सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ९३ ) व्याख्यान मैंने किया एवं ज्योतिष जगत में उसे सराहा भी गया और उनके दूसरे, तीसरे संस्करण भी प्रकाशित हुये और हो रहे हैं। फिर भी “ग्रहगोलाध्याय” के सोप- पत्तिक व्याख्यान न हो पाने से भीतर ही भीतर मानसिक वेदना से दुःखी तो था हो और ऐसी वार्धक्य की स्थिति में इस अधूरे कार्य को कैसे पूरा किया जाय, सोचकर ही रह जाता था। विकट की ऐसी स्थिति में मेरे तृतीय पुत्र दिनेश जोशी (एम० ए०) ने बारम्बार मुझसे कहा और अनुरोध किया कि इस कार्यं को अवश्य पूरा कर दें। चि० दिनेश के बार-बार कहने एवं अनुरोध करने पर एकाएक इस ओर प्रवृत्त हो गया एवं चि० दिनेश जिसे मैं पूर्ण शुभाशीर्वाद देता हूँ क्योंकि उसी के पूर्ण सहयोग से ५-६ मास में पाण्डुलिपि तैयार हो गई। तत्पश्चात् मोतीलाल बनारसी दास (दिल्ली, पटना, मद्रास, वाराणसी) के सहयोग से यह प्रकाशन प्रकाशित हो सका। यह माता अन्नपूर्णा एवं बाबा विश्वनाथ तथा गुरुवर्यों और पूज्य पूर्वजों का ही शुभाशीर्वाद कहा जावेगा। अशीति (८०) वर्ष के जर्जर शरीर के इस वार्धक्य में पदे-पदे स्मृति क्षीणता, इन्द्रियों की अतिशिथिल गति के बावजूद यह प्रकाशन हो जाने से अवश्य मेरी मनस्तुष्टि हो गई है। निश्चय ही इस प्रकार के इस प्रकाशन में मेरी कुलपरम्परा के महान् ज्योतिर्विद पूर्वजों का और स्थान, ग्राम, वास्तु एवं कुलदेवी और कुलदेवों की (विशेषतः मेरे जन्मस्थान कूर्माचल 'जुनायल' ग्राम, अल्मोड़ा, उ० प्र०) जो आध्यात्मिक देन आज तक मुझे मिल रही हैं वह एक रहस्य है, जिसका व्याख्यान मनोऽन्तर्गत ही हैं, यह सफल आशीर्वाद जीवन के अन्तिम क्षणों तक मुझे मिलेगा ही। अतः पुनरपि उक्त परम्परा को बारम्बार कोटिशः प्रणाम करते हुये, अनेक ग्रन्थों के लेखक अपने द्वितीय अग्रज एवं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के सुयोग्य विद्वान् छात्र स्वर्गीय श्री पं० हरिशङ्कर जोशी साहित्याचार्य, एम० ए० जिन्हें उनके प्रसिद्ध “वैदिकविश्वदर्शन” ग्रन्थ पर प्रसिद्ध “मङ्गलाप्रसाद पुरस्कार” भी प्राप्त हुआ था, उनके चरणों में यह कृति सादर समर्पण करते हुये उन्हें अपनी श्रद्धा भक्ति से स्मरण कर रहा हूँ। उन्हीं की प्रेरणा से सुदूर अल्मोड़ा जनपद के ज्योतिर्विदों से संसेवित प्रसिद्ध 'जुनायल' ग्राम से स्वर्गीय पूज्य मेरे पिता ज्योतिर्विद पूज्य श्री १०८ श्री पं० हरिदत्त जोशी ने मुझे काशी में गणित ज्योतिर्विद्या के अध्ययन के लिये उन्हीं के चरणों में भेजा था। वैदुष्य कुल परम्परा की इस अनुपम देन को बारम्बार स्मरण करते हुये आशा करता हूँ कि यह ज्ञानलता अन- वरत वर्द्धमान होती रहेगी। राष्ट्र के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रोफेसर श्री “जयन्त नार्लीकर” (खगोल भौतिकी विभाग, टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च, बम्बई) ने प्रस्तुत ग्रन्थ के महत्व को समझकर अपने निष्पक्ष विचारों से ग्रन्थ को सुशोभित किया है, अतएव उन्हें हार्दिक शुभाशीर्वाद के साथ धन्यवाद देता हूँ। साथ ही मैं अपने ज्येष्ठ अभिन्न मित्र श्री पण्डित