भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

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आकाशे यत्र शब्दः स्यात्तदाज्ञाचक्रमुच्यते । तत्रात्मानं शिवं ध्यात्वा योगी मुक्तिमवाप्नुयात् ॥ ( गोरक्षसंहिता २।७०,७१, ७३) आज्ञाचक्र के सम्बन्ध में शिवसंहिता में बड़े विस्तार से विचार किया गया है । आज्ञाचक्र कमल के दोनों दलों पर हं, क्षं बीजाक्षर अंकित हैं । ये दोनों दल श्वेत रंग के हैं । यहाँ के महाकाल सिद्ध हैं और हाकिनी देवी अधि- ष्ठात्री रूप में स्थित रहती हैं । इस आज्ञापद्म के मध्य में शरद् के चन्द्रमा की आभा के सदृश चन्द्रबीज ('ठ' बीज) स्थित रहता है, इसे जान लेने पर परमहंस पुरुष को किसी प्रकार का अवसाद नहीं रहता है । आज्ञापद्मं भ्रुवोर्मध्ये हक्षोपेतं द्विपत्रकम् । शुक्लाभं तन्महाकालः सिद्धो देव्यत्र हाकिनी ॥ शरच्चन्द्रनिभं तत्राक्षरबीजं विजृम्भितम् । पुमान् परमहंसोऽयं यज्ज्ञात्वा नावसीदति ॥ ( शिवसंहिता ५ । १२२-१२३ ) इस आज्ञा-चक्र में तुरीय तृतीय लिंग के रूप में मुक्तिदायक शिव विराजमान हैं । इस लिंग का ध्यान करने से योगी शिवस्वरूप हो जाता है । शरीर की इडा- पिंगला नाड़ियाँ वरणा और असी कही जाती हैं, इन्हीं वरणा-असी ( वाराणसी ) के मध्य में विश्वनाथ अभिव्यक्त हैं । इस वाराणसी को परमतत्व माना गया है । मेरु दण्ड के सहारे सुषुम्ना नाडी ब्रह्मारन्ध्र तक गयी है । इडा नाड़ी सुषुम्ना के परा- वृत होती हुई आज्ञाचक्र के दक्षिण भाग से होकर बायें नासापुट को जाती है, इसलिये गंगा कही गयी है । इडा नाड़ी के समान पिंगला नाड़ी आज्ञा-चक्र के वाम भाग से चलकर दाहिने नासांपुट को जाती है, इसलिये इसको असी कहा गया है । महेश्वर इस आज्ञाचक्र के देवता हैं, इस चक्र के ऊपर तीन पीठ हैं, जिन्हें नाद, बिन्दु और शक्ति कहा जाता है । इस आज्ञापद्म का ध्यान करने वाले साधक के पहले जन्म में किये गये कर्म के फल नष्ट हो जाते हैं । इस आज्ञाचक्र में जिस साधक का मन क्षणमात्र के लिये भी स्थिर हो जाता है, उसके सभी पाप उसी क्षण में नष्ट हो जाते हैं । वासना का महाबन्धन समाप्त हो जाता है । जो योगी मृत्यु के समय इस आज्ञाचक्र का ध्यान करता है, वह परमात्मस्वरूप हो जाता है । इस कमल का ध्यान करने वाला साधक राजयोग का अधिकारी होता है । ४४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति