सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंॐ गोरष देव अष्ट चक्र वोलिये घट भीतर । ये कौण-कौण वोलिये । अवधू प्रथमें आधार चक्र वोलिये । गुदा अस्थांने, चत्र दल कंवल, षटसै साँस । तिस चक्र ऊपरि द्रिष्ट चक्र, लिंग अस्थांने, षट् दल कंवल षटसै साँस । तिस चक्र ऊपरि मणिपुर चक्र, नाभि अस्थांने, दस दल कंवल, षटसै साँस । तिस चक्र ऊपरि अनहद चक्र, हिरदा सथांने, द्वादश कंवल, षट सै साँस । तिस चक्र ऊपरि विसुध चक्र, कंठसथांने, षोडश कंवल, एक सहंसर साँस । अजपा गायत्री पारब्रह्म ध्यान । तिस चक्र ऊपरि अगनि चक्र, नेत्र सथांने षोडश दल कंवल एक सहस्त्र साँस, अजपा गायत्री पारब्रह्म ध्यान । तिस चक्र ऊपरि गिनांन चक्र, ब्रह्मं'ड सथांने, एक सहंस्र दल कंवल एक सहस्र साँस । अजपा गायत्री पारब्रह्म ध्यान । तिस चक्र ऊपरि सुछिम चक्र, विग्यांन सथांने एक बीस सहस्र दल कंवल । ए अष्ट कमल का जांणौ भेव । आपै करता आपै देव । ( गोरखबानी अष्टचक्र ) स्पष्ट है कि महायोगी गोरखनाथ ने चक्र-साधना का परमफल स्वरूपाव- स्थानपूर्वक परम शून्य में परमात्मा शिव का साक्षात्कार बताया है । चक्र साधना की अन्तर्ज्योति से सम्पूर्ण अखण्ड, अनन्त, निरञ्जन सच्चिदानन्द में आत्मा प्रतिष्ठित होकर परमात्मस्वरूप हो जाता है । सोलह आधार अथ षोडशाधारः कथ्यते तत्र प्रथमं पदाङ्गुष्ठाधारं तत्राग्रतस्तेजोमयं ध्यायेत् । दृष्टिः स्थिरा भवति ॥ १० ॥ अब यथाक्रम सोलह आधारों का निरूपण किया जाता है । पहला पादांगुष्ठाधार है । उसके अग्रभाग में तेजोमय स्वरूप का ध्यान करना चाहिये, इस ध्यान से दृष्टि स्थिर होती है ॥ १० ॥ विशेष—हमारे शरीर के भीतर अनेक तेजोमय स्थान अथवा केन्द्र हैं, जिन का ध्यान करने से योगसाधक को अपने प्राण, मन और विन्दु के लय में बड़ी सुविधा होती है । महायोगी गोरखनाथजी ने ऐसे प्रधान केन्द्रों को चक्र कहा है और उपर्युक्त तेजोमय स्थानों को आधार कहा है, जो सोलह हैं । आधार ५० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति