भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

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नासाग्रे दृष्टिमाधाय ध्यात्वा ब्रह्ममयो भवेत् ॥ ( गोरक्षसंहिता २।६७) हृदय-चक्र—अनाहत कमल के ध्यान से मन जड़ता का परित्याग कर ऊर्ध्वगामी होकर प्रबोध पाता है, जाग जाता है । महायोगीन्द्र मत्स्येन्द्रनाथजी ने गोरखनाथजी को उपदेश दिया है । हिरदा चक्र में मन प्रबोध ॥ ( गोरख वा० मच्छींद्र-गोरखबोध ५४ ) अनाहतचक्र आघातरहित होता है । सृष्टि की समस्त ध्वनियों की उत्पत्ति परस्पर दो वस्तुओं के आघात से होती है, भौतिक जगत् के परे दिव्य ध्वनि ही समस्त ध्वनियों का स्रोत है । यह अनहद ( अनाहत ) नाद है; ये ध्वनियाँ हृदय केन्द्र से उत्पन्न होती हैं । यह चक्र नीले रंग का कमल कहा गया है । इसके मध्य में षट् कोण की आकृति है । इसका बीज मन्त्र यं है । इसकी वाहन द्रुतगामी काला हिरण है । यह वायुतत्व का प्रतीक है । इसके देवता पिनाक धारण करने वाले भगवान शिव हैं। इसकी अधिष्ठात्री देवी काकिनी है । अनेक सिद्धों और योगियों ने इस चक्र का रंग श्वेत भी बताया है । इस चक्र में ४८०० श्वास आने के समय ( ५ घंटे २० मिनट ) तक ध्यान करना चाहिये । ध्यान से निर्लोभता, सत्यता, प्रेम, सावधानता, समदर्शिता, अहिंसकता, वात्सल्य, विवेक- शीलता, जिज्ञासुता, दया, क्षमा और करुणा की शक्ति प्राप्त होती है । शिवसंहिता में इस चक्र को लाल रंग का कहा गया है । यह चक्र आनन्द का स्थान कहा गया है । इस अनाहत (चक्र) कमल में व्याप्त परम तेज को वाणलिंग कहा गया है । इस वाणलिंग के स्मरण मात्र से साधक को दृष्ट-अदृष्ट फल की प्राप्ति होती है । वह दूरस्थ सूक्ष्म पदार्थों को देखने की शक्ति पाता है । वह आकाश में उड़ने में समर्थ हो जाता है । खेचरी-मुद्रा सिद्ध हो जाती है । आकाश में स्थित जीव साधक के वश में हो जाते हैं । हृदयेऽनाहतं नाम चतुर्थं पङ्कजं भवेत् । कादिठान्तार्णसंस्थानं द्वादशारसमन्वितम् ॥ अतिशोणं वायुबीजं प्रसादस्थानमीरितम् । पद्मस्थं तत्पर तेजो वाणलिङ्गं प्रकीर्तितम् । सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ३६