सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवायु रेचक, पूरक, कुम्भक की सामर्थ्य से युक्त होती है । ( प्राणवायु को शरीर में रोकती है और प्राणायाम के अभ्यास में सिद्धि प्रदान करती है । ) नाभि में समान वायु रहती है, यह जठरानल को दीप्त करती है और भोजन के रूप में ग्रहण किये गये पदार्थों को रसयुक्त करती तथा पचाती है । व्यानवायु शरीर में व्याप्त रहती है, यह समस्त नाड़ियों में विद्यमान मलादि दोषों का शोषण कर शरीर की कान्ति और तेज को बढ़ाती है । कंठ में उदान वायु रहती है । इसका कार्य वमन, भाषण और शरीर से प्राण का उत्क्रमण है । नागवायु शरीर में व्याप्त रह कर उसके अंग-प्रत्यंग के संचालन में सहायता करती है । आँखों की पलकों को खोलना और बन्द करना ( नेत्रोन्मीलन ) कूर्मवायु का कार्य है । कृकल ( कृकर ) वायु का कार्य है डकार उत्पन्न करना तथा भूख बढ़ाना । देवदत्त वायु जँभाई लेने में सहायता रती है तथा धनञ्जय समस्त शरीर में व्याप्त रहकर अव्यक्त नाद उत्पन्न करती है । ( प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान, पाँच मुख्य वायु हैं और नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त तथा धनञ्जय उपवायु हैं । ) इस तरह इन दस वायुओं के सम्बन्ध से नरनारीरूप पिण्ड ( शरीर ) की उत्पत्ति होती है ॥ ६६ ॥
विशेष -- प्राण-वायु के हकार की ध्वनि से बाहर जाने पर और सकार की ध्वनि से भीतर आने पर हंस-हंस मन्त्र की उत्पत्ति शरीर में इक्कीस हजार छः सौ बार होती रहती है । इस हंस मन्त्र से सोऽहं शब्द की उत्पत्ति होती है । हंस-मन्त्र का जप ही अजपा गायत्री है । यह योगियों को मोक्ष प्रदान करती है, इसके संकल्पमात्र से उसके समस्त पाप नष्ट होते हैं । कुण्डलिनी से उत्पन्न यह गायत्री, प्राण-विद्या महाविद्या है ।
हकारेण वहिर्याति सकारेण विशेत् पुनः । हंसहंसेत्यमुं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा ॥ अजपा नाम गायत्री योगिनां मोक्षदायिनी । अस्याः संकल्पमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते । कुण्डलिन्यां समुद्भूता गायत्री प्राणधारिणी । प्राणविद्या महाविद्या यस्तां वेत्ति स योगवित् ॥ ( गोरक्षशतक ४२, ४४, ४६ )
हकार से सूर्यस्वर और ठकार से चन्द्रस्वर का सुषुम्ना नाड़ी में संयोग ही हठयोग में प्राणसिद्धि है ।
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