सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(१४।६) में कहा गया है--'सत्वं सुखे संजयति ।' (सत्व सुख में लगाता है ।) इन्द्रियों में चेतनता और विवेकशक्ति उत्पन्न होती है । 'सत्वात् संजायते ज्ञानम्' ( गीता १४।१७ ) – सत्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है ॥ ५१ ॥ दानं भोगः शृङ्गारो वस्तुग्रहणं स्वार्थसंग्रहणमिति पञ्चगुणं रजः ॥ ५२ ॥ रजोगुण से दान, भोग, शृङ्गार, वस्तुग्रहण और संग्रह में प्रवृत्ति होतो है । यह जीव को कर्म से वन्धनयुक्त करता है । रजोगुण रागरूप है । यह कामना और आसक्ति ( तृष्णा ) से उत्पन्न होता है । जीवात्मा इसके द्वारा कर्मफल की प्राप्ति की स्पृहा करता है । रजोगुण के बढ़ने पर लोभ, प्रवृत्ति, स्वार्थबुद्धि से कर्मों का सकाम भाव से आरम्भ, अशान्ति, विषयभोग की लालसा—ये सब उत्पन्न होते हैं । राजस कर्म का फल दुःख है । 'रजसस्तु फलं दुःखम् ।' (गीता १४।१६) रजोगुण से लोभ बढ़ता है । रजोगुण का पहला गुण दान है, भविष्य में अथवा जन्मान्तर में फल-प्राप्ति की कामना से देश-काल के अनुसार सत्पात्र का विचार कर यथाशक्ति धन अथवा पदार्थ प्रदान करना दान है । दूसरा गुण भोग है । सुन्दर रूप, रस, गन्ध शब्द, स्पर्शादि की कामना में प्रवृत्त होना भोग है । तीसरा गुण शृङ्गार है, मोक्ष-प्राप्ति के लिये नहीं, विषयभोग की इच्छा की पूर्ति के लिये शरीरादि को समलंकृत करना शृङ्गार है । चौथा गुण वस्तुग्रहण है । अपने भोग-सुख के लिये वस्तु के ग्रहण और संचय में आसक्त रहना वस्तुग्रहण है । पाँचवां गुण स्वार्थ-संग्रहण है । दूसरे की हानि होगी, दुःख होगा—इन बातों का विचार किये बिना अपने स्वार्थ की तृप्ति के लिये वस्तु और विषय- भोग में सहायक उपकरणों के संग्रह में अभिरुचिपूर्वक उन्हें सुरक्षित रखना ही स्वार्थ-संग्रहण है ॥ ५२ ॥ विवादः कलहः शोको वधो वञ्चनमिति पञ्चगुणं तमः । ५३ ॥ तमोगुण की पाँच वृत्तियाँ हैं । तमोगुण अज्ञान से उत्पन्न होता है । देहाभिमानियों को मोहग्रस्त कर प्रमाद, आलस्य और निद्रा से बन्धनमुक्त करता है । तमोगुण के बढ़ने पर अन्तःकरण और इन्द्रियों में अप्रकाश (अन्धकार) कर्तव्य में अप्रवृत्ति, मोहिनी प्रमादमयी वृत्तियों का जन्म होता है । तमोगुण से प्रमाद, मोह और अज्ञान उत्पन्न होते हैं । २० ] [ सिद्धसिद्धान्तप