव्य, अलौकिक सिद्धसिद्धान्त का योगदर्शन है । इसके पाठ से समस्त सन्देहों का नाश हो जाता है और सिद्धामृतमार्गसम्मत योगसाधन-प्रक्रिया का रहस्य स्वतः प्रकाशित हो उठता है । गोरखनाथजी ने कहा है :-- [ १५