भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

पृष्ठ 61, कुल 222 में से

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पृष्ठ 61

कुलपंचक सत्त्वं रजस्तमः कालो जीव, इति कुलपञ्चकम् ॥ ५० ॥ सत्व, रज और तम ( तीनों गुण ) काल और जीव ( इन पाँचों ) की भाव, मन और बुद्धि और इन्द्रिय आदि के संचालन में प्रधानता रहती है । इस कारण ये पाँच कुल अर्थात् प्रधान कहे गये हैं ( योगतन्त्र में इन्हें कुलपंचक कहा गया है । ) ॥ ५० ॥ दया, धर्मः, क्रियाभक्तिः श्रद्धेति पञ्चगुणं सत्त्वम् ॥ ५१ ॥ सत्व गुण के पाँच कार्यरूप गुणों का वर्णन किया जाता है । पहला गुण दया—प्राणियों पर अनुग्रह करना है । दूसरा गुण धर्म है, जिससे सुख की प्राप्ति और श्रेय का अभ्युदय हो, वह धर्म है । तीसरा गुण क्रिया है, पूजा आदि सत्कर्म और पुण्याचरण तथा भगवत्प्रीत्यर्थ व्रतोपवास-अनुष्ठान आदि क्रिया है । चौथा गुण भक्ति है । परमेश्वर में भक्ति—प्रीति ही भक्ति है । भक्ति से परमेश्वर की शरणागति प्राप्त होती है । इससे योगी को समाधिसिद्धि होती है । महर्षि पतञ्जलि का अभिमत है : समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात् ॥ ( योगदर्शन २ । ४५ ) पाँचवां गुण श्रद्धा है । श्रद्धा से इस लोक के अतिरिक्त परलोक के अस्तित्व तथा स्वरूपावस्थानपरक आत्मज्ञान ( परमात्मा के प्रति विश्वास ) में निष्ठा होती है । सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः । निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् । तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् । सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ ॥ ( गीता १४ । ५–६ ) सत्वगुण निर्मलता के कारण प्रकाश करने वाला और विकार रहित होता है । यह जीवात्मा को सुख और ज्ञान के सम्बन्ध से प्रभावित करता है । गीता सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १६