सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषट्चक्राणि क्रमाद् ध्यात्वा हूं हंसमनुना सुधीः ॥ चैतन्यमानयेद् देवीं निद्रितां यां भुजङ्गिनीम् । जीवेन सहितां शक्तिं समुत्थाप्य कराम्बुजे ॥ शक्तिमयः स्वयं भूत्वा परशिवेन सङ्गमम् । नानासुखं विहारं च चिन्तयेत् परमं सुखम् ॥ ( घेरण्डसंहिता ३।३७-४० ) गुदा से उपस्थ—मेढ्रपर्यन्त योनिदेश कहा जाता है। इसी का संकोचन कर योनि-मुद्रा की क्रिया की जाती है। इस योनिमुद्रा तथा लिङ्ग के संकोच से साधक तीन ग्रन्थियों-ब्रह्मग्रन्थि, विष्णुग्रन्थि और रुद्रग्रन्थि का भेदन कर सहस्रार में बिन्दु को ऊर्ध्वमुख कर शिव-शक्ति के तादात्म्य के आनन्द का उपभोग करता है। तीनों ग्रन्थियों का भेदन कुण्डलिनी-जागरण की प्रक्रिया का एक अंग है। अधोगतिमपानं वै ऊर्ध्वंगं कुरुते बलात् ॥ आकुञ्चनेन तं प्राहुर्मूलबन्धोऽयमुच्यते । अपानश्चोर्ध्वगो भूत्वा वह्निना सह गच्छति ॥ प्राणस्थानं ततो वह्निः प्राणापानौ च सत्वरम् । मिलित्वा कुण्डलींयाति प्रसुप्ता कुण्डलाकृतिः ॥ तेनाग्निना च संतप्ता पवनेनैव चालिता । प्रसार्य स्वशरीरं तु सुषुम्नावदनान्तरे ॥ ब्रह्मग्रन्थिं ततो भित्वा रजोगुणसमुद्भवम् । सुषुम्नावदने शीघ्रं विद्युल्लेखेवसंस्फुरेत् ॥ विष्णुग्रन्थिं प्रयात्युच्चैः सत्वरंहृदि संस्थिता। ऊर्ध्वंगच्छति यच्चास्ते रुद्रग्रन्थिं तदुद्भवम् ॥ ( योगकुण्डल्युपनिषत् १।६३-६८ ) अपानवायु का लिङ्गसंकोचन द्वारा सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश करना ही ब्रह्मग्रन्थि का भेदन है, अपानका उठकर हृदयस्थ प्राण के आकर्षण से ऊर्ध्वमुख होना विष्णुग्रन्थि का भेदन है और इस प्राणमयी महाशक्ति कुण्डलिनी के रूप में आज्ञाचक्र का भेदन कर सहस्रार में पहुँचना ही रुद्रग्रन्थिका भेदन है। आज्ञाचक्र में ही रुद्रग्रन्थि की स्थिति बतायी गयी है । बिन्दु को वज्रोली मुद्रा के अभ्यास द्वारा सहस्रार में भ्रमरगुफा में पहुँचाने में मेढ्राधार की महती भूमिका है। वज्रोली मुद्रा की सिद्धि के सम्बन्ध में सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ५३