भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

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हठयोगप्रदीपिका में निरूपण है कि बिन्दु को क्षरित होने से रोकने के लिए उसे लिङ्ग के संकोच द्वारा ऊर्ध्वमुख करना चाहिये। मेहनेन शनैः सम्यगूर्ध्वाकुञ्चनमभ्यसेत् । पुरुषोऽप्यथवा नारी वज्रोलीसिद्धिमाप्नुयात् ॥ ( हठयोगप्रदीपिका ३।८५ ) वज्रोली के अभ्यास से योगी मृत्यु को जीत लेता है। वीर्य का स्खलन अथवा क्षरण ही मृत्यु है और उसे शरीर में धारण करना ही जीवन है। योगाभ्यास में निपुण योगी को उपस्थ—लिंग इन्द्रिय के छिद्र से ( वज्रोली की विधि से ) वीर्य का ऊपर की ओर आकर्षण करना चाहिये अथवा योनिमुद्रा के द्वारा अभ्यास करना चाहिये। वीर्य प्राण से संयुक्त है, इसलिये जैविक शक्ति, मानसिक और बौद्धिक विकास तथा शारीरिक कान्ति की वृद्धि के लिये वज्रोली के द्वारा वीर्य के ऊर्ध्वाकर्षण का अभ्यास सिद्ध होने पर योगी संकल्पसिद्ध हो जाता है। मेढ्राधार में स्वाधिष्ठान चक्र अवस्थित है। स्व का अर्थ ही प्राण होता है। भोगवासना की तृप्ति द्वारा वीर्य को स्खलित होने से बचाने के लिये वज्रोली मुद्रा का अभ्यास करना अत्यावश्यक है। इससे प्राण-शक्ति ब्रह्मग्रन्थि, विष्णुग्रन्थि और रुद्रग्रन्थि का भेदन कर शरीर को सौन्दर्य, बल और तेज प्रदान करती है । पञ्चममोड्याणाधारयोर्बन्धनान्मलमूत्रसंकोचनं भवति ॥ १४ ॥ पाँचवां उड्डियाण आधार है। ( यह लिङ्ग मूल तथा नाभिमूल के मध्य में स्थित है।) इस आधार के बन्ध—नियन्त्रण से मलमूत्र का संकोचन ( अल्पता ) होता है ॥ १४ ॥ विशेष--उड्डियाण आधार का नियन्त्रण करने से योगी अपनी आँतड़ियों और मूतेन्द्रिय पर नियन्त्रण कर सकता है, इनके कष्टों का उपचार कर सकता है। प्राण-शक्ति इस आधार की क्रिया और नियन्त्रण से ऊपर की ओर तेजी से उठती है, मानो उड़ती है। इसके अभ्यास से नाभि-शुद्धि होती है, वायु की शुद्धि होती है, जठरानल बढ़ता है, शरीर को पोषण मिलता है, रस का संचार होता है। वृद्ध भी उड्डियान के बन्धाधार से तरुण हो जाता है। इस आधार पर ही उड्डियान बन्ध की क्रिया पूरी होती है। नाभि के ऊपर-नीचे के भाग ५४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति