सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजब ( सृष्टि की उत्पत्ति होने के पहले ) कोई कर्ता नहीं है, न ( कार्य के अभाव में ) कारण है और न कुल ( शक्ति-क्रम—उपास्य-उपासक-भाव ) तथा अकुल (योगक्रम--योज्य-योजक-भाव का व्यवहार है, तब ब्रह्म अव्यक्त ( द्वैताद्वैत- विवर्जित — स्वसंवेद्य ) नाम से परे होता है । ( उस महाप्रलय-काल में कार्य- कारणरहित, शक्तियुक्त निष्काम सृष्टि-संचालनकर्मरत और शक्ति से अतीत अपने स्वरूप में लय को प्राप्त ब्रह्म अव्यक्त और नामरहित होता है, वह नाम-रूप से अतीत अभिव्यक्त रहता है ) ॥ ४ ॥ विशेष अतएव कर्त्तृत्व - कार्य-कारण से रहित, कुल-अकुल के व्यवहार से परे महाप्रलयकाल में ब्रह्म सम्पूर्ण अव्यक्त—स्वरूप में स्वस्थ होकर नाम से अतीत - रहित होता है। द्वैताद्वैतविवर्जित ब्रह्म ( शून्यातीत ) अव्यक्त स्वरूप में कार्यकारण से परे होकर विद्यमान रहता है । परब्रह्म को निजा आदि पाँच शक्ति और उनके गुण अनामेति स्वयमनादिसिद्ध एकमेवानादिनिधनं सिद्ध- सिद्धान्तप्रसिद्धं तस्येच्छामात्रधर्माधर्मिणी निजा शक्तिः प्रसिद्धा ॥ ५ ॥ परब्रह्म परमेश्वर नाम से रहित है, वह स्वयं ( स्वाभिव्यक्त ) है, अनादिसिद्ध ( सजातीय-विजातीय भेद से रहित ) है, वह एक मात्र सत्स्वरूप है, वह जन्म-मरण से रहित है, सिद्धों का यह सिद्धान्त ( निश्चयात्मक मत ) है कि ब्रह्म स्वसंवेद्य ( अलख निरञ्जन ) है, उस ब्रह्म की निजा शक्ति ( सकल- लोककल्याण की ) इच्छामात्र धर्मवाली तथा जीवमात्र के सुख-दुःख आदि भोगों के निमित्त सृष्टि और प्रलय में संकोच-विकास-धर्म वाली ( निग्रहानुग्रहमयी ) प्रसिद्ध है ॥ ५ ॥ तस्योन्मुखत्वमात्रेण पराशक्तिरुत्थिता ॥ ६ ॥ ( निजाशक्ति-सहित ) परब्रह्म ( शिव ) के मानसोल्लास —सृष्टि की इच्छा के उत्साह मात्र से (शिव में ही शयन करने वाली अथवा लय को प्राप्त होने वाली) पराशक्ति (जगदीश्वरी गौरी पार्वती) जाग्रत होती है —अभिव्यक्त होती है ॥ ६ ॥ तस्य स्पन्दनमात्रेण अपराशक्तिरुत्थिता ॥ ७ ॥ ( आदिनाथ परमशिव में पराशक्ति अधिष्ठित है । ) इस पराशक्ति के स्वाभिव्यक्त परब्रह्म परमेश्वर ( शिव ) में स्पन्दन मात्र से अपरा शक्ति ( क्रिया सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ३