सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ९२ ) का सहयोग नहीं लिया गया है, सहयोग है गुरु परम्परा के उन गुरुवर्यों का (गुरुणां गुरु म० म० पं० सुधाकर द्विवेदी के शिष्य प्राच्य एवं धर्म संकाय, का० हि० वि० वि० के प्रातः स्मरणीय श्री १०८ पूज्य गुरुचरण पं० बलदेव पाठक एवं १०८ गुरु श्री राम- यत्न ओझा) जिनका भौतिक शरीर आज तो नहीं है किन्तु जो मेरे मानस मन्दिर में उनका भौतिक रूप और उनका अशेष खगोल पाण्डित्य आज तक पूर्णरूपेण मेरी बुद्धि में विद्यमान है, जैसा उन्होंने पढ़ाया था तदनुसार इस स्मृति के साथ ही अपने बौद्धिक ज्ञान, उपपत्तियों, तर्कों के साथ केदारदत्त की यह लेखनी सोपत्तिक "केदारदत्तः" व्याख्यान लिखने में सफल हुई है । भास्कराचार्य के सिद्धान्त शिरोमणि ग्रन्थ प्रकाशन का बीज मेरी बुद्धि में अध्ययन काल से ही अङ्कुरित हो गया था । काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्राच्य विद्या संकाय में ज्योतिष गणित सिद्धान्त के अध्ययन के उपरान्त ब्रह्मर्षि महामना पं० मदनमोहन मालवीय (कुलपति काशी हिन्दू विश्वविद्यालय) ने गुरुवर्य पू० पं० बलदेव पाठक प्राध्यापक ज्योतिष विभाग के सुझाव पर अनेक साम्प्रदायिक राजनीतिर्यों का सामना करते हुए भी मेरी नियुक्ति प्राच्य विद्या संकाय के ज्योतिष विभाग में १३ सितम्बर १९३८ में की । तत्पश्चात् अनेक असोढ्य संकटों का सामना करते हुए तथा गणित ज्योतिष में शोध आदि भूरिश्रम के कार्यों को करते हुए सिद्धान्तशिरोमणि (ग्रहगणिता- ध्याय) की सोपपत्तिक "दीपिका" (संस्कृत) एवं "शिखा" (हिन्दी) व्याख्यान मैंने लिखी, जिसका प्रकाशन व्यय काशी हिन्दू विश्वविद्यालय एवं केन्द्रीय विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा हुआ । समग्र यह ग्रहगणिताध्याय का प्रकाशन तीन भागों में हो सका है । प्रथम भाग में मध्यमाधिकार, द्वितीय भाग में स्पष्टाधिकार से त्रिप्रश्नाधिकार तथा तृतीय भाग में पर्व सम्भव से पाताधिकार तक के विषयों का वर्णन है । प्रथम भाग का प्रकाशन सन् १९६१ एवं द्वितीय, तृतीय भाग का प्रकाशन सन् १९६४ में हुआ है । ज्योतिष विभाग, का० हि० वि० वि० में गणित ज्योतिष सिद्धान्त के आचार्य तक के छात्रों को सपरिष्कार ग्रन्थों के अध्यापन के साथ "सिद्धान्तशिरोमणि" के "ग्रह- गणिताध्याय" भाग का प्रकाशन हो सका था । इस प्रकाशन से राष्ट्र में ज्योतिष गणित शास्त्रानुरागी समाज को सन्तोष हुआ और मेरे प्रति गणित ज्योतिष के शिष्य एवं विज्ञ पाठक वर्ग ने हार्दिक श्रद्धा प्रकट करते हुये यत्र तत्र सर्वत्र से श्री भास्कराचार्य के "सिद्धान्तशिरोमणि" के "ग्रहगोलाध्याय" का भी वैज्ञानिक पद्धति की भाँति से व्याख्यान लिखने का अनुरोध किया । किन्तु जन्मजात शारीरिक रोग से पीड़ित एवं अनेक अन्य कठिनाइयों के कारण "ग्रहगोलाध्याय" की सोपपत्तिक व्याख्यान न लिख सका था । जबकि इस बीच फलित ज्योतिष के अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थों का सोपपत्तिक