सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रधान शक्ति ) समुत्थित ( जाग्रत ) होती है। ( इस अपरा शक्ति से समलंकृत हिरण्यगर्भ, ब्रह्म आदि नामों की प्रतिष्ठा है। यह शक्ति सृष्टिकर्म में परमेश्वर की सहायता करती है ) इससे परमेश्वर जगत् की रचना करने में समर्थ होते हैं ॥ ७ ॥ ततोऽहंतार्थमात्रेण सूक्ष्मशक्तिरुत्पन्ना ॥ ८ ॥ उस अपरा ( सिसृक्षामयी ) शक्ति से परम शिव में अहंकार मात्र से ( कि मैं सृष्टि की रचना में समर्थ हूँ ) सूक्ष्म शक्ति ( विमर्शशक्ति ) उत्पन्न होती है। ( यही भगवती उमास्वरूपिणी औपनिषद ब्रह्मविद्या है।) सृष्टि के आरम्भ में अन्य की अभिव्यक्ति न रहने से एकमात्र परमेश्वर का ही अहंकार ( जिसमें समस्त जगत् सूक्ष्म रूप से विलीन रहता है ) अभिव्यक्त हो उठता है ॥ ८ ॥ ततो वेदनशीला कुण्डलिनी शक्तिरुद्गता ॥ ९ ॥ उसके बाद वेदनशील ( तत्वज्ञानस्वरूपिणी जगदीश्वरी ) कुण्डलिनी ( आत्म- विमूढ़ के लिये बन्धनकारिणी और योगाभ्यास द्वारा प्रबुद्ध होने पर मोक्षदायिनी ) उदित होती है। यह शक्ति चिद्रूपिणी, चैतन्यस्वरूपिणी तथा अनिर्वचनीय महिमामयी परमेश्वरी माया है। इस महाकुण्डलिनी शक्ति के उदय से परमशिव का साक्षात्कार सहज सम्भव हो जाता है ॥ ९ ॥ नित्यता निरञ्जनता निष्पन्दतानिराभासता निरुत्थानता इति पञ्चगुणा निजाशक्तिः ॥ १० ॥ (आदिनाथ की) निजाशक्ति के पाँच गुण (धर्म-अवस्था) हैं, पहली नित्यता है, भूत, भविष्य, वर्तमान, तीनों काल में भी इसका नाश कभी नहीं होता है। दूसरी अवस्था निरञ्जनता है, इसमें काम, क्रोध, लोभ, मोह, रागद्वेषादि ( अञ्जन ) का सर्वथा अभाव है, यह निर्दोष है। तीसरी अवस्था निष्पन्दता है, यह स्थिर अथवा सर्वत्र व्याप्त है, इसका किसी भी समय, किसी भी स्थिति में अभाव अथवा लोप नहीं है, यह नित्य होने से स्थिर है, स्पन्दनशून्य है। चौथी अवस्था निराभासता है, यह भेदरहित—प्रतिबिम्बरहित है। आभास प्रतिबिम्ब है। यह एकमात्र आदिनाथ का स्वरूप है, द्वैत-अद्वैत के भेदभाव से ४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति