सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्यक्तिपंचक और उसके पचीस गुण इच्छा, क्रिया, माया, प्रकृतिर्वागिति व्यक्तिपञ्चकम् ॥५६॥ सूक्ष्म-शरीर में जिन-जिन गुणों से व्यवहार का सम्पादन होता है, वे इच्छा क्रिया, माया, प्रकृति और वाक्-पाँच गुण हैं । जीव के उपभोगसाधन में ये व्यवहार में तत्पर रहते हैं, इन्हें व्यक्तिपंचक कहा जाता है ॥ ५६ ॥ उन्मादो, वासना, वाञ्छा, चिन्ता चेष्टेति पञ्च- गुणेच्छा ॥ ५७ ॥ इच्छा के कार्यभूत पाँच व्यापार-गुण हैं । पहला उन्माद है, इच्छा भंग होने पर उन्माद होता है । स्वकर्त्तव्य-निर्वाह में पहले किये गये कर्मों के संस्कार के अनुरूप शरीर, इन्द्रिय मन आदि को प्रवृत्त करना वासना है धन आदि पदार्थों की प्राप्ति की कामना वाञ्छा है । वासना और वाञ्छा यथाक्रम दूसरे और तीसरे गुण हैं। चौथा गुण चिन्ता है । इष्ट विषय के अन्वेषण की इच्छा चिन्ता है । पाँचवां गुण चेष्टा है, शरीर का व्यापार ही चेष्टा है, कार्य की पूर्ति में शरीर का प्रयासरत होना ही चेष्टा है ॥ ५७ ॥ स्मरणं उद्योगः कार्यं निश्चयः स्वकुलाचार इति पञ्चगुणा क्रिया ॥ ५८ ॥ क्रिया के पाँच गुण अथवा अवस्थायें हैं । संसार के व्यवहार में स्मृति-ज्ञान के उत्पादक व्यापार को स्मरण कहा जाता है । साधनजनक व्यापार को उद्योग कहा जाता है । घट-पटादि उत्पन्न करने वाला व्यापार ( मन की वृत्ति को क्रियात्मक रूप देना ) ही कार्य है । निश्चयात्मक ज्ञान को उत्पन्न करने वाली इन्द्रियादि तथा मन की क्रिया ही निश्चय है और अपनी कुलपरम्परागत मर्यादा के पालन में मन की प्रवृत्ति ही स्वकुलाचार है । ये ही पाँचों क्रिया के गुण हैं ॥ ५८ ॥ मदो, मात्सर्यं, दम्भः कृत्रिमत्त्वमसत्यमिति पञ्चगुणा माया ॥ ५६ ॥ २२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति