भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

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माया के पाँच रूप हैं। पहला मद है। मद से युक्त प्राणी कहता है कि मैं ही बलवान हूँ, धनी हूँ, मेरे समान कोई दूसरा नहीं है। अपने सत्स्वरूप को इस तरह अज्ञान से आच्छादित करना मद है। दूसरा रूप मात्सर्य है, दूसरों की उन्नति देख कर उनके प्रति मन में द्वेष-भाव रख कर उनकी उन्नति से जलते रहना और उन्हें गिराने की चेष्टा में लगे रहना मत्सर है। सत् को छिपाकर असत् अथवा मिथ्या भाव दिखाकर दूसरों से अपनी प्रशंसा करवाने का भाव दम्भ है। यह माया का तीसरा गुण है। चौथा रूप कृत्रिमता—बनावट है और पाँचवां गुण माया का है असद् व्यवहार और मिथ्या भाषण, वचन आदि के द्वारा दूसरे को विमुग्ध कर असत्य-से अपना काम बनाना; असत्य ही मिथ्या आचरण है ॥ ५६ ॥ आशा तृष्णा स्पृहा काङ्क्षामित्येति पञ्चगुणा प्रकृतिः ॥ ६० ॥ (अन्तःकरण के स्वभाव को प्रकृति कहा जाता है।) प्रकृति के पाँच गुण हैं। पहला गुण आशा है। आगे प्राप्त होने वाली वस्तु के विषय में प्राप्ति की भावना आशा है। दूसरा गुण तृष्णा है। अपने पास भोग के समस्त साधन रहते हुए भी अधिक-से-अधिक साधनपदार्थ की प्राप्ति की कामना में प्रवृत्त रहना तृष्णा है। यह कभी जीर्ण नहीं होती। 'तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः' वचन पर भर्तृहरि ने वैराग्यशतक में पक्की छाप (मुहर) लगा दी है। तीसरा गुण स्पृहा है, अमुक वस्तु की प्राप्ति हो जाय, इस तरह की मनोवृत्ति स्पृहा है। चौथा गुण काङ्क्षा है, यह वस्तु सदा बनी रहे, कोई छीन न ले, ऐसी वृत्ति काङ्क्षा है। पाँचवां गुण मिथ्या है, न मिलने वाली वस्तु की प्राप्ति की इच्छा करना मिथ्या है ॥ ६० ॥ परा, पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी, मातृकेति पञ्चगुणा वाक् इति व्यक्तिपञ्चकः पञ्चविंशति गुणा ॥ ६१ ॥ अन्तः करण के व्यापारसञ्चालन में वाक्—वाणी का बड़ा महत्व है। वाक् के पाँच रूप हैं। पहला रूप परा है। यह वाणी मूलाधार-चक्र में रहती है और निर्विकल्प समाधि के द्वारा जानी जातीं है। इस वाणी में मन की गति नहीं है। वाक् का दूसरा रूप पश्यन्ती है। जब परावाक्—परावाणी नाभि-देश में सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ २३