भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

पृष्ठ 50, कुल 222 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 50

अनादि पिण्ड के पाँच तत्व और पचीस गुण अपरम्परं परमपदं शून्यं निरञ्जन परमात्मेति ॥ १७ ॥ इन पाँच शक्तियों के ( शक्तिचक्र-क्रम से ) प्रकट पाँच अधिष्ठाता देव अपरम्पर सदाशिव—निजा शक्ति के अधिष्ठाता ), परमपद (परमेश्वर—परा शक्ति के अधिष्ठाता ), शून्य ( रुद्र—अपरा शक्ति के अधिष्ठाता), निरंजन ( विष्णु, रागद्वेषादिरहित, ज्ञानशक्तिविशिष्ट सूक्ष्मशक्ति के अधिष्ठाता ) और परमात्मा (ब्रह्मा—कुण्डलिनी शक्ति के साक्षी जगत् के स्रष्टा) हैं ॥ १७ ॥ अपरम्परात् स्फुरतामात्रमुत्पन्नं परमपदाद् भावनामात्र- मुत्पन्नं शून्यात्स्वसत्तामात्रमुत्पन्नं निरञ्जनात् स्वसाक्षात्कार- मात्रमुत्पन्नं परमात्मनः परमात्मोत्पन्नः ॥ १८ ॥ अपरम्पर ( सदाशिव ) से स्फुरता .( उत्साह ), परमपद ( परमेश्वर ) से भावना ( समालोचनात्मक—क्रियासामान्य ज्ञान ), शून्य ( रुद्र ) से स्वसत्तामात्र, निरञ्जन ( विष्णु ) से स्वसाक्षात्कारमात्र ( अहंकार ) और परमात्मा ( ब्रह्मा ) से सृष्टि के उत्पादन के लिये उपयोगी ( बीजरूप ) समष्टिपिण्ड उत्पन्न हैं । यह समष्टिपिण्ड अस्मदादि व्यष्टिपिण्डों की अपेक्षा उत्कृष्ट है, इसलिये यह परमात्मा कहा गया है ॥ १८ ॥ अकलंकत्वमनुपमत्वमपारत्वममूर्तत्वमनुदयत्वमिति पञ्च- गुणमपरम्परम् ॥ १६ ॥ अपरम्पर ( सदाशिव ) के पाँच गुण हैं । पहला गुण अकलंकत्व ( दोष- शून्यता—रागद्वेषादि का अभाव ) है । दूसरा गुण अनुपमत्व ( सजातीयतारहित— अद्वितीय सत्तामात्र ) है । तीसरा गुण अपारत्व असीमत्व ( अनन्तता ) है । चौथा गुण अमूर्तत्व ( परिच्छेदरहितता—अमापकत्व ) है—'न तस्य प्रतिमा अस्ति' । ( श्वेताश्वतर ४ । १६ ) पाँचवां गुण अनुदयत्व ( प्रागभावशून्यता ) है, क्योंकि वह उत्पत्ति से परे है, सर्वव्यापक, अकाल और सनातन—शाश्वत है ॥ १६ ॥ निष्कलत्वमणुतरत्वमचलत्वमसंख्यत्वमनाधारत्वमिति पञ्च- गुणं परमपदम् ॥ २० ॥ ८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति