भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

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कैलासो नाम तस्यैव महेशो यत्र तिष्ठति । अकुलाख्योऽविनाशी च क्षयवृद्धिविवर्जितः ॥ ( शिवसंहिता ५ । १८७ ) यह आकाशचक्र सहस्रार के सुमेरु पर स्थित है। इस आकाशचक्र ( कमल ) को सोलह दलों से युक्त कहा गया है, इसका मुख ऊपर की ओर है । इस कमल के केन्द्र में त्रिकूटाकार सच्चिदानन्दमयी महाशक्ति परमात्मा शिव से परमोच्च आत्माभिव्यक्ति प्रकट करती है । इसे आत्मानुभव का चरम स्थान पूर्णगिरि पीठ भी कहा गया है। यहाँ प्रापंचिक चेतना पूर्णतया रूपान्तरित होकर स्वयं को सर्वसमाहारी, सर्वसमायोजक, सर्वातिक्रामक चरम चेतना के रूप में अनुभव करने लगती है । मूलाधार चक्र से कुण्डलिनी शक्ति को अपने सर्वाधिक प्रियतम शिव से पुनर्मिलन की पवित्र यात्रा इस चक्र में पहुँच कर अपना ध्येय प्राप्त कर लेती है । योगी आत्मपूर्णता प्राप्त कर लेता है । गोरक्षशतक में गोरखनाथजी ने षट् चक्र ही निरूपित किये हैं । चतुर्दलं स्यादाधारं स्वाधिष्ठानं च षट्दलम् । नाभौ दशदलं पद्मं सूर्यसंख्यादलं हृदि ॥ कण्ठे स्यात् षोडशदलं भ्रूमध्ये द्विदलं तथा । सहस्रदलमाख्यातं ब्रह्मरन्ध्रे महापथे ॥ ( गोरक्षशतक १५, १६ ) भ्रू मध्य में स्थित आज्ञा चक्र के ऊपर ब्रह्मरन्ध्र के महापथ में सहस्रार कमल स्थित है । मत्स्येन्द्र नाथ ने भी छः चक्र बताये हैं और कंठचक्र के ऊपर छठां चक्र ज्ञानचक्र कहा है । इस चक्र में योगी विश्राम करता है । ग्यांनं चक्रै लीजै विश्राम । ( मच्छीन्द्रगोरषबोध ५४ ) 'गोरखबानी' में अष्टचक्र ही महायोगी गोरखनाथ द्वारा वर्णित हैं । अष्टचक्र नामक लघु रचना में चक्रसाधना का स्वारस्य निरूपित है । यह पूरी रचना इस तरह है— सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ४६