सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
( ९२ ) का सहयोग नहीं लिया गया है, सहयोग है गुरु परम्परा के उन गुरुवर्यों का (गुरुणां गुरु म० म० पं० सुधाकर द्विवेदी के शिष्य प्राच्य एवं धर्म संकाय, का० हि० वि० वि० के प्रातः स्मरणीय श्री १०८ पूज्य गुरुचरण पं० बलदेव पाठक एवं १०८ गुरु श्री राम- यत्न ओझा) जिनका भौतिक शरीर आज तो नहीं है किन्तु जो मेरे मानस मन्दिर में उनका भौतिक रूप और उनका अशेष खगोल पाण्डित्य आज तक पूर्णरूपेण मेरी बुद्धि में विद्यमान है, जैसा उन्होंने पढ़ाया था तदनुसार इस स्मृति के साथ ही अपने बौद्धिक ज्ञान, उपपत्तियों, तर्कों के साथ केदारदत्त की यह लेखनी सोपत्तिक "केदारदत्तः" व्याख्यान लिखने में सफल हुई है । भास्कराचार्य के सिद्धान्त शिरोमणि ग्रन्थ प्रकाशन का बीज मेरी बुद्धि में अध्ययन काल से ही अङ्कुरित हो गया था । काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्राच्य विद्या संकाय में ज्योतिष गणित सिद्धान्त के अध्ययन के उपरान्त ब्रह्मर्षि महामना पं० मदनमोहन मालवीय (कुलपति काशी हिन्दू विश्वविद्यालय) ने गुरुवर्य पू० पं० बलदेव पाठक प्राध्यापक ज्योतिष विभाग के सुझाव पर अनेक साम्प्रदायिक राजनीतिर्यों का सामना करते हुए भी मेरी नियुक्ति प्राच्य विद्या संकाय के ज्योतिष विभाग में १३ सितम्बर १९३८ में की । तत्पश्चात् अनेक असोढ्य संकटों का सामना करते हुए तथा गणित ज्योतिष में शोध आदि भूरिश्रम के कार्यों को करते हुए सिद्धान्तशिरोमणि (ग्रहगणिता- ध्याय) की सोपपत्तिक "दीपिका" (संस्कृत) एवं "शिखा" (हिन्दी) व्याख्यान मैंने लिखी, जिसका प्रकाशन व्यय काशी हिन्दू विश्वविद्यालय एवं केन्द्रीय विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा हुआ । समग्र यह ग्रहगणिताध्याय का प्रकाशन तीन भागों में हो सका है । प्रथम भाग में मध्यमाधिकार, द्वितीय भाग में स्पष्टाधिकार से त्रिप्रश्नाधिकार तथा तृतीय भाग में पर्व सम्भव से पाताधिकार तक के विषयों का वर्णन है । प्रथम भाग का प्रकाशन सन् १९६१ एवं द्वितीय, तृतीय भाग का प्रकाशन सन् १९६४ में हुआ है । ज्योतिष विभाग, का० हि० वि० वि० में गणित ज्योतिष सिद्धान्त के आचार्य तक के छात्रों को सपरिष्कार ग्रन्थों के अध्यापन के साथ "सिद्धान्तशिरोमणि" के "ग्रह- गणिताध्याय" भाग का प्रकाशन हो सका था । इस प्रकाशन से राष्ट्र में ज्योतिष गणित शास्त्रानुरागी समाज को सन्तोष हुआ और मेरे प्रति गणित ज्योतिष के शिष्य एवं विज्ञ पाठक वर्ग ने हार्दिक श्रद्धा प्रकट करते हुये यत्र तत्र सर्वत्र से श्री भास्कराचार्य के "सिद्धान्तशिरोमणि" के "ग्रहगोलाध्याय" का भी वैज्ञानिक पद्धति की भाँति से व्याख्यान लिखने का अनुरोध किया । किन्तु जन्मजात शारीरिक रोग से पीड़ित एवं अनेक अन्य कठिनाइयों के कारण "ग्रहगोलाध्याय" की सोपपत्तिक व्याख्यान न लिख सका था । जबकि इस बीच फलित ज्योतिष के अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थों का सोपपत्तिक
( ९३ ) व्याख्यान मैंने किया एवं ज्योतिष जगत में उसे सराहा भी गया और उनके दूसरे, तीसरे संस्करण भी प्रकाशित हुये और हो रहे हैं। फिर भी “ग्रहगोलाध्याय” के सोप- पत्तिक व्याख्यान न हो पाने से भीतर ही भीतर मानसिक वेदना से दुःखी तो था हो और ऐसी वार्धक्य की स्थिति में इस अधूरे कार्य को कैसे पूरा किया जाय, सोचकर ही रह जाता था। विकट की ऐसी स्थिति में मेरे तृतीय पुत्र दिनेश जोशी (एम० ए०) ने बारम्बार मुझसे कहा और अनुरोध किया कि इस कार्यं को अवश्य पूरा कर दें। चि० दिनेश के बार-बार कहने एवं अनुरोध करने पर एकाएक इस ओर प्रवृत्त हो गया एवं चि० दिनेश जिसे मैं पूर्ण शुभाशीर्वाद देता हूँ क्योंकि उसी के पूर्ण सहयोग से ५-६ मास में पाण्डुलिपि तैयार हो गई। तत्पश्चात् मोतीलाल बनारसी दास (दिल्ली, पटना, मद्रास, वाराणसी) के सहयोग से यह प्रकाशन प्रकाशित हो सका। यह माता अन्नपूर्णा एवं बाबा विश्वनाथ तथा गुरुवर्यों और पूज्य पूर्वजों का ही शुभाशीर्वाद कहा जावेगा। अशीति (८०) वर्ष के जर्जर शरीर के इस वार्धक्य में पदे-पदे स्मृति क्षीणता, इन्द्रियों की अतिशिथिल गति के बावजूद यह प्रकाशन हो जाने से अवश्य मेरी मनस्तुष्टि हो गई है। निश्चय ही इस प्रकार के इस प्रकाशन में मेरी कुलपरम्परा के महान् ज्योतिर्विद पूर्वजों का और स्थान, ग्राम, वास्तु एवं कुलदेवी और कुलदेवों की (विशेषतः मेरे जन्मस्थान कूर्माचल 'जुनायल' ग्राम, अल्मोड़ा, उ० प्र०) जो आध्यात्मिक देन आज तक मुझे मिल रही हैं वह एक रहस्य है, जिसका व्याख्यान मनोऽन्तर्गत ही हैं, यह सफल आशीर्वाद जीवन के अन्तिम क्षणों तक मुझे मिलेगा ही। अतः पुनरपि उक्त परम्परा को बारम्बार कोटिशः प्रणाम करते हुये, अनेक ग्रन्थों के लेखक अपने द्वितीय अग्रज एवं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के सुयोग्य विद्वान् छात्र स्वर्गीय श्री पं० हरिशङ्कर जोशी साहित्याचार्य, एम० ए० जिन्हें उनके प्रसिद्ध “वैदिकविश्वदर्शन” ग्रन्थ पर प्रसिद्ध “मङ्गलाप्रसाद पुरस्कार” भी प्राप्त हुआ था, उनके चरणों में यह कृति सादर समर्पण करते हुये उन्हें अपनी श्रद्धा भक्ति से स्मरण कर रहा हूँ। उन्हीं की प्रेरणा से सुदूर अल्मोड़ा जनपद के ज्योतिर्विदों से संसेवित प्रसिद्ध 'जुनायल' ग्राम से स्वर्गीय पूज्य मेरे पिता ज्योतिर्विद पूज्य श्री १०८ श्री पं० हरिदत्त जोशी ने मुझे काशी में गणित ज्योतिर्विद्या के अध्ययन के लिये उन्हीं के चरणों में भेजा था। वैदुष्य कुल परम्परा की इस अनुपम देन को बारम्बार स्मरण करते हुये आशा करता हूँ कि यह ज्ञानलता अन- वरत वर्द्धमान होती रहेगी। राष्ट्र के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रोफेसर श्री “जयन्त नार्लीकर” (खगोल भौतिकी विभाग, टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च, बम्बई) ने प्रस्तुत ग्रन्थ के महत्व को समझकर अपने निष्पक्ष विचारों से ग्रन्थ को सुशोभित किया है, अतएव उन्हें हार्दिक शुभाशीर्वाद के साथ धन्यवाद देता हूँ। साथ ही मैं अपने ज्येष्ठ अभिन्न मित्र श्री पण्डित
( ९४ ) शिवनन्दन लाल जी दर (पूर्व कुल सचिव, का० हि० वि० वि०) का आभारी हूँ, क्योंकि उनसे मुझे निरन्तर ज्योतिष गणित आदि के शोधपूर्ण कार्यों को करने की प्रेरणा मिलती रही है। प्रस्तुत ग्रन्थ के प्रूफ शोधन का कार्य साहित्याचार्य श्री पण्डित जनार्दन पाण्डेय जी ने बड़े श्रम से किया है, अतएव उन्हें हार्दिक धन्यवाद देकर मनस्तोष करता हूँ। ग्रन्थ के सोपपत्तिक व्याख्यान लिखने में अपने चतुर्थपुत्र श्री तारकेशचन्द्र जोशी (आचार्य ज्योतिष) के लगन से अध्ययनाध्यापन में उत्पन्न शंका समाधान में ग्रहगणित खगोल विषय के समन्वयात्मक रुचिकर शास्त्रार्थ से जो सहयोग प्राप्त हुआ, उसके लिए हृदय से आशीर्वाद देकर आशा करता हूँ वह वंशपरम्परागत इस विद्या के शोधपूर्ण विवर्धन में अग्रसरित होते रहेगा। साथ ही श्लोकानुक्रमणिका बनाने में मेरे दौहित्र चि० आशीष पंत ने सहयोग दिया, अतः उसे शुभाशीर्वाद देता हूँ कि वह सुयोग्य विद्यार्थी बनेगा। दीर्घकाल से बुद्धिगत प्रस्तुत ग्रन्थ प्रकाशन की मेरी प्रबल इच्छा रही है जो आज इस अतिकठिन वार्धक्य में सफल हो रही है, इसे मैं अपना अहोभाग्य मानता हूँ। वार्धक्य अवस्था की विस्मृतियों के बाहुल्य के बावजूद यह प्रकाशन सत्पात्र शिष्य वर्ग एवं विज्ञ पाठकों के लाभाय होगा, शुभाशावादी होकर मुझे परम सन्तोष की अनुभूति हो रही हैं। पाठकवृन्द विस्मृतियों और त्रुटियों पर अवश्य ध्यान देंगे एवं सूचित करेंगे जिससे भविष्य के संस्करणों में विशेष स्वच्छता आती रहेगी। इस ग्रन्थ प्रकाशन के स्रोत श्री विश्वेश्वर राजधानी श्री काशी के बाबा विश्वनाथ एवं माता अन्नपूर्णा का बारम्बार स्मरण करता हूँ क्योंकि 'देव' शब्द की सार्थकता का यही एक मूर्त्तरूप है, कहा भी गया है— "महेशान्नापरो देवो महिम्नो नापरास्तुतिः । अघोरान्नापरो मन्त्रो नास्ति तत्त्वं गुरोः परम् ॥" गुरु तत्त्व के विचार में जीवन की इति श्री हो रही है, मात्र एक भगवान् शङ्कर जगद्गुरु ही नहीं अपि वे ब्रह्माण्ड गुरु और ब्रह्माण्ड नायक हैं, इसलिये "ग" कार को ज्ञानसम्पत्ति, "र" कार को प्रकाशपुञ्ज "उ" कार को शिव तादात्म्य भी कहा गया है— "ग" कारो ज्ञान सम्पत्तौ "रे" फस्तत्र प्रकाशकः । "उ" कारः शिवतादात्म्यम् गुरुरित्यभिधीयते ॥ गुरु के साथ शिष्य का समवाय सम्बन्ध है— "शरीरमर्थप्राणांश्च सद्गुरुभ्यो निवेद्य यः । गुरुभ्यः शिक्षते योगं शिष्य इत्यभिधीयते ॥"
( ९५ ) इस प्रकार गुरु शिष्य की यह शाश्वत की एकत्व की चिरस्थायिनी यह भावना “महेश” शब्द में ही निहित है— “मनोदोषादि दूरत्वाद्धेतुवादादि वर्जनात् । श्वादिप्राणिषु सादृश्यात् रम्यत्वाच्च महेश्वरः ॥” इस प्रकार जीवमात्र की एकत्व रूप ज्ञान की यह सद्भावना इसी श्री काशी क्षेत्र में जीव मात्र को प्राप्त होकर जीवन्मुक्ति इसी काशी क्षेत्र हुई है और होती रहती हैं और होती भी रहेगी । अत एव यह काशी नगरी धन्य है । इस श्री काशी नगरी में यह लेखनी सार्थक हो रही है और सार्थकता का एकमात्र उपाय यही है कि— “स्नातव्यं जाह्नवीतोये द्रष्टव्यः पार्वतीपतिः । स्मर्तव्यः कमलाकान्तो वस्तव्यं काशिकास्थले” ॥ एवं— पेयं पेयं श्रवणपुटकैः रामनामाभिरामम् । ध्येयं ध्येयं मनसि सततं तारकं ब्रह्मरूपम् ॥ जल्पन् जल्पन् प्रकृति विकृतौ प्राणिनां कर्णमूले । वीथ्यां वीथ्यामटति जटिलः कोऽपि काशी निवासी ॥ यहाँ पर “कोऽपि” शब्द की व्याख्या असीमित है । मन, वाणी, बुद्धि से इस शब्द का व्याख्यान असम्भव है । ऐसे अनिर्वचनीय मात्र महान तत्व को “शिव शिवेति शिवेति च” से उच्चारित किया जाता है । धन्य है ऐसा ‘अनिर्वचनीय’, ‘समदर्शी’, ‘अघोर’, ‘कीनाराम’, ‘शिव’ तत्व । उक्त आशय को प्रतिक्षण स्मरण करते हुए शेष जीवन की सार्थकता का एकमात्र भरोसा अघोर रूप बाबा विश्वनाथ को समझ कर यह लेखनी और यह लेखक दोनों विश्राम की कामना कर रहे हैं । इति-शम् हरि-हर्ष निकेतन केदारदत्त जोशी १/२८, नगवा (नलगाँव) ज्योतिषशास्त्राचार्य श्रीकाशी, वाराणसी उ० प्र० ( गणित + फलित ) संवत् २०४५ गुरुवार अवकाश प्राप्त प्राध्यापक अधिक ज्येष्ठ कृष्ण द्वितीया काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ता० २-६-१९८८ वाराणसी
॥ श्रीः ॥ ॐ तत्सद्ब्रह्मणे नमः । श्रीभास्कराचार्यविरचिते सिद्धान्तशिरोमणौ गोलाध्यायः वासनाभाष्यमरीचिसंस्कृतटीकासमलङ्कृतः तथा च केदारदत्ताख्यहिन्दीव्याख्योपपत्तिसहितः गोलाध्याये निजे या या अपूर्वा विषमोक्तयः । तास्ता बालावबोधाय संक्षेपाद्विवृणोम्यहम् ॥ वासनाभाष्यम्—गोलग्रन्थो हि सविस्तरतया प्राञ्जलः । किन्त्वत्र या या अपूर्वा नान्यैरुक्ता उक्तयो विषमास्तास्ताः संक्षेपाद्विवृणोमि । अत्र या या इति प्रथमान्तं पदं तास्ता इति द्वितीयान्तं पदं बुद्धिमता व्याख्येयम् । केदारदत्तः—सिद्धान्त शिरोमणि ग्रन्थ के ग्रहगणिताध्याय में जिन कठिन विषयों में स्पष्ट रूप के बावजूद जो अन्य विशेष परिष्कार हो सकते हैं उन विषयों की विशेष कठिन उक्तियों का संक्षेप से यहाँ बालबोधाय विवरण किया जा रहा है । यहाँ पर बाल शब्द से अवस्था का बालक न समझ कर अनधीत गणित गोलशास्त्र वञ्चित बुद्धि के युवा या वृद्ध पुरुष के लिये बाल शब्द का प्रयोग हुआ है । तत्राऽऽदौ तावदभीष्टदेवतानमस्कारपूर्वकं गोलं ब्रवीमीत्याह— सिद्धिं साध्यमुपैति यत्स्मरणातः क्षिप्रं प्रसादात्तथा यस्याश्चित्रपदा स्वलंकृतिरलं लालित्यलोलावती । नृत्यन्ती मुखरङ्गगेव कृतिनां स्याद्भारती भारती तं तां च प्रणिपत्य गोलममलं बालावबोधं ब्रुवे ॥१॥ वा० भा०—ब्रुवे वच्मि । कः । कर्ताऽहं भास्करः । किम् । गोलं गोलाध्या- यम् । किविशिष्टम् । अमलं निर्दूषणम् । पुनः किंभूतम् । बालावबोधम् । अविष- ममित्यर्थः । किं कृत्वा । प्रणिपत्य । प्रणिपातपूर्वकं नमस्कृत्य । कम् । तम् । न केवलं तम् । तां च । स कः । सा च का । तदाह । यस्य देवस्य स्मरणात् पुंसां साध्यमभीष्टं क्षिप्रं शीघ्रं सिध्यति सोऽर्थाद्विघ्नराजः । तथा यस्या देव्याः प्रसा-
दात् कृतिनां विदुषां भारती वाणी नृत्यन्ती भारतीव स्यात् । भारती नर्तकस्त्री च । कथंभूता वाणी नर्तकी च । चित्रपदा विचित्रपदविन्यासा । स्वलंकृतिः शोभ- नालंकारमुद्राङ्किता । लालित्यलीलावती माधुर्यगुणसंपन्ना । कथं वाग् नृत्यतीति चेत् । स्रवदमृतबिन्दुसंदोहसदृशसुरससुकोमलोक्तिगुणा गद्यपद्यमयी चतुरजनमनश्च- मत्कारकारिणी वाणी नृत्यन्तीव भाति । किंविशिष्टा भारती । मुखरङ्गा । मुख- मेव रङ्गो मुखरङ्गः । रङ्गो नृत्यस्थानम् । यस्याः प्रसादात्कृतिनां मुखेष्वेवंविधा भारती स्यात् । साऽर्थात् सरस्वती । तां च प्रणिपत्येति । मङ्गलादीनि मङ्गला- न्तानि च शास्त्राण्यलंकारकृतां मतान्यतः सिद्धिवृद्धिशब्दावाद्यन्तयोर्निक्षिप्तौ ॥५॥ मरीचिः—नित्यानन्दज्ञानरूपं महोऽहं विश्वाज्ञानध्वान्तविध्वंसदक्षम् । श्रीकृष्णाख्यं सर्वदाऽभीष्टसिद्धयै ध्यायामीशं सर्वगं सर्वहेतुम् ॥१॥ अथोत्तरार्धं गुहरामकृष्णपितृव्यपादाब्जयुगप्रसादात् । व्याख्यायते सद्गणकाभितुष्टयै प्रज्ञानुसारेण मुनीश्वरेण ॥२॥ अथ ग्रन्थादौ ग्रन्थमध्ये मङ्गलमाचरेदिति शिष्टाचारानुमितविधिना यथा पूर्वार्धं निर्विघ्नं समाप्तं तथेदमुत्तरार्धमारम्भणीयं समाप्यतामिति कामनया च कृतं नमस्काररूपं मङ्गलं शिष्यशिक्षायै निबध्नंश्चिकीर्षितं शार्दूलविक्रीडितवृत्तेन शिष्यावधानार्थं प्रतिजा- नीते—सिद्धिमिति । तं तां सर्वनाम्नां बुद्धिस्थवाचकत्वाद्बुद्धिस्थं देवं देवीं च । चः समु- च्चये । तेन द्वावित्यर्थः अलम् । अत्यर्थं यावद्विघ्नाभावमित्यर्थः । तदवगमश्च प्रारिप्सि- तसमाप्त्या । प्रणिपत्य प्रणिपातपूर्वकं नमस्कृत्य । कर्तव्यापेक्षया पूर्वकालत्वान्नमस्कारस्य क्त्वानिर्देशः । भक्तिश्रद्धातिशयलक्षणः प्रकर्षः प्रशब्देन द्योत्यते । भक्तिश्चाऽऽराध्यत्वेन ज्ञानम् । श्रद्धा तु वेदादिबोधितफलावश्यंभावनिश्चयः । गोलं भूगोलादिनिरूपकग्रन्थम् । तस्यापि गोलपदवाच्यत्वात् । ब्रुव इति क्रियाबलादहमिति कर्त्राक्षेपः । तथा चाहं गोला- ध्यायं कथयामीत्यर्थः । ननु भागवतादौ गोलनिरूपणदर्शनात्तव प्रयासो व्यर्थ इत्यत आह— अमलमिति । निर्दूषणम् । भागवतादौ तन्निरूपणं प्रत्यक्षविसंवादाद्ग्रहगणितानुपजीव्य- त्वेनोपेक्षितमिति भावः । ननु तथाऽपि सूर्यसिद्धान्तादौ प्रत्यक्षसंवादेन तन्निरूपणाद्व्यर्थो- ऽयं तव प्रयास इत्यत आह—बालावबोधमिति । बालानां गणितोपपत्त्यज्ञानामवबोधो भूग्रहभादियथार्थस्थितितत्त्वज्ञानं यस्मात् । तथा च सूर्यसिद्धान्तादौ तन्निरूपणं संक्षिप्त- मस्तीति तत्र कठिनतयाऽनभिज्ञानां बोधो न जायतेऽतस्तेषां बोधार्थं तदुक्तमेव विशदीकृत्य मया सुगमं तन्निरूपणं क्रियत इति भावः । बुद्धिस्थं विवृणोति—सिद्धिमिति । यस्य परमेश्वरस्य । तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूत इत्यादिश्रुतिप्रतिपाद्यस्येत्यर्थः । स्मरणात् । उक्तध्यानसक्तान्तःकरणात् । क्षिप्रमविलम्बं साध्यं पुरुषकृतिविषयमभीष्टं कार्यम् । सिद्धिं निष्पन्नतामुपैति प्राप्नोति । जगत्कर्तृत्वादिदं फलमुपलक्षणम् । तेनान्यदपि महत्फलं पुरुषकृत्यसाध्यं भवतीति ध्येयम् । आरम्भे मंगलार्थः सिद्धिशब्दः । बुद्धिस्थां
विवृणोति—प्रसादादिति । यस्या देव्याः । अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णामित्यादिश्रुतिप्रति- पाद्याया मायाया इत्यर्थः । तथा तादृशानिर्वचनीयात्प्रसादादनुग्रहात् । भारती वाग्देवी । नृत्यन्ती नर्तनकारिणी । स्याद्भवति । नर्तनस्य स्थानापेक्षत्वादाह—मुखरङ्ग- गेति । कृतिनां पण्डितानां मुखमेव रङ्गो नृत्यस्थानं तत्र गता विद्यमाना । कथं नृत्यन्तीति दृष्टान्तमाह—भारतीवेति । भारतस्य नर्तकस्येयं भारती । नर्तकी स्त्री । यथा भाग्यवतां पुरुषाणां गृहाङ्गणस्था रङ्गस्थानाग्रिमभागस्था नर्तकी नायि (टि) का काचन नृत्यं करोति तद्वदित्यर्थः । दृष्टान्तदाष्टर्दान्तिकयोः सादृश्यावगमाय तुल्यविशेष- णान्याह—चित्रपदेति । सरस्वतीपक्षे चित्राणि नानाविधानि पदानि सुप्तिङन्तरूपाणि विद्यन्ते यस्याम् । नटीपक्षे नानाविधचरणायङ्गविन्यासः । नानाविधगायनपदानि वा । इदमसाधारणं करणं नर्तने । स्वलंकृतिः । सरस्वतीपक्षे सुष्ठु दूषणरहिताः सगुणा अलंकारा वक्रोक्त्यनुप्रासयमकश्लेषचित्रपुनरुक्ताभासाः शब्दालंकाराः, उपमानन्वयोपमेयोपमोत्प्रेक्षा- संदेहरूपकापह्नुतिश्लेषसमासोक्तिनिदर्शनेत्यादिकाव्यप्रसिद्धा अर्थालंकाराश्च विद्यन्ते यस्याम् । नटीपक्षे चारुस्वर्णानि भूषणानि दृष्टृणां प्रवृत्तिकारण (स) हायमिदम् । लालि- त्यलोलावती । सरस्वतीपक्षे ललितस्य भावो लालित्यम् । 'श्लेषः प्रसादः समता माधुर्यं सुकुमारता । अर्थव्यक्तिरुदारत्वमोजःकान्तिसमाधय ॥' इति काव्यप्रकाशोक्तगुणसंपन्नतया । दुष्टं पदं श्रुतिकटु च्युतसंस्कृत्यप्रयुक्तमसमर्थं निहतार्थममुचितार्थं निरर्थकमवाचकं त्रिधा- ऽश्लीलं संदिग्धमप्रतीतं ग्राम्यं नेयार्थमथ भवेत्क्लिष्टम् । अविमृष्टविधेयांशं विरुद्धमतिकृत् समासगतमेवेति तदुक्तदोषनिराससंपन्नतया च सौश्रवस्त्वम् । तस्य लीला विलासः । स विद्योतते यस्याः सा । नटोपक्षे 'विलासो गमनादि स्याच्चेष्टा श्लिष्टाङ्गता कृता । कान्त्या सुकुमाराङ्गापाङ्गत्वं ललितं विदु'रिति संगीतरत्नाकरोक्तं ललितम् । एतच्च नर्तन- रूपप्रतिपादकं विशेषणम् । मायाया अपि जगदुत्पादकत्वादिकं फलमुपलक्षणम् । तेन फलान्त- राण्यपि भवन्तोति ध्येयम् । केचित्सिद्धिविघ्नाधीशत्वेन भारतीशब्दस्य वागर्थाम्युपगमेन चात्र गणेशसरस्वत्योः प्रणाम इत्याहुः । तन्न । भूगोलादीनामीश्वरमायानिर्मितत्वात्तत्स्व- रूपनिरूपणारम्भे तयोरेव नमस्कारयोः समुचितत्वात् ॥१॥ केदारदत्तः—ग्रन्थ के आरम्भ, मध्य और अन्त में मङ्गलाचरण किया जाता है। अतः आचार्य सिद्धि शब्द प्रयोग के साथ ग्रन्थ में भी लकार जिस मंगलमूर्ति गणेश जी का स्मरण करने मात्र से, तथा जिस भगवती सरस्वती देवी के प्रसाद से विज्ञ पुरुषों के अभीष्ट साध्य कार्य सिद्ध होते हैं या सफल होते हैं। नृत्यांगना की तरह विचित्र पदविन्यास करती हुई और मनोरम अलङ्कार से सुसज्जित एवं मधुर लगने वाली विद्वानों के मुखरूपी रंगमंच पर गद्यपद्यमयी वह भारती नृत्य करती हुई सुशोभित होती है। ऐसे गणेश तथा सरस्वती दोनों को प्रणाम कर बालों को अनायास ज्ञान कराने के लिए दोष रहित इस ग्रहगोलाध्याय का मैं भास्कराचार्य प्रतिपादन कर रहा हूँ। अर्थात् ग्रहगोलाध्याय ग्रन्थ (ग्रहगोलगणितस्कन्ध) प्रारम्भ कर रहा हूँ।
४ गोलाध्याये गणित शास्त्र की उपपत्तिज्ञान रहित भूग्रहादिकों की यथास्थान स्थिति का तत्त्वज्ञान सूर्यसिद्धान्तादिक ग्रन्थों में संक्षिप्त होने से अनभिज्ञों को कठिनता से बोध होने के कारण उस संक्षिप्त ज्ञान का आचार्य द्वारा यहाँ पर इस ग्रन्थ में विशदीकरण किया जा रहा है। उपपत्तिज्ञान रहित भूग्रहादिकों की यथास्थान स्थिति का तत्त्वज्ञान सूर्यसिद्धान्तादिक ग्रन्थों में संक्षिप्त होने से अनभिज्ञों के लिए कठिनता से सुबोधक होता है, अतः आचार्य द्वारा उक्त संक्षिप्त ज्ञान का यहाँ पर इस ग्रन्थ में विशदीकरण किया जा रहा है। आचार्य ने यहाँ पर अनिर्वचनीय सरस्वती की उपमा नर्तकी स्त्री से की है। साधारण नर्तकी को जो नृत्य भूमि होती है वही यहाँ पर पण्डितों (गणितज्ञों) के मुख को ही नृत्य स्थान माना है। मुख में ही सरस्वती का निवास होने से, जैसे भाग्यवान् पुरुषों के घर के आंगन में कोई नर्तकी नाचती है वैसे ही पण्डितों के मुखरूप आंगन में सरस्वती रूपा नर्तकी नित्यमेव नृत्य करती है ॥१॥ अथ गोलग्रथनकारणमाह— मध्याद्यं द्युसदां यदत्र गणितं तस्योपपत्तिं विना प्रौढिं प्रौढसभासु नैति गणको निःसंशयो न स्वयम्। गोले सा विमला करामलकवत्प्रत्यक्षतो दृश्यते तस्मादस्युपपत्तिबोधविधये गोलप्रबन्धोद्यतः ॥२॥ वा० भा०—स्पष्टार्थम् ॥२॥ मरीचिः—ननु गोलनिरूपणारम्भः प्रयोजनाभावाद्व्यर्थ इत्यतः प्रतिज्ञातं गोलनिरूपणं सप्रयोजनं शार्दूलविक्रीडितेन प्रतिजानीते—मध्येति । तस्मात्कारणात्। अत्र सिद्धान्तग्रन्थ- पूर्वार्धे द्युसदां ग्रहाणां मध्याद्यं मध्यस्पष्टादिशदशविधं गणितं यत्प्रतिपादितं तस्य ग्रहगणित- निरूपकग्रन्थस्योपपत्तिबोधविधये तदुत्पा (पपा) दकयुक्तिरूपपत्तिस्तस्या ज्ञानार्थं यो विधिः प्रकारस्तन्निमित्तं गोलप्रबन्धोद्यतो गोलस्वरूपज्ञानप्रतिपादकग्रन्थसंदर्भार्थं गोलबन्धार्थं वा। अग्रे तद्बन्धस्योक्त (त्वात्)। अत एव पूर्वं गोलनिरूपणस्य प्रतिज्ञातत्वाद्वितीया गोलबन्ध- प्रतिज्ञा युक्ता। अन्यथा प्रतिज्ञायाः पुनरुक्तत्वापत्तेः। प्रवृत्तोऽस्मीति क्रियाबलादहमिति कर्त्राक्षेपः। तथा चोपपत्तिज्ञानं प्रयोजकत्वाद्गोलनिरूपणं व्यर्थं नेति भावः। नतूपपत्तिज्ञानार्थमुपपत्तिर्निरूपणीया न गोल इत्यतः सूचितं कारणमाह—गोल इति। सा उपपत्तिः। गोले निरूपिता गोले विमला निर्दूषणा प्रत्यक्षप्रमाणाद्दृश्यते ज्ञायते गोल- स्वरूपविद्भिर्गणकैरिति शेषः। प्रत्यक्षप्रमाणात्कथं ज्ञायत इत्यतो दृष्टान्तद्वारेणाऽऽह— करामलकवदिति। हस्तस्थितामलकफलं चाक्षुषप्रत्यक्षेण निश्चित्य मम हस्त आमलकोऽ- स्तीति ज्ञानं जा (जा) यते तद्वद्गोलस्वरूपं निश्चित्य तत्र क्षेत्रदर्शनस्य सुशकत्वादुपपत्तिः सुज्ञेया। तस्य गणितपदार्थस्वरूपाश्रयत्वेनोपपत्तिस्वरूपत्वादिति भावः। अत्राऽऽमलक- निदर्शनं गोलस्वरूपावगमार्थमिति ध्येयम्।
गोलप्रशंसाध्यायः ५ ननूपपत्तिज्ञानप्रयोजककालनिरूपणमपि व्यर्थं प्रयोजनस्य प्रयोजनाभावेनोपेक्षाविषय- त्वादित्यत आह—उपपत्तिमिति । गणकः । ग्रहगणितज्ञः । उपपत्तिं विना तदुत्पादनयुक्ति- ज्ञानव्यतिरेकेण । प्रौढसभासु । प्रौढाः सदसत्पदार्थतत्त्वक्षोददक्षाः । तेषां समाजेषु प्रौढिं सदसद्विवेचनदक्षत्वं नैति न प्राप्नोति । यथा च ग्रहणाद्यादेशकर्तुर्गणकस्य तादृशस्य ग्रहणं कुतो भवतीत्यादिपण्डितप्रश्नोत्तरदानसामर्थ्याभावेन लोकमान्यत्वमतस्तदुपपत्तिज्ञस्य तदु- त्तरदानसामर्थ्याल्लोकमान्यत्वमेवोपपत्तिज्ञानप्रयोजनं लोकमान्यत्वे तु तद्वचनप्रामाण्यात्त- दादिष्टसंक्रान्त्यादिपुण्यकाले प्रेक्षावतां स्नानदानाचरणोपपत्तिरन्यथा तदनुपपत्त्या धर्मविलो- पापत्तेरिति भावः । ननु तदुपपत्त्यज्ञा मान्यगणकवचनादपि तद्धर्माचरणोपपत्तिर्ग्रहणाद्यादेश- संवादबलेन तद्वचनप्रामाण्यनिश्चयादित्यत आह—निःसंशय इति । स्वयं ग्रहगणितज्ञस्त- दुपपत्तिज्ञानमन्तरेण निःसंशयो निर्गतः संशयो यस्य निश्चयज्ञानवान्न स्यात् । तथा च केवलग्रहगणितज्ञाने पूर्वग्रन्थानां क्वचिद्भेदे प्रमाणं किमित्येतत्संशयभ्रमस्तत्त्वेन ग्रहणाद्या- देशकत्वासंभवेन धर्मानुष्ठानविलोपापत्त्या तदुपपत्तिज्ञानेन तन्निर्णयज्ञानसंभवादादेश- सामर्थ्याच्च तदादेशवचनाद्धर्मानुष्ठानसंभव इति भावः ॥२॥ केदारदत्तः—गोल रचना का कारण— यहाँ ग्रहों के माध्यमिक स्पष्ट पर्यन्त दशविध गणित की उपपत्ति ज्ञान बिना कोई भी गणितज्ञ खगोलज्ञों की सभा में तथ्यातथ्य विवेचन दक्षता की प्राप्ति नहीं कर सकता । हाथ में स्थित आंवले के फल का चाक्षुष प्रत्यक्ष से "मेरे हाथ में आंवले का फल है" ऐसे निश्चित ज्ञान की तरह ग्रहगोल स्वरूप का निश्चय करने के अनन्तर गणित की उपपत्ति ज्ञान विधि के लिए गोलस्वरूप ज्ञान प्रतिपादक ग्रन्थ निर्माण में आचार्य प्रवृत्त होता है ॥२॥ इदानीं गोलप्रशंसया गोलानभिज्ञगणकोपहासं श्लोकद्वयेनाऽऽह— भोज्यं यथा सर्वरसं विनाऽऽज्यं राज्यं यथा राजविवर्जितं च । सभा न भातीव सुवक्तृहीना गोलानभिज्ञो गणकस्तथाऽत्र ॥३॥ वादी व्याकरणं विनैव विदुषां धृष्टः प्रविष्टः सभां जल्पन्नल्पमतिः स्मयात्पटुबटुभ्रूभङ्गवक्रोक्तिभिः । हीनः सन्नुपहासमेति गणको गोलानभिज्ञस्तथा । ज्योतिर्वित्सदसि प्रगल्भगणकप्रश्नप्रपञ्चोक्तिभिः ॥४॥ वा० भा०—स्पष्टार्थम् ॥३॥४॥ मरीचिः—ननु सूर्यसिद्धान्ताद्यार्षसंमतत्वेन मुहुर्ग्रहणाद्यादेशसंवादबलेन च निश्चय- ज्ञानसंपादनादादेशोपजीव्यधर्मानुष्ठानसंभवादुपपत्तिज्ञानवैय्यर्थ्येन गोलनिरूपणं व्यर्थमित्यत
६ . गोलाध्याये उपजातिकयाऽऽह — भोज्यमिति । अत्र सिद्धान्तज्ञेषु गोलानभिज्ञो भूगोलादिस्वरूपज्ञो गणको ग्रहगणितज्ञस्तथा तद्वन्न भाति लोके न चमत्करोति । तथेत्यनेन सूचितं दृष्टान्तमाह — भोज्यमिति । सर्वरसं रसोपलक्षणात्सर्वसामग्र्युपपन्नं भोज्यं घृतव्यतिरेकेण न भाति । ननु भोज्यपदार्थेषु घृतस्य मुख्यत्वं न युक्तम् । मधुररसविवर्जितं च भोज्यमिति लल्लोक्त्या विनिगमनाविरहादित्यस्वरसाद्दृष्टान्तरमाह — राज्यमिति । चो वार्थे । ननु नियन्तारं विना राज्यस्य सोपद्रवत्वसंभवाद्राज्ये राज्ञो मुख्यत्वं, न तथा गणके गोलाभिज्ञत्वं मुख्यम् । आदेशादिव्यवहारस्योक्तरीत्योपपत्तेरिति दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकयोर्वैषम्यमित्यस्वरसाद् दृष्टा- न्तान्तरमाह — सभेति । सुवक्तृहीना । सुष्ठु वदतीति । समानाधिकरणयुक्तिवचोवद्भिः पण्डितैर्हीना सभा पण्डितसभा । इव यथार्थे । तथा च साधारणपण्डितसभा लोके मनो- हराऽप्यतिपण्डिताश्रयेणातिमनोहरा । तथा केवलग्रहगणितज्ञैर्व्यवहारसिद्धावपि गोलज्ञतयो- पपत्तिज्ञानाधिक्याद् गोलाभिज्ञगणकस्तेभ्योऽधिक इत्यधिकत्वसंपादनाथं गोलनिरूपणमव्यर्थ- मिति भावः ॥३॥ नन्वधिकत्वानपेक्षया तन्निरूपणं व्यर्थमेव । अन्यथा शास्त्रान्तरप्रमेयज्ञानादधिकत्व- सिद्धेस्तस्यापि निरूपणापत्तिरित्यतः शार्दूलविक्रीडितेनाऽऽह — वादीति । गोलानभिज्ञो गणको ज्योतिर्वित्सभायाम् । ज्योतिर्वित्पदेन सर्वे सभासदो गोलाभिज्ञाः । नक्षत्रादीनां गोलाश्रय- त्वात् । अन्यथा नक्षत्रसामान्यज्ञानात्सर्वेषां तत्त्वापत्तेः । प्रगल्भगणकप्रश्नप्रपञ्चोक्तिभिः । प्रगल्भाः कल्पका ये गणका गोलस्वरूपतत्त्वज्ञास्तेषां प्रश्नाः पूर्वपक्षास्तत्सम्बन्धिन्यो याः प्रपञ्चोक्तयो नानाविधभङ्गिभिर्वचनानि । उपहासगर्भितानि तैरित्यर्थः । ह्रीणो लज्जितः । तदुत्तरदानासमर्थत्वात् । सन् साधुः । दुष्टस्य स्वाज्ञानाज्ञातृत्वेन लज्जानुदयात् । उपहासं तथा दृष्टान्तवत्प्राप्नोति । दृष्टान्तमाह — वादीति । तर्कशास्त्रादिवादी । व्याकरणं विना व्याकरणव्यतिरेकेण । विदुषामेव । एवकारान्मूर्खव्यवच्छेदः । सभां धृष्टः सन्प्रविष्टः स्मयाद्गर्वाद्विलपन्नसंगतार्थं पण्डितोपहासपूर्वकं वदन् । अल्पमतिः स्वाज्ञानगोपनासमर्थः । विदुषां पटवो व्याकरणादिशास्त्रकुशला ये बटवो बालकाः शिष्या वा । तेषां भ्रूभङ्गा- स्तैश्चोदिता या वक्रोक्तयः कथमनेन शुद्धं संस्कृतं प्रमेयमुच्यत इत्यादयस्ताभिर्ह्रीणः पण्डितबालका अपि मां मूर्खं ज्ञात्वा वक्रोक्त्योपहसन्तीति । अहमेतादृशो मूर्खोऽस्मीति लज्जितः सन् साधुः स्वदोषज्ञ इति यावत् । उपहासमेति तथा केवलग्रहगणितज्ञस्योपपत्य- ज्ञानात्सर्वज्योतिर्विदुपेक्षितत्वेन तद्वचनप्रामाण्यासंशयादप्रयोजकत्वम् । ज्योतिर्विद्बहिर्भूतत्वं चातस्तदुपपत्तिज्ञानावश्यकत्वेन गोलनिरूपणं न त्वधिकज्ञानार्थमिति न तद्वैयर्थ्यमिति भावः ॥४॥ केदारदत्तः—यहाँ गोल की प्रसंसा के साथ गोलज्ञानरहित ज्योतिषी का उपहास किया जा रहा है—सर्वरस युक्त होते हुए भी घी रहित भोजन, राजा से रहित राज्य और सु वक्ता रहित सभा की तरह गोलज्ञान रहित गणितज्ञ को भी नीरसता की स्थिति होती है ।
गोलप्रशंसाध्यायः ७ प्रौढ पण्डित सभा में प्रविष्ट व्याकरणज्ञानरहित धृष्ट वादो जैसे (अल्पमति अपने अज्ञान के गोपन के लिए असंगत भाषण करने वाले से) व्याकरणादि शास्त्र कुशल बालकों या शिष्यों के भ्रूभंग से द्योतित वक्रोक्तियों से उपहास का पात्र बन जाता है कि “मैं इस प्रकार का मूर्ख हूँ” समझ कर लज्जित हो जाता है इसी प्रकार उपपत्ति ज्ञान रहित ग्रहगणितज्ञ या गोलज्ञान रहित ज्योतिषी भी प्रौढगणितज्ञों के प्रश्नप्रपञ्चोक्तियों से ज्योतिर्विदों की उस सभा में उपहास का पात्र बन जाता है ॥३-४॥ अथ गोलस्वरूपमाह— दृष्टान्त एवावनिभग्रहाणां संस्थानमानप्रतिपादनार्थम् । गोलः स्मृतः क्षेत्रविशेष एष प्राज्ञैरतः स्याद्गणितेन गम्यः॥५॥ वा० भा०—स्पष्टार्थम्—॥५॥ मरीचिः—ननूपपत्तिज्ञानप्रयोजकगोलस्वरूपनिरूपणं सर्वशास्त्रप्रयोजकव्याकरणवत्सि- द्धान्तनिरूपणभिन्नत्वेन युक्तम् । नहि सिद्धान्तपदार्थोपदेश उपपत्तिरप्युद्दिष्टा । येनात्र तन्नि- रूपणं संगतम् । तस्माद्ग्रहगणितप्रतिपादनानन्तरं द्विधागणितप्रतिपादनं तदनन्तरं च सोत्तरप्रश्नप्रतिपादनं ततो भूधिष्ट (ष्ण्य) ग्रहसंस्थितिकथनमित्यादि युक्तमित्यतोऽत्र गोलनि- रूपणसमर्थनच्छलेन प्रतिज्ञातगोलबन्धवशादग्र उक्तगोलबन्धसिद्धगोलस्य प्रयोजनमिन्द्रवज्र- याऽऽह—दृष्टान्त इति। अवनिभग्रहाणां भूनक्षत्रग्रहाणां संस्थानं स्थितिः। तस्यां मानं प्रत्यक्षादिप्रमाणं युक्तिभिः स्थितिस্বরূপनिर्णय इत्यर्थः । तत्प्रतिपादनार्थं तन्निरूपणार्थम् । गोलः । वक्ष्यमाणगोलबन्धप्रकारसिद्धत्वादिवंशादिवृत्तजनितगोलः । दृष्टान्त एव । एव- कारान्न वस्तुरूपः । प्राज्ञैः प्रज्ञावद्भिर्गोलस्वरूपतत्त्वज्ञैः । स्मृतः प्रोक्तः । तथा चोपपत्ति- ज्ञानार्थं गोलस्वरूपनिरूपणं विना दृष्टान्तं सुज्ञेयं न भवतीति गोलबन्धविधिना दृष्टान्तः सिद्धः कृतः । अत्रैव भूधिष्ण्यग्रहसंस्थितिज्ञानात्सिद्धान्तपदार्थस्यैव निरूपणम् । नातिरिक्त निरूपणमुपपत्तेस्तदन्तर्गतत्वादिति भावः । एतस्य दृष्टान्तत्वे किं मानमत आह—क्षेत्र- विशेष इति । गोलस्वरूपनिरूपणे यानि क्षेत्राणि जात्यशास्त्राणि ज्ञातानि तान्यत्र वंशादि- वृत्तगोले प्रत्यक्षाणि । तिर्यगूर्ध्वाधरसूत्रवृत्तादिसंबन्धेन गोलस्य क्षेत्रात्मकत्वेन क्षेत्रविशेष- त्वाम्युपगमादिति । ग्रहबिम्बानाश्रयत्वं न दृष्टान्तत्वमिति भावः । ननु ग्रहचारनिरूपणा- व्यवहितानन्तर्येण तन्निरूपणं युक्तम् । न द्विविधगणितनिरूपणव्यवहिततदानन्तर्येण । अन्यथोद्देशक्रमेण सोत्तरं प्रश्नाध्यायानन्तरं गोलयन्त्रयोर्निरूपणापत्तेरित्यत आह—एष इति । अतः क्षेत्रविशेषात्मकत्वात् । एष गोलः । गणितेन पाटीगणितेन । गम्यो ज्ञेयः स्यात् । तथा च क्षेत्रसंबद्धभुजकोटिकर्णानां ज्ञानं विना क्षेत्रव्यवहारो न भवतीति तस्य पाटीगणितान्तर्गतत्वं न पाटीगणितव्यतिरेकेण तज्ज्ञानासम्भवाद्व्यक्ताव्यक्तद्विविधगणित- निरूपणानन्तरं गोलनिरूपणं युक्तमिति भावः । प्रश्नानामानन्त्यात्तदुत्तराणामुपपत्तिज्ञतया कल्पितत्वनियमादनुक्तप्रश्नोत्तरज्ञानसूचकप्रश्नाध्यायस्य प्रतिपादनं गोलनिरूपणात्पूर्वमनु-
