भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

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राजयोगाधिकारोस्याद्देतच्चिन्तंनततो ध्रुवम् । यागो बन्धाद् विनिर्मुक्तः स्वीयया प्रभयास्वयम् ॥ ( शिवसंहिता ५ । १४८ ) इस आज्ञाचक्र को तीसरा नेत्र, त्रिकुटी, त्रिवेणी, शिवनेत्र, गुरुचक्र आदि भी कहा जाता है । इस चक्र का रंग हल्का भूरा भी कहा गया है । दलों पर हं, क्षं अक्षर प्राणशक्ति के ऋणात्मक तथा धनात्मक प्रवाह के प्रतिनिधि हैं । पद्म के मध्य में ॐ बीज मन्त्र है । सामान्यतः ध्यान तो भ्रूमध्य में किया जाता है, पर चक्र का स्थान मस्तिष्क में है । शरीर के वाम भाग से इड़ा, दक्षिण भाग से पिंगला तथा मेरुदण्ड के माध्यम से ऊर्ध्व भाग से सुषुम्ना आकर मिलती है, इसी से इसका नाम त्रिवेणी भी है । इस स्थान पर ३००० श्वास के आने के समय ( ३ घंटे २० मिनट ) तक ध्यान केन्द्रित करने पर वृत्तियाँ अन्तर्मुखी होती हैं । मन की चंचलता मिट जाती है । नेत्रों के प्रकाश में बाहर-भीतर के अंग प्रकाशित हो उठते हैं । अन्तः प्रदेश की रचना का ज्ञान सुलभ होता है । आत्मसाक्षात्कार होता है । ब्रह्मरन्ध्रमुखे तासां सङ्गमः स्यादसंशयः । तस्मिन्स्नानेस्नातकानां मुक्तिः स्यादविरोधतः ॥ गङ्गायमुनयोर्मध्ये वहत्येषा सरस्वती । तासान्तु सङ्गमे स्नात्वा धन्यो याति परां गतिम् ॥ ( शिवसंहिता ५ १६३-१६४ ) इस त्रिवेणी में ध्यान करनेवाला ( स्नान करने वाला ) साधक परमगति को प्राप्त करता है । महायोगी गोरखनाथ का कथन है कि इस आज्ञाचक्र में सुषुम्ना अंगुष्ठमात्र दीपशिखाकार हो जाती है । योगसाधक का इस चक्र में ध्यान करने से सम्पूर्ण अस्तित्व सत्य की अभिव्यक्ति करता है और वह सहज गति से सत्य भाषण ही किया करता है, वाक्सिद्ध हो जाता है । अष्टमं ब्रह्मरन्ध्रं निर्वाणचक्रं सूचिकाग्रभेद्यं धूमशिखाकारं ध्यायेत् तत्र जालन्धरपीठं मोक्षप्रदं भवति । ८ ॥ आठवाँ निर्वाणचक्र है । ( इसमें ध्यान करने से ब्रह्म अभिव्यक्त होता है, जिसका फल है मोक्ष) इसका नाम ब्रह्मरन्ध्र भी है । यह सूई के अग्रभाग के सिद्धसिद्धान्तपद्धति । [ ४५