भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

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प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च । ( गीता ५ । १७ ) तम का पहला गुण विवाद है । इससे व्यर्थ प्रलाप में समय निष्प्रयोजन बीत जाता है । तम का दूसरा गुण कलह है । तमोगुणी व्यक्ति अविवेकी होने से दूसरों से कलह करने में सुख मानता है । तम का तीसरा गुण शोक है । तम का चौथा गुण वध है । तमोगुणी व्यक्ति अपनी स्वार्थसिद्धि के लिये दूसरे प्राणी को मार डालने में संकोच नहीं करता है । तम का पाँचवां गुण वञ्चन है । तमोगुणी व्यक्ति दूसरों को ठगने में प्रवृत्त रहता है ॥ ५३ ॥ कलना, कल्पना, भ्रान्तिः प्रमादः अनर्थ इति पञ्चगुणाः कालः ॥ ५४ ॥ काल की पाँच अवस्थायें अथवा गुण हैं । पहली अवस्था कलना-एक, दो, तीन आदि की संख्या गिनना, आयु आदि की गणना करना है । दूसरी अवस्था कल्पना-अनेक वस्तु-रचना की सामर्थ्य है-वसन्त है, हेमन्त है-इत्यादि । तीसरी अवस्था भ्रान्ति है । बुढ़ापा, यौवन, वचपन आदि में परिवर्तन-निमित्तता भ्रान्ति है । चौथी अवस्था प्रमाद है । असावधानी में उत्पन्न कार्य में प्रवृत्ति— व्यर्थ आलस्य आदि में समय बिताना प्रमाद है । पाँचवीं अवस्था अनर्थ है । अनिष्ट कार्य में लगना अनर्थ का द्योतक है ॥ ५४ ॥ जाग्रत् स्वप्नः सुषुप्तिस्तुरीयातुर्यातीतमिति पञ्चगुणो जीवः ॥ ५५ ॥ जीव की पाँच अवस्थायें हैं । पहली जाग्रत् अवस्था है । स्थूल-शरीर में इन्द्रियों द्वारा कर्म होते रहने का भान अथवा ज्ञान जाग्रत् अवस्था है । दूसरी स्वप्न-अवस्था है । बाह्य इन्द्रियों के कार्यकलाप शान्त होने पर मन में ( अचेतावस्था में ) अनेक वस्तु आदि का व्यवहार होते रहना स्वप्नावस्था है । तीसरी सुषुप्ति-अवस्था है । इसमें बाह्य इन्द्रियों और मन के व्यापार-कार्य के निरोध से निद्रा की स्थिति ही सुषुप्ति है । चौथी तुर्यावस्था है । इसमें आत्मस्वरूपविषयक एकाग्रचित्तता बनी रहती है । आत्मस्वरूपविषयक मनोवृत्ति और द्वैतप्रपंच की अप्रतीति ही तुर्यावस्था का लक्षण है । पाँचवीं तुर्यातीत अवस्था में निर्विकल्प समाधि में जीव प्रतिष्ठित हो जाता है ॥ ५५ ॥ सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ २१