भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

पृष्ठ 88, कुल 222 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 88

सदृश धूम की शिखा के आकार वाला है, इसका योगी को ध्यान करना चाहिये । यहीं मुक्ति की प्राप्ति कराने वाला जालन्धर पीठ है । ( धूम सदृश तेज का इस चक्र में ध्यान करने से समस्त प्रपञ्चजाल का नाश करने वाला-उन्मूलन करने वाला परमात्मा-जालन्धर अभिव्यक्त होता है । सहस्रार के मूल में सूई की नोंक के समान एक धूमशिखाकार छिद्र है, यही ब्रह्मरन्ध्र-निर्वाणचक्र है । ) इस चक्र में जालन्धर पीठ मोक्षप्रद होता है ॥ ८ ॥ विशेष ब्रह्मरन्ध्र चक्र-निर्वाण चक्र सहस्रार के मूल में स्थित है, इसका ध्यान कर साधक नासा के अग्रभाग पर दृष्टि स्थिर कर अपने आत्मस्वरूप - शिव स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जा जाता है । ब्रह्मरन्ध्र महाचक्रे सहस्रारे च पङ्कजे । नासाग्रदृष्टिरात्मानं ध्यात्वा सिद्धो भवत्स्वयम् ॥ ( विवेकमार्तण्ड १७५ ) सिद्ध होने का आशय है परमात्मस्वरूप की प्राप्ति । यदि योगी ब्रह्मरन्ध्र ( निर्वाण चक्र ) में मन लगाकर आधे क्षण तक भी स्थिर रहता है, तो वह समस्त पापों से मुक्त होकर परम गति को प्राप्त हो जायेगा । इस ब्रह्मरन्ध्र में लीन मन वाला योगी अणिमादि सिद्धियों से प्राप्त सुख-सुविधा का उपभोग करता हुआ शिवस्वरूप हो जाता है। वह परमेश्वर शिव को प्रिय हो जाता है और अनेक मुमुक्षुओं को उपदेश देकर संसार-सागर से पार उतार देता है । ब्रह्मरन्ध्रे मनो दत्त्वा क्षणार्धं यदि तिष्ठति । सर्वपापविनिर्मुक्तः स याति परमां गतिम् ॥ अस्मिन् लीनं मनो यस्य स योगी मयि लीयते । अणिमादिगुणान् भुक्त्वा स्वेच्छया पुरुषोत्तमः ॥ एतद्रन्ध्रध्यानमात्रेण मर्त्यः संसारेऽस्मिन् वल्लभो मे भवेत्सः । पापान् जित्वा मुक्तिमार्गाधिकारी ज्ञानं दत्वा तारयत्यद्भुतं वै ॥ ( शिवसंहिता ५ । १७३-७५ ) निर्वाणचक्र व्यष्टि चेतना द्वारा अनन्त शाश्वत ब्रह्म की सिद्धि का श्रेष्ठतम केन्द्र है । व्यष्टि चेतना इस स्तर पर सच्चिदानन्दस्वरूप में तल्लीन हो जाती है । ४६ ] । सिद्धसिद्धान्तपद्धति

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन) · पृष्ठ 88, कुल 222 में से · BharatKosha