सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकालस्य वञ्चनं चापि परदेहप्रवेशनम् ॥ जाम्बूनदादिकरणं सिद्धानां दर्शनं भवेत् । औषधादर्शनं चापि निधीनां दर्शनं भवेत् ॥ ( शिवसंहिता १०४, १०६-१०८ ) विवेक-मार्तण्ड में महायोगी गोरखनाथजी का कथन है कि मणिपूरक चक्र तरुण सूर्य के समान है । नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि स्थिर कर इस चक्र में आत्मा का ध्यान करने से योगी जगत् को संक्षुब्ध कर देता है । तरुणादित्यसंकाशे चक्रे तु मणिपूरके । नासाग्रदृष्टिरात्मानं ध्यात्वा संक्षोभयेज्जगत् ॥ ( विवेकमार्तण्ड १७० ) मणिपूर चक्र का अर्थ है मणि का नगर, यह अग्नि का केन्द्र है, ताप का मध्य बिन्दु है, मणि की भांति चमकदार है । यह चेतनता की शक्ति से प्रदीप्त है । इस पद्म के भीतर उलटा त्रिभुज है, जिसका रंग लाल है । इसका वाहन भेंड़ा है । यह चक्र आत्मिक तथा भौतिक शरीर का प्राण-केन्द्र है, यहाँ प्राण- अपान का संगम होता है, जिसके परिणामस्वरूप ताप की उत्पत्ति होती है । यह ताप जीवन की रक्षा करता है । श्रीगोरखनाथ ने इस चक्र को नाभिचक्र कहा है । यह सुषुम्ना नाड़ी के अन्तर्गत एक केन्द्र के रूप में नाभिक्षेत्र में स्थित अनुभव किया जाता है । एक ऊर्ध्वगामिनी शक्ति योगी की चेतना को आधार चक्र और स्वाधिष्ठान चक्र से ऊपर उठा कर इसमें प्रतिष्ठित करती है । मूलाधार और स्वाधिष्ठान की अपेक्षा शिव-शक्ति के मिलन की आनन्दानुभूति का यह विशिष्ट केन्द्र है । महायोगी गोरखनाथ ने इस चक्र में प्रकट कुण्डलिनी को मध्यमा शक्ति कहा है, जिसका आशय है कि शिव-शक्ति के मूल स्वरूप की आत्माभिव्यक्ति की यह मध्यवर्ती अवस्था है । मणिपूर चक्र में मनरूपी भ्रमर रहता है । यह समय- समय पर विभिन्न दलों-पंखुड़ियों पर विचरण करता है । इस चक्र में चौबीस सौ श्वास लेने के समय ( २ घंटे ४० मिनट ) तक ध्यान करना चाहिये, इस ध्यान से शान्ति, आनन्द, धृति, समता, निर्मोहता, वैराग्य, एकान्तप्रियता आदि की प्राप्ति होती है । सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ३७