भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

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जीवात्मा के स्थूल शरीर का उत्पत्ति-क्रम अथ गर्भोली पिण्डोत्पत्तिर्भवति नरनारीसंयोगे ऋतुकाले रजोविन्दुसंयोगे जीवः ॥ ७० ॥ ऋतु-काल में नर और नारी के संभोग—संयोग ( संगम ) से निकले हुए रज-विन्दु का स्त्री की योनि में ऐक्य होने से जीव के स्थूल शरीर की उत्पत्ति होती है ॥ ७० ॥ विशेष—शिवरूप विन्दु है और बीज शक्ति रूप है । इन दोनों का परस्पर सम्बन्ध ही नाद कहा गया है । व्यष्टि जीव सहित शुक्र भी बिन्दु है, पुरुष के वीर्य में अन्य जीवात्मा निवास करता है, पर उसके शरीर में उसे सुख-दुःखादि प्रभावित नहीं करते, पर संभोग-काल में भोगार्थ कर्मवश वह अन्य जीवात्मा पुरुष के बिन्दु से स्त्री के गर्भाशय में रज में सिंचित होकर स्थूल शरीर ( रज-वीर्य से उत्पन्न शरीर ) में जन्म लेने में समर्थ होता है । अतएव रज और बिन्दु का ऐक्य ही भोगकर्म के परिणामस्वरूप स्थूल शरीर की उत्पत्ति का कारण है । प्रथमदिने कलल भवति सप्तरात्रे बुद्बुदाकारं भवति । अर्धमासे गोलाकारं भवति । मासमात्रेण कठिनं मासद्वयेन शिरो भवति । तृतीयमासि हस्तपादादिकं भवति । चतुर्थे मासि चक्षुःकर्णादिनासिकामुखमेढ्रगुदं भवति । पञ्चमे मासि पृष्ठोदरौ भवतः । षष्ठे मासि नखकेशादिकं भवति । सप्तमे मासे सर्वचेतनयुक्तो भवति । अष्टमे मासि सर्वलक्षणयुक्तो भवति । नवमे मासि सत्यज्ञानयुक्तो भवति । दशमे मासि योनिसंस्पर्शादज्ञानी बालको भवति ॥ ७१ ॥ ( माता के गर्भ में प्रविष्ट जीवात्मा के स्थूल शरीर के निर्माण ( सृष्टि ) क्रम पर प्रकाश डालते हुए महायोगी गोरखनाथजी का कथन है— ) नर-नारी के परस्पर सम्भोग के परिणामस्वरूप वीर्य और रज का मिश्रित द्रव पहले दिन कुछ गाढ़ा-सा रहता है । सात दिन की अवधि में यह बुलबुले का आकार धारण कर लेता है । पन्द्रह दिनों में यह गोल आकार का ( पिण्ड ) हो जाता है । एक ३० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति