सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइस चक्र में कुण्डलिनी महाशक्ति परमात्मा शिव से तादात्म्य प्राप्त कर ज्योतित रहती है। इसके ध्यान से प्रकाश-अन्धकार, असीम-ससीम, गति-विराम आदि द्वन्द्वात्मक प्रपञ्च समाप्त हो जाते हैं। यह चक्र प्रापंचिक ब्रह्माण्ड-व्यवस्था के भव्य जाल के चरम नियन्ता ( जालन्धर ) परमात्मा, जिससे यह ब्रह्माण्डजाल उत्पन्न होता है, जिसके द्वारा यह धारण किया जाता है तथा शासित और व्यवस्थित होता है, जिसकी यह लीला है, जो इन सबका अन्तर्यामी प्रकाशक है—की आत्माभिव्यक्ति का स्थान है। व्यक्ति तबतक जालबद्ध रहता है, जबतक वह स्वयं और जगत् में जालन्धर ( परम जाल-नियन्ता ) को पहचान नहीं लेता है। जब वह जालन्धर ( परमात्मा ) से पूर्ण तादात्म्य अनुभव करने लगता है, तब समस्त बन्धनों और दुःखों से मुक्त होकर इस संसार में स्वच्छन्दता— स्वाधीनता का अनुभव करता है, जीवन्मुक्त हो जाता है। इस चक्र में जालन्धर पीठ की यही मोक्षप्रदता है। नवममाकाशचक्रं षोडशदलकमलमूर्ध्वमुखं तन्मध्ये कर्णिकायां त्रिकूटाकारां तदूर्ध्वशक्तिं तां परमशून्यां ध्यायेत् तत्रैव पूर्णगिरिपीठं सर्वेच्छासिद्धिर्भवति । इति नवचक्रस्य विचारः ॥ ६ ॥ नौवाँ आकाश चक्र है। ( सहस्रार के ऊपरी भाग में ) एक ऊर्ध्वमुख सोलहदलों का कमल है। उसकी कर्णिका में त्रिकूटाकार ( त्रिकोण आकार वाली ) ऊर्ध्वमुखी शक्ति है। वह सच्चिदानन्दस्वरूपा निराकार शक्ति है। यह परमशून्य है। इस शक्ति का ध्यान करना चाहिये। यहीं पूर्णगिरिपीठ है, यह समस्त पदार्थों से परिपूर्ण है, समस्त संकल्पों की सिद्धि होती है। इस पूर्णगिरिपीठ वाले आकाशचक्र का ध्यान करने से संसार-जन्य भय की निवृत्ति हो जाती है और समस्त प्राणी-पदार्थ योगसाधक के वशीभूत हो जाते हैं। यही नवचक्रों का विचार ( निरूपण ) - क्रम है ॥ ६ ॥ विशेष —यह आकाश चक्र सहस्रार के ऊपरी भाग में स्थित है और इसके मूल भाग में उपर्युक्त निर्वाण चक्र है, इसलिये सहस्रार के सम्बन्ध में भी विचार करना आवश्यक है। सहस्रार योगसाधना की सिद्धि की दिशा में उच्चतम चेतना का केन्द्र है, सहस्रदल वाले ज्योतिर्मय कमल के रूप में इसका दर्शन होता है। इन दलों पर समस्त वर्ण अङ्कित हैं, इसके केन्द्र में उज्ज्वल शिवलिंग है, सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ४७