सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
पृष्ठ 80, कुल 222 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थं हृदयाधारमष्टदलकमलमधोमुखं तन्मध्ये कर्णिकायां लिङ्गाकारं ज्योतिरूपां ध्यायेत् । सैव हंसकला सर्वेन्द्रियाणि वश्यानि भवन्ति ॥ ४ । हृदय में ( सुषुम्ना नाड़ी में ) स्थित चौथा अनाहत चक्र है। यह आठ दल ( पंखुड़ियों ) वाला कमल है, जो अधोमुख ( नीचे की ओर मुख वाला ) है। उसके मध्य में कर्णिका में स्थित शिव-लिंग के आकार वाली ज्योति का ध्यान करना चाहिये। यही हंसकला नामवाली श्रीशक्ति है। इसकी उपासना से ( साधक की ) सभी इन्द्रियाँ वश में हो जाती हैं ॥ ४ ॥ विशेष—यद्यपि इस सिद्धसिद्धान्तपद्धति में गोरखनाथजी ने अनाहत चक्र को अष्टदल कमल कहा है तथापि अपनी अन्यान्य रचनाओं में उन्होंने अनाहत चक्र को बारह पंखुड़ियों ( दल ) का कमल स्वीकार किया है और उनकी इस स्वीकृति की पुष्टि शिवसंहिता आदि में भी उपलब्ध होती है। बारह दलवाला कमल ही अनाहत महाचक्र है, यह पाप-पुण्य से रहित है, जीवात्मा तब तक संसार-बन्धन में भ्रमित रहता है, जब तक वह इस चक्र में ध्यानस्थ होकर परमतत्व परमात्मा का ज्ञान नहीं प्राप्त करता है, परमात्म साक्षात्कार नहीं कर लेता है। द्वादशारे महाचक्रे पुण्यपापविवर्जिते । तावज्जीवो भ्रमत्येव यावत्तत्त्वं न विन्दति ॥ ( गोरक्षशतक २४ ) गोरखनाथजी का कथन है कि इस अनाहत-चक्र का ध्यान करने वाला साधक अमृतत्व में स्थित हो जाता है, अमर हो जाता है। अनाहते महाचक्रे द्वादशारे च पङ्कजे । नासाग्रदृष्टिरात्मानं ध्यात्वा ध्यातामरो भवेत् ॥ ( विवेकमार्तण्ड १७१) गोरक्षसंहिता में तो स्पष्ट कथन है कि अनाहत चक्र के ध्यान से साधक ब्रह्ममय हो जाता है। यह चक्र प्रचण्ड सूर्य के समान प्रकाशित कहा गया है। ३८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति