सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ९४ ) शिवनन्दन लाल जी दर (पूर्व कुल सचिव, का० हि० वि० वि०) का आभारी हूँ, क्योंकि उनसे मुझे निरन्तर ज्योतिष गणित आदि के शोधपूर्ण कार्यों को करने की प्रेरणा मिलती रही है। प्रस्तुत ग्रन्थ के प्रूफ शोधन का कार्य साहित्याचार्य श्री पण्डित जनार्दन पाण्डेय जी ने बड़े श्रम से किया है, अतएव उन्हें हार्दिक धन्यवाद देकर मनस्तोष करता हूँ। ग्रन्थ के सोपपत्तिक व्याख्यान लिखने में अपने चतुर्थपुत्र श्री तारकेशचन्द्र जोशी (आचार्य ज्योतिष) के लगन से अध्ययनाध्यापन में उत्पन्न शंका समाधान में ग्रहगणित खगोल विषय के समन्वयात्मक रुचिकर शास्त्रार्थ से जो सहयोग प्राप्त हुआ, उसके लिए हृदय से आशीर्वाद देकर आशा करता हूँ वह वंशपरम्परागत इस विद्या के शोधपूर्ण विवर्धन में अग्रसरित होते रहेगा। साथ ही श्लोकानुक्रमणिका बनाने में मेरे दौहित्र चि० आशीष पंत ने सहयोग दिया, अतः उसे शुभाशीर्वाद देता हूँ कि वह सुयोग्य विद्यार्थी बनेगा। दीर्घकाल से बुद्धिगत प्रस्तुत ग्रन्थ प्रकाशन की मेरी प्रबल इच्छा रही है जो आज इस अतिकठिन वार्धक्य में सफल हो रही है, इसे मैं अपना अहोभाग्य मानता हूँ। वार्धक्य अवस्था की विस्मृतियों के बाहुल्य के बावजूद यह प्रकाशन सत्पात्र शिष्य वर्ग एवं विज्ञ पाठकों के लाभाय होगा, शुभाशावादी होकर मुझे परम सन्तोष की अनुभूति हो रही हैं। पाठकवृन्द विस्मृतियों और त्रुटियों पर अवश्य ध्यान देंगे एवं सूचित करेंगे जिससे भविष्य के संस्करणों में विशेष स्वच्छता आती रहेगी। इस ग्रन्थ प्रकाशन के स्रोत श्री विश्वेश्वर राजधानी श्री काशी के बाबा विश्वनाथ एवं माता अन्नपूर्णा का बारम्बार स्मरण करता हूँ क्योंकि 'देव' शब्द की सार्थकता का यही एक मूर्त्तरूप है, कहा भी गया है— "महेशान्नापरो देवो महिम्नो नापरास्तुतिः । अघोरान्नापरो मन्त्रो नास्ति तत्त्वं गुरोः परम् ॥" गुरु तत्त्व के विचार में जीवन की इति श्री हो रही है, मात्र एक भगवान् शङ्कर जगद्गुरु ही नहीं अपि वे ब्रह्माण्ड गुरु और ब्रह्माण्ड नायक हैं, इसलिये "ग" कार को ज्ञानसम्पत्ति, "र" कार को प्रकाशपुञ्ज "उ" कार को शिव तादात्म्य भी कहा गया है— "ग" कारो ज्ञान सम्पत्तौ "रे" फस्तत्र प्रकाशकः । "उ" कारः शिवतादात्म्यम् गुरुरित्यभिधीयते ॥ गुरु के साथ शिष्य का समवाय सम्बन्ध है— "शरीरमर्थप्राणांश्च सद्गुरुभ्यो निवेद्य यः । गुरुभ्यः शिक्षते योगं शिष्य इत्यभिधीयते ॥"