सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
कुलपंचक सत्त्वं रजस्तमः कालो जीव, इति कुलपञ्चकम् ॥ ५० ॥ सत्व, रज और तम ( तीनों गुण ) काल और जीव ( इन पाँचों ) की भाव, मन और बुद्धि और इन्द्रिय आदि के संचालन में प्रधानता रहती है । इस कारण ये पाँच कुल अर्थात् प्रधान कहे गये हैं ( योगतन्त्र में इन्हें कुलपंचक कहा गया है । ) ॥ ५० ॥ दया, धर्मः, क्रियाभक्तिः श्रद्धेति पञ्चगुणं सत्त्वम् ॥ ५१ ॥ सत्व गुण के पाँच कार्यरूप गुणों का वर्णन किया जाता है । पहला गुण दया—प्राणियों पर अनुग्रह करना है । दूसरा गुण धर्म है, जिससे सुख की प्राप्ति और श्रेय का अभ्युदय हो, वह धर्म है । तीसरा गुण क्रिया है, पूजा आदि सत्कर्म और पुण्याचरण तथा भगवत्प्रीत्यर्थ व्रतोपवास-अनुष्ठान आदि क्रिया है । चौथा गुण भक्ति है । परमेश्वर में भक्ति—प्रीति ही भक्ति है । भक्ति से परमेश्वर की शरणागति प्राप्त होती है । इससे योगी को समाधिसिद्धि होती है । महर्षि पतञ्जलि का अभिमत है : समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात् ॥ ( योगदर्शन २ । ४५ ) पाँचवां गुण श्रद्धा है । श्रद्धा से इस लोक के अतिरिक्त परलोक के अस्तित्व तथा स्वरूपावस्थानपरक आत्मज्ञान ( परमात्मा के प्रति विश्वास ) में निष्ठा होती है । सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः । निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् । तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् । सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ ॥ ( गीता १४ । ५–६ ) सत्वगुण निर्मलता के कारण प्रकाश करने वाला और विकार रहित होता है । यह जीवात्मा को सुख और ज्ञान के सम्बन्ध से प्रभावित करता है । गीता सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १६
(१४।६) में कहा गया है--'सत्वं सुखे संजयति ।' (सत्व सुख में लगाता है ।) इन्द्रियों में चेतनता और विवेकशक्ति उत्पन्न होती है । 'सत्वात् संजायते ज्ञानम्' ( गीता १४।१७ ) – सत्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है ॥ ५१ ॥ दानं भोगः शृङ्गारो वस्तुग्रहणं स्वार्थसंग्रहणमिति पञ्चगुणं रजः ॥ ५२ ॥ रजोगुण से दान, भोग, शृङ्गार, वस्तुग्रहण और संग्रह में प्रवृत्ति होतो है । यह जीव को कर्म से वन्धनयुक्त करता है । रजोगुण रागरूप है । यह कामना और आसक्ति ( तृष्णा ) से उत्पन्न होता है । जीवात्मा इसके द्वारा कर्मफल की प्राप्ति की स्पृहा करता है । रजोगुण के बढ़ने पर लोभ, प्रवृत्ति, स्वार्थबुद्धि से कर्मों का सकाम भाव से आरम्भ, अशान्ति, विषयभोग की लालसा—ये सब उत्पन्न होते हैं । राजस कर्म का फल दुःख है । 'रजसस्तु फलं दुःखम् ।' (गीता १४।१६) रजोगुण से लोभ बढ़ता है । रजोगुण का पहला गुण दान है, भविष्य में अथवा जन्मान्तर में फल-प्राप्ति की कामना से देश-काल के अनुसार सत्पात्र का विचार कर यथाशक्ति धन अथवा पदार्थ प्रदान करना दान है । दूसरा गुण भोग है । सुन्दर रूप, रस, गन्ध शब्द, स्पर्शादि की कामना में प्रवृत्त होना भोग है । तीसरा गुण शृङ्गार है, मोक्ष-प्राप्ति के लिये नहीं, विषयभोग की इच्छा की पूर्ति के लिये शरीरादि को समलंकृत करना शृङ्गार है । चौथा गुण वस्तुग्रहण है । अपने भोग-सुख के लिये वस्तु के ग्रहण और संचय में आसक्त रहना वस्तुग्रहण है । पाँचवां गुण स्वार्थ-संग्रहण है । दूसरे की हानि होगी, दुःख होगा—इन बातों का विचार किये बिना अपने स्वार्थ की तृप्ति के लिये वस्तु और विषय- भोग में सहायक उपकरणों के संग्रह में अभिरुचिपूर्वक उन्हें सुरक्षित रखना ही स्वार्थ-संग्रहण है ॥ ५२ ॥ विवादः कलहः शोको वधो वञ्चनमिति पञ्चगुणं तमः । ५३ ॥ तमोगुण की पाँच वृत्तियाँ हैं । तमोगुण अज्ञान से उत्पन्न होता है । देहाभिमानियों को मोहग्रस्त कर प्रमाद, आलस्य और निद्रा से बन्धनमुक्त करता है । तमोगुण के बढ़ने पर अन्तःकरण और इन्द्रियों में अप्रकाश (अन्धकार) कर्तव्य में अप्रवृत्ति, मोहिनी प्रमादमयी वृत्तियों का जन्म होता है । तमोगुण से प्रमाद, मोह और अज्ञान उत्पन्न होते हैं । २० ] [ सिद्धसिद्धान्तप
प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च । ( गीता ५ । १७ ) तम का पहला गुण विवाद है । इससे व्यर्थ प्रलाप में समय निष्प्रयोजन बीत जाता है । तम का दूसरा गुण कलह है । तमोगुणी व्यक्ति अविवेकी होने से दूसरों से कलह करने में सुख मानता है । तम का तीसरा गुण शोक है । तम का चौथा गुण वध है । तमोगुणी व्यक्ति अपनी स्वार्थसिद्धि के लिये दूसरे प्राणी को मार डालने में संकोच नहीं करता है । तम का पाँचवां गुण वञ्चन है । तमोगुणी व्यक्ति दूसरों को ठगने में प्रवृत्त रहता है ॥ ५३ ॥ कलना, कल्पना, भ्रान्तिः प्रमादः अनर्थ इति पञ्चगुणाः कालः ॥ ५४ ॥ काल की पाँच अवस्थायें अथवा गुण हैं । पहली अवस्था कलना-एक, दो, तीन आदि की संख्या गिनना, आयु आदि की गणना करना है । दूसरी अवस्था कल्पना-अनेक वस्तु-रचना की सामर्थ्य है-वसन्त है, हेमन्त है-इत्यादि । तीसरी अवस्था भ्रान्ति है । बुढ़ापा, यौवन, वचपन आदि में परिवर्तन-निमित्तता भ्रान्ति है । चौथी अवस्था प्रमाद है । असावधानी में उत्पन्न कार्य में प्रवृत्ति— व्यर्थ आलस्य आदि में समय बिताना प्रमाद है । पाँचवीं अवस्था अनर्थ है । अनिष्ट कार्य में लगना अनर्थ का द्योतक है ॥ ५४ ॥ जाग्रत् स्वप्नः सुषुप्तिस्तुरीयातुर्यातीतमिति पञ्चगुणो जीवः ॥ ५५ ॥ जीव की पाँच अवस्थायें हैं । पहली जाग्रत् अवस्था है । स्थूल-शरीर में इन्द्रियों द्वारा कर्म होते रहने का भान अथवा ज्ञान जाग्रत् अवस्था है । दूसरी स्वप्न-अवस्था है । बाह्य इन्द्रियों के कार्यकलाप शान्त होने पर मन में ( अचेतावस्था में ) अनेक वस्तु आदि का व्यवहार होते रहना स्वप्नावस्था है । तीसरी सुषुप्ति-अवस्था है । इसमें बाह्य इन्द्रियों और मन के व्यापार-कार्य के निरोध से निद्रा की स्थिति ही सुषुप्ति है । चौथी तुर्यावस्था है । इसमें आत्मस्वरूपविषयक एकाग्रचित्तता बनी रहती है । आत्मस्वरूपविषयक मनोवृत्ति और द्वैतप्रपंच की अप्रतीति ही तुर्यावस्था का लक्षण है । पाँचवीं तुर्यातीत अवस्था में निर्विकल्प समाधि में जीव प्रतिष्ठित हो जाता है ॥ ५५ ॥ सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ २१
व्यक्तिपंचक और उसके पचीस गुण इच्छा, क्रिया, माया, प्रकृतिर्वागिति व्यक्तिपञ्चकम् ॥५६॥ सूक्ष्म-शरीर में जिन-जिन गुणों से व्यवहार का सम्पादन होता है, वे इच्छा क्रिया, माया, प्रकृति और वाक्-पाँच गुण हैं । जीव के उपभोगसाधन में ये व्यवहार में तत्पर रहते हैं, इन्हें व्यक्तिपंचक कहा जाता है ॥ ५६ ॥ उन्मादो, वासना, वाञ्छा, चिन्ता चेष्टेति पञ्च- गुणेच्छा ॥ ५७ ॥ इच्छा के कार्यभूत पाँच व्यापार-गुण हैं । पहला उन्माद है, इच्छा भंग होने पर उन्माद होता है । स्वकर्त्तव्य-निर्वाह में पहले किये गये कर्मों के संस्कार के अनुरूप शरीर, इन्द्रिय मन आदि को प्रवृत्त करना वासना है धन आदि पदार्थों की प्राप्ति की कामना वाञ्छा है । वासना और वाञ्छा यथाक्रम दूसरे और तीसरे गुण हैं। चौथा गुण चिन्ता है । इष्ट विषय के अन्वेषण की इच्छा चिन्ता है । पाँचवां गुण चेष्टा है, शरीर का व्यापार ही चेष्टा है, कार्य की पूर्ति में शरीर का प्रयासरत होना ही चेष्टा है ॥ ५७ ॥ स्मरणं उद्योगः कार्यं निश्चयः स्वकुलाचार इति पञ्चगुणा क्रिया ॥ ५८ ॥ क्रिया के पाँच गुण अथवा अवस्थायें हैं । संसार के व्यवहार में स्मृति-ज्ञान के उत्पादक व्यापार को स्मरण कहा जाता है । साधनजनक व्यापार को उद्योग कहा जाता है । घट-पटादि उत्पन्न करने वाला व्यापार ( मन की वृत्ति को क्रियात्मक रूप देना ) ही कार्य है । निश्चयात्मक ज्ञान को उत्पन्न करने वाली इन्द्रियादि तथा मन की क्रिया ही निश्चय है और अपनी कुलपरम्परागत मर्यादा के पालन में मन की प्रवृत्ति ही स्वकुलाचार है । ये ही पाँचों क्रिया के गुण हैं ॥ ५८ ॥ मदो, मात्सर्यं, दम्भः कृत्रिमत्त्वमसत्यमिति पञ्चगुणा माया ॥ ५६ ॥ २२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
माया के पाँच रूप हैं। पहला मद है। मद से युक्त प्राणी कहता है कि मैं ही बलवान हूँ, धनी हूँ, मेरे समान कोई दूसरा नहीं है। अपने सत्स्वरूप को इस तरह अज्ञान से आच्छादित करना मद है। दूसरा रूप मात्सर्य है, दूसरों की उन्नति देख कर उनके प्रति मन में द्वेष-भाव रख कर उनकी उन्नति से जलते रहना और उन्हें गिराने की चेष्टा में लगे रहना मत्सर है। सत् को छिपाकर असत् अथवा मिथ्या भाव दिखाकर दूसरों से अपनी प्रशंसा करवाने का भाव दम्भ है। यह माया का तीसरा गुण है। चौथा रूप कृत्रिमता—बनावट है और पाँचवां गुण माया का है असद् व्यवहार और मिथ्या भाषण, वचन आदि के द्वारा दूसरे को विमुग्ध कर असत्य-से अपना काम बनाना; असत्य ही मिथ्या आचरण है ॥ ५६ ॥ आशा तृष्णा स्पृहा काङ्क्षामित्येति पञ्चगुणा प्रकृतिः ॥ ६० ॥ (अन्तःकरण के स्वभाव को प्रकृति कहा जाता है।) प्रकृति के पाँच गुण हैं। पहला गुण आशा है। आगे प्राप्त होने वाली वस्तु के विषय में प्राप्ति की भावना आशा है। दूसरा गुण तृष्णा है। अपने पास भोग के समस्त साधन रहते हुए भी अधिक-से-अधिक साधनपदार्थ की प्राप्ति की कामना में प्रवृत्त रहना तृष्णा है। यह कभी जीर्ण नहीं होती। 'तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः' वचन पर भर्तृहरि ने वैराग्यशतक में पक्की छाप (मुहर) लगा दी है। तीसरा गुण स्पृहा है, अमुक वस्तु की प्राप्ति हो जाय, इस तरह की मनोवृत्ति स्पृहा है। चौथा गुण काङ्क्षा है, यह वस्तु सदा बनी रहे, कोई छीन न ले, ऐसी वृत्ति काङ्क्षा है। पाँचवां गुण मिथ्या है, न मिलने वाली वस्तु की प्राप्ति की इच्छा करना मिथ्या है ॥ ६० ॥ परा, पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी, मातृकेति पञ्चगुणा वाक् इति व्यक्तिपञ्चकः पञ्चविंशति गुणा ॥ ६१ ॥ अन्तः करण के व्यापारसञ्चालन में वाक्—वाणी का बड़ा महत्व है। वाक् के पाँच रूप हैं। पहला रूप परा है। यह वाणी मूलाधार-चक्र में रहती है और निर्विकल्प समाधि के द्वारा जानी जातीं है। इस वाणी में मन की गति नहीं है। वाक् का दूसरा रूप पश्यन्ती है। जब परावाक्—परावाणी नाभि-देश में सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ २३
आकर स्थूल रूप धारण करती है, तब यह पश्यन्ती वाणी हो जाती है। इसके साथ मनका सम्बन्ध भी रहता है। योगी सविकल्प समाधि में इसे जानते हैं। वाक् का तीसरा रूप मध्यमा है। पश्यन्ती वाणी ऊपर गति करती हुई जब हृदय में प्रवेश करती है और अकारादि वर्ण-समुदाय पदरूप धारण करती है, तब इसी का नाम मध्यमा हो जाता है। यही वाणी जब मस्तक से लौट कर कण्ठ और तालु आदि स्थानों में टकराती है, तब उससे प्रकट होने वाले शब्द की वाणी वैखरी कहलाती है। यह वाक् का चौथा रूप है। वाक् का पाँचवां रूप मातृका है। अकारादि वर्णों में शिवरूप मकारके अनुस्वार होने से 'अ आ इ ई' इत्यादि बीज-मन्त्ररूप वर्णमाला ही मातृका वाक् है। इस तरह व्यक्तिपञ्चक के पचीस गुणों—प्रकार आदि का वर्णन किया गया ॥ ६१ ॥ प्रत्यक्षकरणपंचक कर्म कामश्चन्द्रः सूर्योऽग्निरिति प्रत्यक्षकरणपञ्च- कम् ॥६२ ॥ कर्म, काम, चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि सुख-दुःख भोगने वाले शरीर की प्राप्ति के पाँच प्रधान कारण हैं। शुभ-अशुभ कर्म की अनुकूल वासना के द्वारा शरीर प्राप्त होता है। बिन्दुरूप शरीर का निमित्तकारण, कर्म और वासना है। यह संसार में अग्नि और चन्द्रमा के मेल से ही स्थित रहता है। सोमरस भोग्य है और अग्नि शोषक और भोक्ता है। एक के न रहने पर केवल मात्र दूसरे की प्रबलता या अधिकता से संसार और शरीर की स्थिति नहीं रह सकती, इसलिये दोनों का सामरस्य ही शरीर-प्राप्ति और उसकी स्थिति की दृष्टि से आवश्यक है। सोम से कुछ अग्नि-अंश अधिक रहने से अग्नि की विशिष्टता स्वीकृत है। यद्यपि सूर्य और अग्नि अन्यत्र एक ही तत्व के रूप में वर्णित हैं, पर सूर्य बारह कलात्मक, अग्नि दस कलात्मक है और सोम अथवा चन्द्रमा को सोलह कलात्मक परिलक्षित किया गया है। यह शरीर माता के रज और पिता के वीर्य से उत्पन्न होता है। रज सोमात्मक है, चन्द्रमारूप है और वीर्य सूर्य और अग्नि-तत्व रूप है। इस शरीर का उपादान कारण सूर्य, अग्नि और चन्द्रमा है तथा कर्म और काम निमित्त कारण हैं। कला का अर्थ है चित् से मिली हुई सत्त्वरूप शक्ति। यही प्रत्यक्षकरणपंचक है ॥ ६२ ॥ २४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
शुभमशुभं यशोऽपिकीर्तिरदृष्टफलसाधनमिति पञ्चगुणं कर्म ॥ ६३ ॥ शरीर की उत्पत्ति के निमित्तकारणरूप कर्म पाँच प्रकार के होते हैं। पहला शुभ कर्म है। यज्ञादि कर्म तथा स्वर्गादि प्राप्त कराने वाले सत्कर्म ही शुभ कर्म हैं। अशुभ कर्म वे हैं, जो निन्दित और असत्य तथा पापप्रेरित हैं। इनसे नरक आदि की प्राप्ति होती है। पुण्यादि कर्म से यश बढ़ता है और अकर्म अपकीर्ति प्रदान करने वाले कर्म हैं। जिन कर्मों के फल चर्मचक्षु--इन्द्रियजन्य ज्ञान के अप्रत्यक्ष हैं, वे अदृष्टफलसाधन कहे जाते हैं ॥ ६३ ॥ रतिः, प्रीतिः, क्रीड़ा, कामनाऽऽतुरतेति पञ्चगुणाः कामः ॥ ६४ ॥ विषय-भोग-सेवन-जन्य कर्म ही काम कहा जाता है। काम पाँच प्रकार का होता है। काम का पहला रूप रति है, स्त्री के प्रति रमणीयता की वृत्ति ही रति है। सुख-साधनों में अनुरक्ति ही प्रीति है। इन्द्रियों और मन को आनन्दित करने वाली रमणीय वस्तुओं को साधन बनाकर सुख-सम्पादन की क्रिया ही क्रीड़ा है, इस सम्बन्ध में नौका-विहार, कन्दुक उछालना आदि खेलों को दृष्टान्त रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। काम-सुख की प्राप्ति में निरन्तर स्पृहा रखना ही कामना है तथा भोग-सुख अथवा रमणीयता का आस्वादन शीघ्रातिशीघ्र हो, इस तरह की मनोवृत्ति ही आतुरता है ॥ ६४ ॥ उल्लोला, कल्लोलिनी,, उच्चलन्ती, उन्मादिनी, तरङ्गिणी शोषिणी, लम्पटा, प्रवृत्तिः, लहरी, लोला, लेलिहाना, प्रसरन्ती, प्रवाहा, सौम्या, प्रसन्नता, प्लवन्ती एवं चन्द्रस्य षोडशकला सप्तदशीकला निवृत्ति, साऽमृतकला ॥ ६५ ॥ चन्द्रमा की सोलह कलायें हैं। भोगप्रवृत्ति को बढ़ानेवाली, द्रवित करने वाली कला उल्लोला है। बड़े आकार की तरंगमयी कला कल्लोलिनी है, ऊपर को चलनेवाली, प्रवृत्त होनेवाली उच्चलन्ती है। विषयसुख के प्रति मन को उन्मादित करने वाली कला उन्मादिनी है, तरंगायित होने वाली कला तरंगिणी है, जल और रस को सुखाने वाली कला शोषिणी है, लम्पटा चारों ओर फैलती सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ २५
अथवा प्रसरित होती है, हर्षोत्पादिका कला का नाम प्रवृत्ति है, टेढ़ी-टेढ़ी गति वाली कला लहरी है। चञ्चल होने वाली कला का नाम लोला है, रसादि को चाटनेवाली कला लेलिहाना है। फैलनेवाली कला का नाम प्रसरन्ती हैं, चन्द्रकान्त आदि मणियों को द्रवित करने वाली कला का नाम प्रवाहा है, समस्त पदार्थों, औषधियों, लता-वृक्षादि को सोमरस से सिक्त करने वाली कला का नाम सौम्या है, सभी पदार्थों में निर्मलता स्थापित करने वाली कला का नाम प्रसन्ना है, उछल कर प्रवाहित होनेवाली कला का नाम प्लवन्ती है। चन्द्रमा में स्थायी रहने वाली, प्रलयकाल में भी अक्षुण्ण रहने वाली सोमरसमयी कला ( निजकला ) का नाम निवृत्ता है, यही अमृत कला है, जो सत्रहवीं कला कहलाती है ॥ ६५ ॥ विशेष—चन्द्रमा की इन समस्त कलाओं का सेवन लोकोत्तरानन्द की प्राप्ति में भी सार्थक है, केवल विषयेन्द्रिय-भोगजन्य तृप्ति में ही इनकी उपादेयता सीमित नहीं है, ये परमात्मप्रेम अथवा आत्मरस की तृप्तिस्वरूपिणी हैं। तापिनी, ग्रासिका, उग्रा, आकुञ्चनी, शोषिणी, प्रबोधिनी, स्मरा, आकर्षिणी, तुष्टिवर्धनी, ऊर्मिरेखा, किरणवती, प्रभावतीति द्वादशकला सूर्यस्य त्रयोदशी स्वप्रकाशता निजकला ॥ ६६ ॥ सूर्य की बारह कलायें हैं। तापिनी ताप पैदा करती हैं, ग्रासिका तम— अन्धकार का नाश करती है, उग्रा कला प्रखर होती है, आकुञ्चनी समेटने वाली, संकुचित करनेवाली कला है, कुमुदिनी आदि को संकुचित और आकुंचित करने वाली कलायें उग्रा और आकुंचिनी हैं। शोषिणी कला जल आदि को सुखाती है। प्रबोधिनी कला कमल आदि को खिलाती (विकसित करती) है। स्मरा कला स्मृति उत्पन्न करती है। आकर्षिणी कला भूमि आदि के जल को अपनी ओर खींचती है। प्राणिमात्र को संतुष्टि प्रदान करनेवाली कला तुष्टिवर्धिनी है। ऊर्मी रेखा कला प्राणियों की आयु का माप करती है। किरणों का विस्तार करनेवाली कला किरणवती है और प्रकाश करनेवाली कला का नाम प्रभावती है। सूर्य की तेरहवीं कला—निजकला स्वप्रकाशता है ॥ ६६ ॥ दीपका, राजिका, ज्वालिनी, विस्फुलिङ्गिनी, प्रचण्डा, पाचिका, रौद्री, दाहिका, रागिणी, शिखावतो इत्यग्नेर्दशकला २६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
एकादशो कला ज्योतिरिति प्रत्यक्षकरणगुणकला- समूहः ॥ ६७ ॥ अग्नि की दस कलायें हैं । दीपका कला दीप्त ( प्रकाशित ) करनेवाली कला है । राजिका कला शोभामयी करती है, ज्वाला कला ही ज्वालिनी है, विस्फुलिंग—चिनगारी प्रकट करनेवाली कला विस्फुलिंगिनी है । प्रचण्डकिरणों से युक्त कला ही प्रचण्डा है और जठरादि में भोज्य पदार्थों को पचानेवाली, वृक्षादि में फलों को रसमय करनेवाली कला ही पाचिका है । रौद्र स्वभाव की प्रतिपादिका कला रौद्रे है, जलाने वाली कला का नाम दाहिका है, रागिणी अग्नि की लाल ज्योति की प्रकाशिका है, ऊपर की ओर लौ धारण करनेवाली कला शिखावती है । अग्नि की निजकला ज्योति है । ( सूर्य, चन्द्र और अग्नि—शिव के त्रिनेत्र के वाचक हैं । ) इस तरह प्रत्यक्षकरणपंचक के गुण-समूह और कलाओं का वर्णन किया गया है ॥ ६७ ॥ दस प्रधान नाड़ी और उनके स्थान ग्रथ नाड़ीनां दश द्वाराणि । इडापिङ्गला नासाद्वारयोर्वहतः सुषुम्णा नाडी तु ब्रह्मदण्डमार्गेण ब्रह्मरन्ध्रपर्यन्तं वहति सरस्वती मुखद्वारे वहति पूषाऽलम्बुषा चक्षुर्द्वारयोर्वहतो गान्धारी हस्ति- जिह्विका च कर्णद्वारयोर्वहतः कुहूर्गुदाद्वारे वहति शंखिनी लिङ्गद्वारे वहति एवं दशद्वारेषु वहन्ति ॥ ६८ ॥ शरीर में ( प्राणवाहिनी ) दस ( प्रमुख ) नाड़ियों के दस द्वारों का वर्णन किया जाता है । नासिका के दोनों रन्ध्र ( द्वार ) से—बायें से इडा और दायें से पिंगला बहती है । सुषुम्णा नाड़ी ब्रह्मदण्डमार्ग ( मेरुदण्ड ) से ब्रह्मरन्ध्र तक बहती है और सरस्वती मुख-द्वार में बहती है । चक्षुद्वार—बायें नेत्र में गान्धारी और दक्षिण नेत्र में हस्तिजिह्विका नाड़ी बहती हैं, कानों के द्वार में— यथाक्रम पूषा और अलम्बुषा बहती हैं । शंखिनी नाड़ी लिंग द्वार में बहती है और गुदा द्वार में मूल नाड़ी बहती है । दसों द्वारों में दसों नाड़ियाँ बहती हैं ॥ ६८ ॥ सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ २७
विशेष—लिङ्ग से ऊपर और नाभि से नीचे पक्षी के अण्डे के समान समस्त नाड़ियों का उत्पत्तिस्थान मूलकन्द है । इसी मूलकन्द से बहत्तर हजार नाड़ियों की उत्पत्ति है । इनमें सर्वश्रेष्ठ सुषुम्णा है, सुषुम्णा से प्राण निकलने पर ब्रह्मलोक तक गति होती है और जीवात्मा मोक्षस्वरूप—परमेश्वर अलख निरञ्जन शिव में प्रतिष्ठित हो जाता है । दूसरी नाड़ियों से प्राण निकलने पर स्वकर्म के अनुसार जीवात्मा को स्वर्गादि लोकों की प्राप्ति होती है । योगशिखोपनिषद् में वर्णित नाड़ी-स्थिति-क्रम के अनुसार ही ( सिद्धसिद्धान्तपद्धति १ । ६८ में वर्णित ) नाड़ी-स्थिति का अर्थ किया गया है । गान्धारी हस्तिजिह्वा च तस्मान्नेत्रद्वयं गते । २१ ॥ पूषा चालम्बुषा चैव श्रोत्रद्वयमुपागते ॥ २२ ॥ सरस्वती तु या नाड़ी साजिह्वान्तं प्रसर्पति ॥ २३ ॥ ( योगशिखोपनिषद् ५ । २१-२३ ) दस वायु ( प्राण ) और उनके स्थान अथ दशवायवः । हृदये प्राणवायुरुच्छ्वासनिःश्वासकारो हकारसकारात्मकश्चास्यैवावस्थाभेदे हठयोग इति संज्ञा, 'हकारः कीर्त्तितः सूर्यष्ठकारश्चन्द्र उच्यते । सूर्याचन्द्रमसोर्योगाद् हठयोगो निगद्यते ॥' गुदेत्वपानवायू रेचक.कुम्भकपूरकश्च नाभौ समानवायुर्दीपकः पाचकश्च सर्वाङ्गे व्यानवायुग्र सनवमनजल्पकारश्च उदानः नागवायु सर्वाङ्ग व्यापकश्चाल- कश्च कूर्मवायुः कम्पकश्चचक्षुरुन्मेषकारकश्च कृकल उद्गारकः क्षुत्कारकश्चदेवदत्तो मुखविजृम्भकः धनञ्जयो नादघोषक इति दशवायववलोकनेन पिण्डोत्पत्तिर्नरनारीरूपः । ६८ ॥ शरीर में दस ( प्रधान ) वायु हैं । हृदय में प्राणवायु उच्छ्वास और निःश्वास का संचालन करती है । यही प्राणवायु हकार और सकारात्मक है । यह हकार की ध्वनि से बाहर जाती है, सकार की ध्वनि से भीतर आती है, यह हठयोग की स्थिति है । हकार सूर्य और ठकार चन्द्र कहा जाता है, हकार और ठकार का योग ही हठ ( प्राण )-साधना है । गुदादेश में अपान वायु रहती है, यह अपान २८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
२. द्वितीय-तृतीय उपदेश: पिण्ड-विचार एवं पिण्ड-संवित्ति (शरीरस्थ तीर्थ व देवता)
वायु रेचक, पूरक, कुम्भक की सामर्थ्य से युक्त होती है । ( प्राणवायु को शरीर में रोकती है और प्राणायाम के अभ्यास में सिद्धि प्रदान करती है । ) नाभि में समान वायु रहती है, यह जठरानल को दीप्त करती है और भोजन के रूप में ग्रहण किये गये पदार्थों को रसयुक्त करती तथा पचाती है । व्यानवायु शरीर में व्याप्त रहती है, यह समस्त नाड़ियों में विद्यमान मलादि दोषों का शोषण कर शरीर की कान्ति और तेज को बढ़ाती है । कंठ में उदान वायु रहती है । इसका कार्य वमन, भाषण और शरीर से प्राण का उत्क्रमण है । नागवायु शरीर में व्याप्त रह कर उसके अंग-प्रत्यंग के संचालन में सहायता करती है । आँखों की पलकों को खोलना और बन्द करना ( नेत्रोन्मीलन ) कूर्मवायु का कार्य है । कृकल ( कृकर ) वायु का कार्य है डकार उत्पन्न करना तथा भूख बढ़ाना । देवदत्त वायु जँभाई लेने में सहायता रती है तथा धनञ्जय समस्त शरीर में व्याप्त रहकर अव्यक्त नाद उत्पन्न करती है । ( प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान, पाँच मुख्य वायु हैं और नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त तथा धनञ्जय उपवायु हैं । ) इस तरह इन दस वायुओं के सम्बन्ध से नरनारीरूप पिण्ड ( शरीर ) की उत्पत्ति होती है ॥ ६६ ॥
विशेष -- प्राण-वायु के हकार की ध्वनि से बाहर जाने पर और सकार की ध्वनि से भीतर आने पर हंस-हंस मन्त्र की उत्पत्ति शरीर में इक्कीस हजार छः सौ बार होती रहती है । इस हंस मन्त्र से सोऽहं शब्द की उत्पत्ति होती है । हंस-मन्त्र का जप ही अजपा गायत्री है । यह योगियों को मोक्ष प्रदान करती है, इसके संकल्पमात्र से उसके समस्त पाप नष्ट होते हैं । कुण्डलिनी से उत्पन्न यह गायत्री, प्राण-विद्या महाविद्या है ।
हकारेण वहिर्याति सकारेण विशेत् पुनः । हंसहंसेत्यमुं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा ॥ अजपा नाम गायत्री योगिनां मोक्षदायिनी । अस्याः संकल्पमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते । कुण्डलिन्यां समुद्भूता गायत्री प्राणधारिणी । प्राणविद्या महाविद्या यस्तां वेत्ति स योगवित् ॥ ( गोरक्षशतक ४२, ४४, ४६ )
हकार से सूर्यस्वर और ठकार से चन्द्रस्वर का सुषुम्ना नाड़ी में संयोग ही हठयोग में प्राणसिद्धि है ।
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ २६
जीवात्मा के स्थूल शरीर का उत्पत्ति-क्रम अथ गर्भोली पिण्डोत्पत्तिर्भवति नरनारीसंयोगे ऋतुकाले रजोविन्दुसंयोगे जीवः ॥ ७० ॥ ऋतु-काल में नर और नारी के संभोग—संयोग ( संगम ) से निकले हुए रज-विन्दु का स्त्री की योनि में ऐक्य होने से जीव के स्थूल शरीर की उत्पत्ति होती है ॥ ७० ॥ विशेष—शिवरूप विन्दु है और बीज शक्ति रूप है । इन दोनों का परस्पर सम्बन्ध ही नाद कहा गया है । व्यष्टि जीव सहित शुक्र भी बिन्दु है, पुरुष के वीर्य में अन्य जीवात्मा निवास करता है, पर उसके शरीर में उसे सुख-दुःखादि प्रभावित नहीं करते, पर संभोग-काल में भोगार्थ कर्मवश वह अन्य जीवात्मा पुरुष के बिन्दु से स्त्री के गर्भाशय में रज में सिंचित होकर स्थूल शरीर ( रज-वीर्य से उत्पन्न शरीर ) में जन्म लेने में समर्थ होता है । अतएव रज और बिन्दु का ऐक्य ही भोगकर्म के परिणामस्वरूप स्थूल शरीर की उत्पत्ति का कारण है । प्रथमदिने कलल भवति सप्तरात्रे बुद्बुदाकारं भवति । अर्धमासे गोलाकारं भवति । मासमात्रेण कठिनं मासद्वयेन शिरो भवति । तृतीयमासि हस्तपादादिकं भवति । चतुर्थे मासि चक्षुःकर्णादिनासिकामुखमेढ्रगुदं भवति । पञ्चमे मासि पृष्ठोदरौ भवतः । षष्ठे मासि नखकेशादिकं भवति । सप्तमे मासे सर्वचेतनयुक्तो भवति । अष्टमे मासि सर्वलक्षणयुक्तो भवति । नवमे मासि सत्यज्ञानयुक्तो भवति । दशमे मासि योनिसंस्पर्शादज्ञानी बालको भवति ॥ ७१ ॥ ( माता के गर्भ में प्रविष्ट जीवात्मा के स्थूल शरीर के निर्माण ( सृष्टि ) क्रम पर प्रकाश डालते हुए महायोगी गोरखनाथजी का कथन है— ) नर-नारी के परस्पर सम्भोग के परिणामस्वरूप वीर्य और रज का मिश्रित द्रव पहले दिन कुछ गाढ़ा-सा रहता है । सात दिन की अवधि में यह बुलबुले का आकार धारण कर लेता है । पन्द्रह दिनों में यह गोल आकार का ( पिण्ड ) हो जाता है । एक ३० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
माह में यह स्थूल ठोस—कठिन-सा हो जाता है और दो माह में ( उस गोलाकार पिण्ड में ) सिर बनता है, तीन माह में उसमें हाथ-पैर आदि अंग बनते हैं, चार माह की अवधि में उसमें नेत्र, कान, नाक, मुख, लिंग, गुदा के आकार बन जाते हैं, पाँचवें मास में पीठ और पेट आकारित होते हैं, छठें माह में नख, बाल आदि उत्पन्न होते हैं; सातवें माह में उसमें चेतनता का समस्त अंगों में संचार होता है । आठवें मास में उसमें सभी लक्षण पूरे हो जाते हैं। नौवें मास में उसे ( चेतन जीवात्मा को ) अपने सत्स्वरूप का ज्ञान होता है । ( उसे पिछले जन्म के कर्मों और तज्जन्य दुःखों का स्मरण हो आता है और वह परमात्मा से प्रार्थना करता है कि मुझे कृपा करके इस गर्भवास नरक-यातना से मुक्त कीजिये । दसवें मास में गर्भ से बाहर होते समय योनि-द्वार का स्पर्श होते ही वह अज्ञानी बालक- रूप में जन्म लेता है ॥ ७१ ॥ शुक्राधिकेषु पुरुषो रक्ताधिका कन्यका समशुक्ररक्ताभ्यां नपुंसकः परस्परं चिन्ताव्याकुलत्वादन्धः कुब्जो वामनः पङ्गु रङ्गहीनश्च भवति । परस्परं रतिकालेऽङ्गनिःपीडनकर- गुणैः शुक्रो द्वित्रिवारं पतति, येन द्वितीयो बालको भवति ॥ ७२ ॥ यदि पिता का वीर्य गर्भाशय में अधिक सिंचित होता है और माता का रक्त ( रज ) कम है तो संभोग के परिणामस्वरूप पुरुष- ( बालक ) शरीर उत्पन्न होता है, माता का रज अधिक होने से कन्या-शरीर की उत्पत्ति होती है । पिता-माता के वीर्य और रज के समान ( मिश्रित ) द्रव से नपुंसक सन्तान की प्राप्ति होती है । यदि संभोग के समय स्त्री-पुरुष, दोनों चिन्ताग्रस्त हों तो जन्म लेने वाली सन्तान अन्धी, कुबड़ी, वामन (बौनी), लँगड़ी, अंगहीन होती है । रति- प्रसंग के समय आपस में अङ्गमर्दन से वीर्य-स्खलन में अवरोध होने पर गर्भाशय में रुक-रुक कर दुबारा वीर्यपात होते रहने पर एक से अधिक सन्तान उत्पन्न होती हैं ॥ ७२ ॥ सार्धपलत्रयं शुक्रं विंशतिपलं रक्तं द्वादशपलं मेदः, दशपलं मज्जा, शतपलं मांसं, दशपल पित्तं, विंशतिपलं श्लेष्मा, तद्वद्वातः स्यात् षष्ट्यधिकशतत्रयमस्थीन्यस्थिमात्रं सन्धयः सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ३१
सार्धत्रयकोटिरोमकूपाणि पितृमातृवीर्यं भवति वातपित्तश्लेष्म- धातुत्रयं दशधातुमयं शरीरमिति गर्भोत्थपिण्डोत्पत्तिः ॥ ७३ ॥ ( जीवात्मा के स्थूल शरीर में कितनी मात्रा में कौन-कौन धातु हैं, इसका वर्णन किया गया है । ) इस शरीर में वीर्य साढ़े तीन पल ( २२५ ग्राम ), रक्त बीस पल (१२८० ग्राम), मेद बारह पल ( ७६८ ग्राम ), मज्जा, दस पल (६४० ग्राम), मांस सौ पल (६४०० ग्राम), पित्त दस पल (६४० ग्राम), कफ २० पल ( १२८० ग्राम ), वात बीस पल (१२८० ग्राम), अस्थि तीन सौ साठ, सन्धि (जोड़) तीन सौ साठ, रोम और रोमकूप साढ़े तीन करोड़ हैं । यह शरीर पिता-माता के वीर्य और रज से उत्पन्न है । वात, पित्त, कफ आदि से युक्त दस धातुओं से निर्मित शरीर की गर्भ से उत्पत्ति होती है । यह गर्भ में उत्थित पिण्ड की उत्पत्ति है ॥ ७३ ॥ विशेष--१ पल ४ कर्ष के बराबर होता है, और १ कर्ष का तौल १६ मासा है, १ मासा १ ग्राम के तौल के बराबर होता है, इस तरह १ पल का तौल ६४ ग्राम है । इति शिवगोरक्षविरचितसिद्धसिद्धान्तपद्धतौ प्रथमोपदेशः ॥ ३२ ] [ सिद्ध सिद्धान्तपद्धति
दूसरा उपदेश [ पिण्डविचार ] नौ चक्र-वर्णन पिण्डे नवचक्राणि । आधारे ब्रह्मचक्रं त्रिधावतं भगमण्डला- कारं तत्र मूलकन्दस्तत्र शक्तिं पावकाकारां ध्यायेत् तत्रैव कामरूपपीठं सर्वकामप्रदं भवति ॥ १ ॥ शरीर में नौ चक्र हैं। ( गुदा से दो अंगुल ऊपर और लिङ्ग से दो अंगुल नीचे—चार अंगुल परिमाण का मूलाधार है। ) मूलाधार में तीन बार गोल आकार में चारों ओर लिपटा त्रिकोण भगमण्डल के सदृश ब्रह्मचक्र है, वहीं ( उसी के समीप) मूलकन्द है, वहाँ अग्नि के आकारवाली शक्ति का (योगी को) ध्यान करना चाहिये, वहीं कामरूप पीठ है, जिसके ध्यान मात्र से समस्त काम- नाओं की सिद्धि होती है ॥ १ ॥ विशेष—हमारे पिण्ड में पीठ में संलग्न मेरुदण्ड है। मेरुदण्ड के भीतर ही दाहिनी ओर पिंगला तथा बायीं ओर इडा नाड़ी स्थित हैं, मध्य में सुषुम्ना नाड़ी है। यह तेजःस्वरूपिणी नाड़ी मूलाधार से ब्रह्मरन्ध्रपर्यन्त सहस्रार तक जाती है। इसी नाड़ी में स्थित अनेक आकार-विशेष ही षट्चक्र के रूप में प्रसिद्ध हैं। गोरखनाथजी ने यद्यपि इसमें नवचक्र निरूपित किये हैं तथापि उन्होंने गोरक्ष- शतक आदि में षट्चक्र ही स्वीकार किये हैं। सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ३३
षट्चक्रं षोडशाधारं त्रिलक्ष्यं व्योमपञ्चकम् । स्वदेहे ये न जानन्ति कथं सिद्ध्यन्ति योगिनः ॥ आधारं प्रथमं चक्रं स्वाधिष्ठानं द्वितीयकम् । योनिस्थानं द्वयोर्मध्ये कामरूपं निगद्यते ॥ आधाराख्यं गुदास्थानं पङ्कजं च चतुर्दलम् । तन्मध्ये प्रोच्यते योनिः कामाक्षा सिद्धवन्दिता ॥ योनिमध्ये महालिङ्गं पश्चिमाभिमुखस्थितम् । मस्तके मणिवद् बिम्बं यो जानाति स योगवित् ॥ तप्तचामीकराभासं तडिल्लेखेव विस्फुरत् । त्रिकोणं तत्पुरं वह्नेरधोमेढ्रात् प्रतिष्ठितम् ॥ यत्समाधौ परं ज्योतिरनन्तं विश्वतोमुखम् । तस्मिन्दृष्टे महायोगे यातायातं न विद्यते ॥ ( गोरक्षशतक १३, १७-२१ ) मूलाधार-चक्र और स्वाधिष्ठान चक्र के मध्य में स्थित योनिस्थान को कामरूप कहा जाता है। मूलाधार नामक चार दल वाले कमल ( चक्र ) के, जो गुदास्थान में है, मध्य में त्रिकोणाकार योनि है, यही योगसिद्धों द्वारा वन्दित कामाक्षा पीठ है। उस कामाक्षा के मध्य में पश्चिमाभिमुख महालिंग है, उसके मस्तक में मणि के समान प्रदीप्त बिम्ब को जो अच्छी तरह जानता है, वही योग- वेत्ता है। लिङ्गस्थान के नीचे मूलाधार पद्म की कर्णिका में तप्त स्वर्ण वर्ण और विद्युल्लेखा के समान ज्योतित त्रिकोणाकार अग्निमय योनिस्थान है। समस्त दिशाओं में व्याप्त इस परम ज्योति का महायोगसमाधि में स्थित योगी दर्शन कर मुक्त हो जाता है। मूलाधार कमल ( चक्र ) ही ब्रह्मचक्र है। यह मूलाधार-चक्र कुलचक्र भी कहलाता है। इस में कुण्डलिनी निवास करती है। कुण्डलिनी के स्थान में ही बन्धूक-पुष्प के समान लाल वर्ण के तेज से युक्त कामबीज है। यह तपाये हुए स्वर्ण के समान उज्ज्वल और प्रयुक्त अक्षरस्वरूप है। यह काम-बीज शरद के चन्द्रमा के समान दीप्त और करोड़ों सूर्य के समान तेजस्वी तथा करोड़ों चन्द्रमा के समान शीतल होता है। तत्र बन्धूकपुष्पाभं कामबीजं प्रकीर्तितम् ॥ ( शिवसंहिता ५।१६ ) ३४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
यह आधार चक्र अपने चार दलों से युक्त है, उन दलों में वं, शं, षं, सं, ये चार अक्षर हैं। इस मूलाधार कमल के ध्यान से शरीर की कान्ति बढ़ जाती है जठराग्नि प्रदीप्त होती है, शरीर नीरोग रहता है। साधक तीनों काल का ज्ञाता हो जाता है। इस चक्र के ध्यान से योगी के सभी पाप क्षणमात्र में नष्ट हो जाते हैं। योगी मन, बिन्दु और प्राण, तीनों को अपने वश में कर लेता है। द्वितीयं स्वाधिष्ठानं चक्रं तन्मध्ये पश्चिमाभिमुखलिङ्गं प्रवालाङ्कुरसदृशं ध्यायेत् तत्रैवोड्डियानपीठं जगदाकर्षणं भवति ॥ २ ॥ दूसरा स्वाधिष्ठान चक्र है। उसके बीच में पीछे की ओर मुख वाला प्रवालांकुर मूंगे के अग्रभाग के सदृश ( लाल रंग का ) शिवलिंग है, इसका ध्यान करना चाहिये, यहीं उड्डियान पीठ भी है, इस लिंग का ध्यान करने से समस्त जगत् साधक की ओर सहज खिंच जाता है, शिवलिंग की उपासना से जगत् के प्राणो को साधक अपनी ओर आकृष्ट करने की सामर्थ्य प्राप्त करता है ॥ २ ॥ विशेष --'स्व' शब्द प्राण का वाचक है, इसलिये स्वाधिष्ठान प्राणचक्र है। स्वशब्देन भवेत्प्राणः स्वाधिष्ठानं तदाश्रयः । ( गोरक्षशतक २२ ) यह स्वाधिष्ठान-चक्र मेढ़ में स्थित है।'यह छः दलों का कमल ( चक्र ) है। यह माणिक्य के समान लाल रंग का है। छः दलों पर क्रमशः वं, भं, मं, यं, रं, लं अक्षर अंकित होते हैं। इस चक्र में आत्मा का ध्यान कर योगी सुखी होता है। स्वाधिष्ठाने च षट्पत्रे सन्माणिक्यसमप्रभे । नासाग्रदृष्टिरात्मानं ध्यात्वा योगी सुखो भवेत् ॥ ( गो० संहिता २ । ६५) स्वाधिष्ठान चक्र के ध्यानी को समस्त न सुने शास्त्रों का ज्ञान हो जाता है। उसका शरीर रोगरहित हो जाता है। वह संसार में अभय रहता है। सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ३५
सर्वरोगविनिर्मुक्तो लोके चरति निर्भयः ॥ (शिवसंहिता ५।१०१) स्वाधिष्ठान चक्र का ध्यान करने वाले योगी की शारीरिक दिव्य कान्ति से लोग सम्मोहित हो उठते हैं । उसे अनेकानेक सिद्धियाँ प्राप्त होने लगती हैं, पर वह इन्हें साधना में बाधक मानकर आत्मलीन रहता है । तृतीयं नाभिचक्रं पञ्चावर्तं सर्पवत् कुण्डलाकारं तन्मध्ये कुण्डलिनीशक्तिं बालार्ककोटिसदृशीं ध्यायेत् सा मध्यमा शक्तिः सर्वसिद्धिदा भवति ॥ ३ ॥ तीसरा नाभिचक्र (मणिपूरक) है। यह सर्प के समान कुण्डलाकार नाड़ी से पाँच वलयों में वेष्टित है, इस चक्र के मध्य में अरुणोदयकालीन करोड़ों सूर्य की प्रभा के समान विभासित कुण्डलिनी शक्ति का (योगी को) ध्यान करना चाहिये । यह मध्यमा शक्ति है, इसके ध्यान मात्र से समस्त सिद्धियों की प्राप्ति होती है । (यह मूलाधार में स्थित सूक्ष्म कुण्डलिनी शक्ति की ही ज्योतिर्मयी विशिष्ट अवस्था है। इसके ध्यान से चित्त में सत्वगुण प्रवाहित होता है। मूलाधारस्थ कुण्डलिनी तीन वलयों में वेष्टित होती है ।) मणिपूरक-चक्र में ज्योतित पाँच वलयों में वेष्टित कुण्डलिनी मध्यमा शक्ति है ॥ ३ ॥ विशेष—यह स्वर्ण-वर्ण का कमल है, इसके दस दलों पर क्रमशः ड से फ तक—डं, ढं, णं, तं, थं, दं, धं, नं, पं, फं, वर्णमाला अंकित है। इस चक्र का ध्यान करने से पाताल नाम की सिद्धि प्राप्त होती है, योगी इसका ध्यान कर सदा सुखी रहता है । जगत् में उसकी अभीष्ट कामनायें पूरी होती हैं, दुःख-रोग नष्ट होते हैं, मृत्यु का भय टल जाता है और परकाय-प्रवेश की शक्ति प्राप्त होती है, स्वर्णादि बनाने की सिद्धि प्राप्त होती है, औषधि—जड़ी-बूटी तथा पृथ्वी के भीतर छिपी रत्नादि निधि का ज्ञान होता है । तृतीयं पङ्कजं नाभौ मणिपूरकसंज्ञकम् । दशारण्डादिफान्तार्णं शोभितं हेमवर्णकम् । तस्मिन् ध्यानं सदा योगी करोति मणिपूरके । तस्य पातालसिद्धिः स्यान्निरन्तरसुखावहा ॥ ईप्सितं च भवेल्लोके दुःखरोगविनाशनम् ॥ ३६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
कालस्य वञ्चनं चापि परदेहप्रवेशनम् ॥ जाम्बूनदादिकरणं सिद्धानां दर्शनं भवेत् । औषधादर्शनं चापि निधीनां दर्शनं भवेत् ॥ ( शिवसंहिता १०४, १०६-१०८ ) विवेक-मार्तण्ड में महायोगी गोरखनाथजी का कथन है कि मणिपूरक चक्र तरुण सूर्य के समान है । नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि स्थिर कर इस चक्र में आत्मा का ध्यान करने से योगी जगत् को संक्षुब्ध कर देता है । तरुणादित्यसंकाशे चक्रे तु मणिपूरके । नासाग्रदृष्टिरात्मानं ध्यात्वा संक्षोभयेज्जगत् ॥ ( विवेकमार्तण्ड १७० ) मणिपूर चक्र का अर्थ है मणि का नगर, यह अग्नि का केन्द्र है, ताप का मध्य बिन्दु है, मणि की भांति चमकदार है । यह चेतनता की शक्ति से प्रदीप्त है । इस पद्म के भीतर उलटा त्रिभुज है, जिसका रंग लाल है । इसका वाहन भेंड़ा है । यह चक्र आत्मिक तथा भौतिक शरीर का प्राण-केन्द्र है, यहाँ प्राण- अपान का संगम होता है, जिसके परिणामस्वरूप ताप की उत्पत्ति होती है । यह ताप जीवन की रक्षा करता है । श्रीगोरखनाथ ने इस चक्र को नाभिचक्र कहा है । यह सुषुम्ना नाड़ी के अन्तर्गत एक केन्द्र के रूप में नाभिक्षेत्र में स्थित अनुभव किया जाता है । एक ऊर्ध्वगामिनी शक्ति योगी की चेतना को आधार चक्र और स्वाधिष्ठान चक्र से ऊपर उठा कर इसमें प्रतिष्ठित करती है । मूलाधार और स्वाधिष्ठान की अपेक्षा शिव-शक्ति के मिलन की आनन्दानुभूति का यह विशिष्ट केन्द्र है । महायोगी गोरखनाथ ने इस चक्र में प्रकट कुण्डलिनी को मध्यमा शक्ति कहा है, जिसका आशय है कि शिव-शक्ति के मूल स्वरूप की आत्माभिव्यक्ति की यह मध्यवर्ती अवस्था है । मणिपूर चक्र में मनरूपी भ्रमर रहता है । यह समय- समय पर विभिन्न दलों-पंखुड़ियों पर विचरण करता है । इस चक्र में चौबीस सौ श्वास लेने के समय ( २ घंटे ४० मिनट ) तक ध्यान करना चाहिये, इस ध्यान से शान्ति, आनन्द, धृति, समता, निर्मोहता, वैराग्य, एकान्तप्रियता आदि की प्राप्ति होती है । सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ३७
चतुर्थं हृदयाधारमष्टदलकमलमधोमुखं तन्मध्ये कर्णिकायां लिङ्गाकारं ज्योतिरूपां ध्यायेत् । सैव हंसकला सर्वेन्द्रियाणि वश्यानि भवन्ति ॥ ४ । हृदय में ( सुषुम्ना नाड़ी में ) स्थित चौथा अनाहत चक्र है। यह आठ दल ( पंखुड़ियों ) वाला कमल है, जो अधोमुख ( नीचे की ओर मुख वाला ) है। उसके मध्य में कर्णिका में स्थित शिव-लिंग के आकार वाली ज्योति का ध्यान करना चाहिये। यही हंसकला नामवाली श्रीशक्ति है। इसकी उपासना से ( साधक की ) सभी इन्द्रियाँ वश में हो जाती हैं ॥ ४ ॥ विशेष—यद्यपि इस सिद्धसिद्धान्तपद्धति में गोरखनाथजी ने अनाहत चक्र को अष्टदल कमल कहा है तथापि अपनी अन्यान्य रचनाओं में उन्होंने अनाहत चक्र को बारह पंखुड़ियों ( दल ) का कमल स्वीकार किया है और उनकी इस स्वीकृति की पुष्टि शिवसंहिता आदि में भी उपलब्ध होती है। बारह दलवाला कमल ही अनाहत महाचक्र है, यह पाप-पुण्य से रहित है, जीवात्मा तब तक संसार-बन्धन में भ्रमित रहता है, जब तक वह इस चक्र में ध्यानस्थ होकर परमतत्व परमात्मा का ज्ञान नहीं प्राप्त करता है, परमात्म साक्षात्कार नहीं कर लेता है। द्वादशारे महाचक्रे पुण्यपापविवर्जिते । तावज्जीवो भ्रमत्येव यावत्तत्त्वं न विन्दति ॥ ( गोरक्षशतक २४ ) गोरखनाथजी का कथन है कि इस अनाहत-चक्र का ध्यान करने वाला साधक अमृतत्व में स्थित हो जाता है, अमर हो जाता है। अनाहते महाचक्रे द्वादशारे च पङ्कजे । नासाग्रदृष्टिरात्मानं ध्यात्वा ध्यातामरो भवेत् ॥ ( विवेकमार्तण्ड १७१) गोरक्षसंहिता में तो स्पष्ट कथन है कि अनाहत चक्र के ध्यान से साधक ब्रह्ममय हो जाता है। यह चक्र प्रचण्ड सूर्य के समान प्रकाशित कहा गया है। ३८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति