भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

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मदीय ( यह वस्तु मेरी ) है, शरीर, इन्द्रियादि मेरे हैं । तीसरी वृत्ति मम सुख— इस सुख से मेरा ही एकमात्र सम्बन्ध है--इस भावना की प्रतिपादिका है । चौथी वृत्ति मम दुख— मैं इससे दुःखी हूँ, इस दुःखपरक अवस्था से सम्बन्ध स्थापित करती है । पाँचवीं वृत्ति ममेदम् — यह पदार्थ मेरा है, ये मेरे सम्बन्धी हैं, आदि की परिचायिका है ॥ ४७ ॥ मतिर्धृतिस्मृतिस्त्यागः स्वीकार इति पञ्चगुणं चित्तम् ॥ ४८ ॥ चित्त की पाँच वृत्तियाँ हैं । पहली वृत्ति मति है, मति का आशय है इच्छा । दूसरी वृत्ति धैर्य—उत्साह है । तीसरी वृत्ति स्मृति है, संस्कार-मात्र से उत्पन्न होने वाले ज्ञान को स्मृति कहा गया है । चौथी वृत्ति त्याग है । उत्तम पात्र को अपनी प्रिय से प्रिय वस्तु का उसकी सुखेच्छा की तृप्ति के लिये दान कर देना ही त्याग है । पाँचवीं वृत्ति स्वीकार है, इसका आशय है दाना- नुकूल और ग्रहणानुकूल के व्यापार-अनुक्रम से किसी पदार्थ या भाव को स्वीकार करना ॥ ४८ ॥ विमर्शः शोलनं धैर्यं चिन्तनं निःस्पृहत्वमिति पञ्चगुणं चैतन्यमेवमन्तःकरणगुणाः ॥ ४६ ॥ चैतन्य के पाँच गुण अथवा धर्म हैं। पहला गुण विमर्श है । प्रमाण के माध्यम से वस्तु का विचार ही विमर्श है । शीलन दूसरा धर्म है, इसका आशय है तत्परतापूर्वक बार-बार पदार्थ अथवा भाव के गुण- दोष की यथार्थज्ञानप्राप्ति में लगे रहना । तीसरा धर्म धैर्य है । बड़ी-से-बड़ी विपत्ति के आ जाने पर भी कार्य से विमुख न होना तथा शरीर-मन और इन्द्रियों को निरन्तर उत्साहित करते रहना ही धैर्य है । चौथा गुण चिन्तन है । इसका आशय है बार-बार अपने द्वारा सम्पादित होने वाले कार्य के प्रति सावधान रहना । पाँचवां गुण निःस्पृहत्व हैं । संसार के विषय-भोगों में मन को आसक्त न होने देना तथा उसको विवेक-वैराग्यपूर्वक आत्माभिमुख रखना ही निःस्पृहता है । ये ही अन्तःकरण के पचीस गुण हैं । इस तरह सूक्ष्म-शरीर का वर्णन किया गया ॥ ४६ ॥ १८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति