सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअतीत अथवा विवर्जित अथवा विलक्षण है, यह शिव में उपाधिगत नहीं, स्वगत है। पाँचवीं अवस्था निरुत्थानता है, परिणामरहित है, इसमें सृष्टि का भान नहीं रहता है। शिव में यह उसी तरह अभिन्न अथवा स्वरूपस्थ है, जिस तरह चन्द्रमा में चांदनी अभिव्यक्त है। ये पाँचों गुण अथवा धर्म आदिनाथ परमेश्वर में सदा नित्य विद्यमान हैं ॥ १० ॥ अस्तिता, अप्रमेयता, अभिन्नता, अनन्तता, अव्यक्तता इति पञ्चगुणा पराशक्तिः ॥ ११ ॥ परमेश्वर शिव की पराशक्ति सृष्टि के पहले उनमें अन्तर्लीन रहती है। इसके पाँचगुण (धर्म अथवा अवस्था) हैं। पहली अवस्था अस्तिता है, यह शक्ति सनातनी अथवा अव्यय है। दूसरी अवस्था अप्रमेयता है। यह परिच्छेद- रहित होने से स्वरूपसिद्ध है। इसकी तीसरी अवस्था अभिन्नता है। यह परम शिव से नितान्त अभेद है। इसमें जगत् का भेद नहीं है, जगत् की सृष्टि के पहले से ही यह परमेश्वर मे अभिन्न रहती है। चौथी अवस्था अनन्तता है। यह ध्वंस और प्रागभाव से सर्वथा अतीत होने से अविनाशी और नित्य है। यह शक्ति नित्य और व्यापक है। पाँचवीं अवस्था अव्यक्तता है। यह सूक्ष्मता की प्रतिपादिका है, जिस तरह दूध में घी सूक्ष्म रूप से है ही, इसी तरह जगत्-कार्य के लिये पराशक्ति इस अवस्था में परम शिव में अव्यक्त रहती है—सूक्ष्म रूप से अन्तर्लीन रहती है, अतएव अव्यक्तता गुण या धर्म से विद्यमान है ॥ ११ ॥ स्फुरता, स्फुटता, स्फारता, स्फोटता स्फूर्तिलेति पञ्च- गुणाऽपरा शक्तिः ॥ १२ ॥ आदिनाथ परमेश्वर की अपरा शक्ति के पांच गुण हैं। पहलागुण स्फुरता है— क्रियारूपमयी होने से इसमें संचलन है। दूसरा गुण स्फुटता है, शिव के अभिव्यक्त अथवा प्रकाशित—द्योतित होने की यह माध्यम-शक्ति है। तीसरा गुण स्फारता है, शिव की क्रिया-शक्ति--संचालन अथवा सगमन-प्रक्रिया में वह सहायता करती है। चौथा गुण स्फोटता है, यह रूपाभिव्यक्ति, शिव के कर्तृत्व-धर्म को प्रकाशित अथवा प्रकट करती है। पाँचवां गुण स्फूर्तिता है, यह सृष्टि-कार्य में परमेश्वर को उत्साहित करती है ॥ १२ ॥ सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ५