भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

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नाद के रूप में प्रकट होता है। योगी इसे योगदृष्टि से देख सकता है। यह प्रणव, ॐ की शाश्वत और मधुर एकरस ध्वनि है। अक्षरः परमो नादः शब्दब्रह्मेति कथ्यते। मूलाधारगता शक्तिः स्वाधारा विन्दुरूपिणी तस्यां उत्पद्यते नादः सूक्ष्मबोजादिवाङ्कुरः। तां पश्यन्तीं विदुर्विश्वं यया पश्यन्ति योगिनः । ( योगशिखोपनिषद् ३ १२-३) महायोगी गोरखनाथजी ने नाभि आधार में शुद्ध नाद पर ध्यान केन्द्रित करने पर विशेष बल दिया है। इसका अभ्यास कान के छिद्र अंगुलियों से बन्द कर ॐ के उच्चारण द्वारा किया जा सकता है। सप्तमे हृदयाधारे प्राणं निरोधयेत् कमलविकासो भवति ॥ १६ ॥ सातवाँ हृदयाधार है। इसमें प्राणवायु के निरोध ( संयमन ) से अष्टदल कमल ( अनाहत चक्र ) का विकास होता है ।। १६ ।। विशेष—प्राणवायु का स्थान हृदय है। हृदय-आधार में प्राणशक्ति को संयमित करने से अनाहत चक्र, जो अधोमुख अष्टदल कमल है, ऊर्ध्वमुख होकर खिल जाता है। अधोमुख कमल का तात्पर्य है जीवात्मा साधक की संसार के विषय-सुख की कामनापूर्ति की आसक्ति और इस अष्टदल कमल के ऊर्ध्वमुख खिलने का तात्पर्य है जीवात्मा साधक की परमात्ममुखी आध्यात्मिक उन्नति। ( महायोगी गोरखनाथजी ने 'गोरक्षशतक' आदि रचनाओं में इस अनाहत चक्र को द्वादशदल कमल कहा है ।) हृदयाधार में प्राणशक्ति कुण्डलिनी विष्णुग्रन्थि का भेदन कर ऊपर उठ जाती है। हृदय-आधार जैविक कार्य का महत्वपूर्ण स्थान है, यह प्राण-अपान वायुओं के ऐक्य का स्थान है। समस्त ध्वनियों से ध्यान को हटाकर यदि इस हृदय-आधार पर केन्द्रित किया जाय तो अनाहत नाद का स्पष्ट श्रवण होता है। कुम्भक प्राणायाम की विधि से इस आधार में प्राण को केन्द्रित करने से योगी की लोकोत्तरानन्दप्राप्ति की यात्रा विशेष गतिमयी हो जाती है। ५६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति