भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

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का शाब्दिक अर्थ है धारण करने वाला। आधार के माध्यम से जैविक तथा मानसिक कार्यों के मुख्य स्थानों का संकेत मिलता है, जिन्हें स्वेच्छा से वश में कर योगी आन्तरिक साधना में आगे बढ़ता है। प्रत्येक पद के अंगूठे में जैविक कार्य का केन्द्र है। इस पर ध्यान केन्द्रित करने से नेत्र और पैर के अंगूठे तक प्रवाहित तेज पर दृष्टि एकाग्र होती है। पैर के अंगूठे के तन्तुओं में और नेत्र के स्नायुओं में तेजोमय सम्बन्ध है। द्वितीयं मूलाधारसूत्रं वामपाष्णिाना निःपीडयितव्यम् । तत्राग्निदीपनं भवति ॥ ११ ॥ दूसरा मूलाधार है। इसके सीवन को बायें पैर की एड़ी से दबा कर बैठना चाहिये। इससे शरीर में तेज की वृद्धि होती है। शरीर में स्थित अग्नि प्रदीप्त होती है ॥ ११ ॥ विशेष—यह कुण्डलिनी शक्ति प्रथम आधार और सुषुम्ना नाड़ी का उद्गम स्थान है। इसी स्थान पर सबसे पहले मानसिक और जैविक शक्ति को एकाग्र कर सुषुम्ना मार्ग से ऊपर चढ़ाने—ऊर्ध्वमुखी करने का अभ्यास किया जाता है। अपने बायें पैर की एड़ी से मूलाधार के सीवन को दबा कर बैठने से अग्निदीपन होता है और शक्ति नीचे की ओर प्रवाहित न होकर ऊर्ध्वमुखी हो उठती है। शक्ति का जागरण आरम्भ हो जाता है और वह आध्यात्मिक अथवा आत्ममुखी हो जाती है, उसमें परमेश्वर शिव से मिलने की अभिलाषा तीव्र हो उठती है। तृतीयं गुदाधारं विकाससंकोचनेन निराकुञ्चयेत् । अपान- वायुः स्थिरो भवति ॥ २२ ॥ तीसरा गुदाधार है। इस स्थान पर गुदा का संकोच-विकास—आकुञ्चन और संकोचन करना चाहिये । इस क्रिया से अपानवायु स्थिर हो जाती है ॥ १२ ॥ विशेष—गुदाधार की स्थिति गुदास्थान में बतायी जाती है। इस आधार के द्वारा अपान वायु शरीर के मल और दोषपूर्ण गन्दगी को शरीर से बाहर निकाल कर उदर को निर्मल करती है और प्राणवायु से ऐक्य स्थापित कर जैविक और मानसिक शक्ति को विकसित करती है। इस कार्य की पूर्णता के लिये साधक को गुदा का आकुञ्चन और संकोच करना—उसे सिकोड़ना और फैलाना सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ५१