सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमें आकर्षण—तान करना चाहिये । छः मास में ही मृत्यु पर साधक विजय प्राप्त कर लेता है । बद्धो येन सुषुम्नायां प्राणस्तूड्डीयते यतः । तस्मादुड्डीयनाख्योऽयं योगिभिः समुदाहृतः । ( हठयोगप्रदीपिका ३ । ५५ ) जिस बन्ध से बद्ध प्राण उड़कर ( सहज ऊर्ध्वमुख होकर ) सुषुम्ना नाड़ी में पहुँच जाता है, वही योगियों द्वारा उड्डियान बन्ध कहा जाता है । उदरे पश्चिमं तानं नाभेरुर्ध्वं च कारयेत् । उड्डीयानो ह्यसौ बन्धो मृत्युमातङ्गकेसरी ॥ ( हठयोगप्रदीपिका ३ । ५७ ) नाभि में ऊपर और नीचे उदर में पीछे की ओर इसतरह आकर्षण करे कि दोनों भाग पीछे पीठ तक पहुँच जायं, यह बन्ध मृत्युरूपी हाथी के लिये साक्षात् सिंह के समान है । षष्ठे नाभ्याधार ओङ्कारमेकचित्तेनोच्चारिते नादलयो भवति ॥ १५ ॥ छठाँ नाभि-आधार है । इसमें एकाग्रचित्त से ॐकार के उच्चारण से नादलय होता है ॥ १५ ॥ विशेष—नाभि के मूल में एकाग्र मन से प्रणव का ध्यान करने से नादलय उत्पन्न होता है । मूलाधार में स्थित बिंदुरूपा पराशक्ति से उद्भूत शब्द ही नाद है । यह बीजांकुर के समान सूक्ष्म है । नाभि-आधार मणिपुर चक्र का स्थान है । जैविक कार्य का यह एक प्रमुख केन्द्र है । यहाँ सूक्ष्म नाद की अभिव्यक्ति ही शब्द ब्रह्म है । यह नाद ही अपरिवर्तनीय ( शाश्वत ) पारमार्थिक परम चैतन्य है । यही शब्द ब्रह्म है, जो मूलाधार में सूक्ष्म नादरूप में अभिव्यक्त होता है, यह शक्ति से अभिन्न होता है, यह विन्दु या बीज से तादात्म्य प्राप्त कर लेता है । मूलाधार में नादशक्ति से तदाकार रहता है । स्वाधिष्ठान में यह विन्दु या बीज से तद्रूप होता है और मणिपुर चक्र या नाभि-आधार में सूक्ष्म-क्रमिक सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ५५