सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमाह में यह स्थूल ठोस—कठिन-सा हो जाता है और दो माह में ( उस गोलाकार पिण्ड में ) सिर बनता है, तीन माह में उसमें हाथ-पैर आदि अंग बनते हैं, चार माह की अवधि में उसमें नेत्र, कान, नाक, मुख, लिंग, गुदा के आकार बन जाते हैं, पाँचवें मास में पीठ और पेट आकारित होते हैं, छठें माह में नख, बाल आदि उत्पन्न होते हैं; सातवें माह में उसमें चेतनता का समस्त अंगों में संचार होता है । आठवें मास में उसमें सभी लक्षण पूरे हो जाते हैं। नौवें मास में उसे ( चेतन जीवात्मा को ) अपने सत्स्वरूप का ज्ञान होता है । ( उसे पिछले जन्म के कर्मों और तज्जन्य दुःखों का स्मरण हो आता है और वह परमात्मा से प्रार्थना करता है कि मुझे कृपा करके इस गर्भवास नरक-यातना से मुक्त कीजिये । दसवें मास में गर्भ से बाहर होते समय योनि-द्वार का स्पर्श होते ही वह अज्ञानी बालक- रूप में जन्म लेता है ॥ ७१ ॥ शुक्राधिकेषु पुरुषो रक्ताधिका कन्यका समशुक्ररक्ताभ्यां नपुंसकः परस्परं चिन्ताव्याकुलत्वादन्धः कुब्जो वामनः पङ्गु रङ्गहीनश्च भवति । परस्परं रतिकालेऽङ्गनिःपीडनकर- गुणैः शुक्रो द्वित्रिवारं पतति, येन द्वितीयो बालको भवति ॥ ७२ ॥ यदि पिता का वीर्य गर्भाशय में अधिक सिंचित होता है और माता का रक्त ( रज ) कम है तो संभोग के परिणामस्वरूप पुरुष- ( बालक ) शरीर उत्पन्न होता है, माता का रज अधिक होने से कन्या-शरीर की उत्पत्ति होती है । पिता-माता के वीर्य और रज के समान ( मिश्रित ) द्रव से नपुंसक सन्तान की प्राप्ति होती है । यदि संभोग के समय स्त्री-पुरुष, दोनों चिन्ताग्रस्त हों तो जन्म लेने वाली सन्तान अन्धी, कुबड़ी, वामन (बौनी), लँगड़ी, अंगहीन होती है । रति- प्रसंग के समय आपस में अङ्गमर्दन से वीर्य-स्खलन में अवरोध होने पर गर्भाशय में रुक-रुक कर दुबारा वीर्यपात होते रहने पर एक से अधिक सन्तान उत्पन्न होती हैं ॥ ७२ ॥ सार्धपलत्रयं शुक्रं विंशतिपलं रक्तं द्वादशपलं मेदः, दशपलं मज्जा, शतपलं मांसं, दशपल पित्तं, विंशतिपलं श्लेष्मा, तद्वद्वातः स्यात् षष्ट्यधिकशतत्रयमस्थीन्यस्थिमात्रं सन्धयः सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ३१