चितम् । प्रश्नास्तथा सोत्तरा इति । पूर्वोद्देशस्तुल्यद्य (ध्रु) वाद्गोलप्रश्नोद्देशसिद्धयर्थ- मिति ध्येयम् ॥५॥ केदारदत्तः—यहां युक्तियों से गोल स्वरूप बताया जा रहा है—प्रत्यक्षादि प्रमाण से भू नक्षत्र और ग्रहों की स्थिति स्वरूप निर्णय निरूपण के लिए प्राज्ञगणितज्ञों से बाँस आदि शलाकाओं से निर्मित यह दृष्टान्तीभूत गोल रचना के गोलज्ञान से क्षेत्र व्यवहार, बीजगणित त्रैकोणमितिक प्रभृति गणितों से यह ग्रहगोल ज्ञेय होता है या जाना जा सकता है ॥५॥ इदानीं गणितप्रशंसामाह— ज्योतिःशास्त्रफलं पुराणगणकैरादेश इत्युच्यते नूनं लग्नबलाश्रितः पुनरयं तत्स्पष्टखेटाश्रयम् । ते गोलाश्रयिणोऽन्तरेण गणितं गोलोऽपि न ज्ञायते तस्माद्यो गणितं न वेत्ति स कथं गोलादिकं ज्ञास्यति ॥६॥ वा० भा०—स्पष्टार्थम् ॥६॥ मरीचिः—नन्वेवं ग्रहगणितनिरूपणात्पूर्वमेव द्विधागणितनिरूपणपूर्वकं गोलनिरूपणा- पत्तिः । गोलस्थपदार्थज्ञानादेव ग्रहानयनाद्युत्पत्तेर्ग्रहगणितस्य संकलनादिषड्विधसापेक्षत्वा- त्पाटीगणितं बिना तदनुपपत्तेश्चेत्यतः शार्दूलविक्रीडितेनाऽऽह—ज्योतिरिति । पुराणगणकैः प्राचीनज्योतिर्विद्वद्वरवराहमिहिरादिभिर्ज्योतिःशास्त्रस्य संहिताजातक- गणितस्कन्धत्रयात्मकस्य फलं प्रयोजनमादेशो वर्तमानभूतभविष्यशुभाशुभकथनमिति तच्छा- स्त्रेण तन्निरूपणनिश्चयाद्धेतोरित्यर्थः । उच्यते । अङ्गीक्रियते । पुनर्वाक्यालंकारे । असा- वादेशः । नूनं निश्चयेन । लग्नबलाश्रितः । व्यवहारैर्जातकादेशो लग्नकुण्डलिकाग्रहसंस्थान- बलाधीन इत्यर्थः । तत्तत्कुण्डलिकाग्रहसंस्थानबलं स्पष्टग्रहाधीनम् । ग्रहणशृङ्गोन्नत्यादि- गणितस्कन्धादेशस्य साक्षादेव स्पष्टग्रहाधीनत्वमिति । तस्माज्ज्योतिःशास्त्रप्रतिपाद्यादेशाः साक्षात्परम्परया वा स्पष्टग्रहज्ञानाधीना इति सिद्धान्ते स्पष्टग्रहागोलाश्रयिणो गोलस्थितत्वेन प्रत्यक्षाः । गोलस्थित्यवगमनोपपत्तिसिद्धं तज्ज्ञानं गोलनिरूपणाधीनमित्यर्थः । गणितमन्तरेण ग्रहगणितव्यतिरेकेण गोलो न ज्ञायते । अपिशब्दात्स्पष्टग्रहास्तदुपजीव्यग्रहणादिकं च न ज्ञायते । गोलावगमार्थं यथाश्रुतग्रहगणितपदार्थज्ञानमतिप्रयोजकं तत्तु तद्गणितनिरूपण- साध्यमित्यर्थः । तथा च गणितज्ञानाधीनगोलज्ञानात्तदनन्तरं निरूपणं युक्तमिति भावः । ननु गोलनिरूपण एव तत्पदार्थस्य सामान्यतो ज्ञानसिद्धेर्न गोलज्ञाने ग्रहगणितज्ञानापेक्षेत्यत उपसंहारव्याजेन तदुत्तरमाह—तस्मादिति । तस्मादुक्तहेतोर्यो गोलाध्यायपिपठिषुर्गणितं ग्रहगणितं न वेत्ति न जानाति स पिपठिषुर्गोलादिकं गोलयन्त्रं प्रश्नोत्तरं कथं केन प्रकारेण ज्ञास्यति न ज्ञास्यतीत्यर्थः । तथा च बिना ग्रहगणितज्ञानं गोलज्ञानं सम्यङ् न जायते ।
गोलप्रशंसाध्यायः ९ तदाभासज्ञानं भवत्यतो ग्रहगणितं प्रथमं निरूप्य गोलनिरूपणं कृतमिति भावः । एतेन सिद्धान्तसुन्दरे गोलाध्यायानन्तरं ग्रहगणितनिरूपणं कृतं तदपास्तम् ॥६॥ केदारदत्तः—ज्योतिषशास्त्र का प्रयोजन—आर्यभट्ट, वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त-प्रभृति प्राचीन ज्योतिर्विदों ने संहिता, जातक, गणित स्कन्धत्रयात्मक ज्योतिषशास्त्र का प्रयोजन, भूत भविष्य और वर्तमान का शुभाशुभ कथन रूप आदेश बताया है। किसी जातक का फल का आदेश लग्नकुण्डलिका में स्थापित ग्रहस्थितिवश किया जाता है। निश्चय है कि लग्न कुण्डलिका में स्थित लग्न बलाश्रित ग्रहस्थिति से ही भविष्यज्ञान होता है। लग्न कुण्डलिका में स्थापित ग्रह संस्थान केवल स्पष्ट ग्रह ज्ञान के आधीन है। स्पष्ट ग्रह का ज्ञान गोलनिरूपणात्मक उपपत्ति सिद्ध ज्ञान के आधीन होता है। ग्रहगणित ज्ञान के बिना ग्रहगोल का ज्ञान नहीं हो सकता । अतः गोलाध्याय अध्ययन के इच्छुक छात्र को प्रथमतः गणिताध्याय का ज्ञान होना चाहिए। क्योंकि गणित ज्ञान बिना गोलज्ञान सम्भव नहीं है। इसी आशय से आचार्य ने प्रथमतः गणिताध्याय का सर्जन कर तदनन्तर इस गोलाध्याय की रचना की है ॥६॥ इदानीं ज्योतिषशास्त्रश्रवणाधिकारिलक्षणमाह— द्विविधगणितमुक्तं व्यक्तमव्यक्तयुक्तं तदवगमननिष्ठः शब्दशास्त्रे पटिष्ठः । यदि भवति तदेदं ज्योतिषं भूरिभेदं प्रपठितुमधिकारी सोऽन्यथा नामधारी ॥७॥ वा० भा०—स्पष्टार्थम् ॥७॥ मरीचिः—अथ वादीत्यादिश्लोकत्रयसिद्धं गोलाध्यायपिपठिषुस्वरूपं लाघवान्मालि- न्याऽऽह—द्विविधेति । द्विविधगणितं प्रकारद्वयेन गणितमुक्तम् । अस्मिन् ग्रन्थे निरूपितम् । प्रकारद्वयं स्फुटयति—व्यक्तमिति । व्यक्तं पाटीगणितम् । अव्यक्तं बीजगणितं तेन युक्तं सहितम् । पाटीगणितं बीजगणितं चेति । तथा च ग्रहगणितनिरूपणानन्तरं प्रक्रियोपयुक्त- त्वेन पाटीगणितं निरूप्य तदनन्तरं ग्रहगणितविशेषोपपत्त्युपयुक्तत्वेन बीजगणितं पाटीगणि- तोपजीव्यं निरूपितमित्यर्थः । उक्तोपयोगमाह—तदवगमननिष्ठ इति । तयोर्गणितयोरव- गमनं ज्ञानं तत्र निष्ठा निश्चयो यस्य तज्ज्ञानवानित्यर्थः । तयोर्ग्रन्थमध्ये स्थितत्वात्तच्छब्दा- देव ग्रहगणितज्ञानवांश्चेति सिद्धम् । शब्दशास्त्रे व्याकरणे पटिष्ठः । अतिशयेन पटुः कुशलः । व्याकरणशास्त्रतत्त्वज्ञ इत्यर्थः । तादृशो यदि भवति तदा तर्हि स पिपठिषुः, इदं प्रसिद्धं ज्योतिषशास्त्रं भूरिभेदं गोलयन्त्रं प्रश्नाध्यायात्मकग्रन्थैकदेशं प्रपठितुं तत्त्वं ज्ञातु- मधिकारी । अन्यथोक्तस्वरूपाभावे नामधारी । तत्पिपठिषुः केवलं भवति न तत्तत्त्वज्ञा- नेच्छुः । तादृशस्यायं ग्रन्थैकदेशो दुर्ज्ञेय इत्यर्थः ॥७॥
१० गोलाध्याये केदारदत्तः—यहाँ गणित भेद बताये जा रहे हैं—यह ग्रंथ अंकगणित और बीज गणित सहित है। इस ग्रन्थ में जिस छात्र की उक्त दोनों गणितों में पूर्णनिष्ठा सर्वांश सम्बन्धित है, ऐसे गणित ज्ञानवान् छात्र को व्याकरण शास्त्र में भी अत्यन्त कुशल होना चाहिए, ऐसा सुयोग्य छात्र, अनेक भेद युक्त गोलयंत्र, प्रश्नाध्याय प्रभृति अध्यायों से युक्त इस ग्रन्थ के अध्ययन का उत्तम पात्र होता है, अन्यथा वह केवल ज्योतिष नामधारी ही रहेगा। अंकगणित बीजगणितादि अनेक विध गणित गोल ज्ञान रहित छात्र इस ग्रन्थ के अध्ययन का अधिकारी नहीं होगा ॥७॥ अथ व्याकरणवर्णनमाह— यो वेद वेदवदनं सदनं हि सम्यग्- ब्राह्म्याः स वेदमपि वेद किमन्यशास्त्रम् । यस्मादतः प्रथममेतदधीत्य धीमा- ञ्शास्त्रान्तरस्य भवति श्रवणेऽधिकारी ॥८॥ वा० भा०—स्पष्टार्थम् ॥८॥ मरीचि :—ननु वादीत्यादिना दृष्टान्तद्वारेण शास्त्रान्तरं विना व्याकरणमप्रयोजक- मित्युक्तं न तु ज्योतिःशास्त्रं तथोक्तम् । अत्र व्याकरणस्थानापन्नगोलाध्यायस्याभ्युपगमात् । तथा च शब्दशास्त्रे पटिष्ठ इत्युक्तमनुपयुक्तमित्यतः सिंहोद्धतयाऽऽह—य इति । अतोऽस्मा- त्कारणादेतद्व्याकरणं प्रथमं वेदाङ्गेषु प्रथममुद्दिष्टमधीत्य धीमाञ्शास्त्रान्तरस्य श्रवणे पठने । श्रवणस्य श्रोत्रमनःसंयोगविषयत्वात् । अधिकारी स्यात् । लौकिकोक्त्या धीमान् । श्रवण (पठने) इतिपदाभ्यां महोत्कर्षः सूचितः । तथा च ज्योतिःशास्त्रस्यापि शास्त्रान्तरत्वादेत- त्पठनार्थं व्याकरणेऽधिकारीति प्रागुक्तं युक्तमेवेति भावः । ननु शास्त्रान्तराध्ययने तस्य किं प्रयोजनमित्यतः कारणमाह—य इति । यस्मात्कारणाद्यः पिपठिषुर्वेदवदनं व्याकरणं सम्य- क्तत्त्वतो वेद जानाति स पिपठिषुर्वेदमाम्नायम् । अपिशब्दादर्थदुर्गमत्वादङ्गीभूतमित्यर्थः । वेद जानाति । अन्यशास्त्रं तदपेक्षया सुगमं जानातीत्यत्र किं वक्तव्यम् । व्याकरणस्य वेदमुख- त्वेन तदवगमात्संपूर्ववेदार्थज्ञानेऽनायासः । तेन शब्दार्थानां परिच्छिन्नत्वादिति भावः । स्यादेतत् । परं शास्त्रान्तरज्ञानं कुतो जायते इत्यत आह—सदनमिति । हि निश्चयेन । ब्राह्म्याः सरस्वत्याः सर्वशास्त्रमयरूपायाः सदनं गृहम् । व्याकरणं सरस्वतीगृहम् । शास्त्रस्य शब्दात्मकत्वात् । तथा च सकलशास्त्ररूपसरस्वत्या व्याकरणरूपगृहस्य तन्निवास- भूतस्य ज्ञाने सकलं शास्त्रस्वरूपसरस्वतीज्ञानं भवेदिति भावः ॥८॥ केदारदत्त :—सर्वप्रथम व्याकरण ज्ञान आवश्यक है—जिस छात्र ने सर्वशास्त्र मयी सरस्वती का मुख रूप व्याकरण शास्त्र का ज्ञान कर लिया है वह छात्र समग्र ज्ञान भण्डार वेद का भी ज्ञान कर सकता है, ऐसे सुयोग्य वैयाकरण छात्र के लिए अन्य शास्त्रों का ज्ञान भी और अधिक सुलभ हो जाता है ।
गोलप्रशंसाध्यायः ११ अतः कोई भी छात्र व्याकरण शास्त्र के ज्ञान के अनन्तर ही शास्त्रान्तर ज्ञान का उत्तम पात्र होता है। व्याकरण ज्ञान के अनन्तर ही अन्य शास्त्रों की ज्ञान कक्षा में प्रवेश समुचित होता है ॥८॥ अथाऽऽत्मनो गोलग्रन्थस्य प्रवृत्त्यर्थमन्योक्तिप्रकारेणाऽऽह— गोलं श्रोतुं यदि तव मतिर्भास्करीयं शृणु त्वं नो संक्षिप्तो न च बहुवृथाविस्तरः शास्त्रतत्त्वम् । लीलागम्यः सुललितपदः प्रश्नरम्यः स यस्माद् विद्वन् विद्वत्सदसि पठतां पण्डितोक्तिं व्यनक्ति ॥९॥ वा० भा०—स्पष्टम् ॥९॥ इति गोलप्रशंसाध्यायः । मरीचि :—ननु तथाऽपि लल्लश्रीपत्यादिकृतगोलग्रन्थानां सत्त्वात्तत्कृतो गोलग्रन्थो व्यर्थ इत्यतो मन्दाक्रान्तावृत्तेनाऽऽह—गोलमिति । हे विद्वंश्चतुर तव गोलं गोलाध्यायं श्रोतुं पठितुं बुद्धिर्यदि भवति । यदीत्यनेन प्रागुक्त- युक्त्या गोलाध्यायारम्भो व्यर्थो नेति त्वया निश्चितमन्यथा तत्पठनेच्छानुपपत्तेरिति सूचि- तम् । तर्हि भास्करीयं भास्कराचार्यनिर्मितमेनं गोलाध्यायं शृणु पठ । प्राचीनग्रन्थानां सत्त्वादत्राऽऽग्रहः कथमित्यत आह—स इति । यस्मात्कारणात्स भास्कराचार्यनिर्मितोऽयं गोलग्रन्थो विद्वत्सदसि पण्डितसभायां पठतां स्वपाठकपुरुषाणां पण्डितोक्तिं व्यनक्ति प्रकाशयति । पण्डितसभायामेतत्पठतस्तत्स्थाः पण्डितोऽयमस्तीति वदन्तीत्यन्यगोलं पठतस्तादृशोक्त्यनाश्रयत्वान्मदुक्तोऽयं गोलग्रन्थो न व्यर्थ इति भावः । पण्डितोक्तिं कुतो व्यनक्तीति भास्करीयगोलस्य विशेषणमाह—शास्त्र- तत्त्वमिति । सकलगोलग्रन्थसारभूतमित्यर्थः । अत्र हेतुभूतविशेषणद्वयमाह—नो इति । संक्षिप्तोऽल्पविचारो नो । बहुवृथाविस्तरो न च । व्यर्थोक्त्या विस्तृतोऽपि न कृत इत्यर्थः । नन्वेवं कठिनो भविष्यतीत्यत आह—लीलागम्य इति । किंचिदुपदेशेनैवैतद्बोधो भवतीत्यर्थः । अत्र हेतुगर्भं विशेषणमाह—सुललितपदप्रश्नरम्य इति । सुललितानि पदानि विद्यन्ते येषु ते च ते प्रश्नाः । गोलप्रश्नास्तै रम्यः । तथा च ललितपदैः पद्यानां दुर्गमार्थत्वाभावात्प्र- श्नतात्पर्यबोधेन तदुत्तरजिज्ञासयोत्तरपद्यान्यपि तादृशपदानि दुर्गमार्थानीति लीलागम्योऽयं गोलाध्याय इति भावः । प्रश्न इत्यनेन गोलप्रश्नाध्यायोऽत्र पृथक्समनन्तरमेवोक्त इति सूचितम् ॥९॥ ननु प्रतिज्ञातगोलाध्यायमुपेक्ष्येदमन्यदेव निरूपितमतः फक्किकयाऽऽह—इति श्रीसिद्धा- न्तशिरोमणौ गोलप्रशंसेति । कस्यचित्पाताधिकारातग्रन्थः शिरोमणिः । अयं ग्रन्थस्तु
१२ गोलाध्याये तद्भिग्नो गोलाध्याय इति भ्रमवारणार्थं सिद्धान्तशिरोमणावित्युक्तम् । पाताधिकारान्तमु- द्दिष्टसिद्धान्तपदार्थानामललिता (ता) नामनिरूपणात् । गोलाध्यायनिरूपणसंगतिरुक्तैतद्- ग्रन्थेनाग्रे गोलो निरूपयिष्यत इति न क्षतिः । दैवज्ञवर्यगणसंततसेव्यपार्श्वश्रीरङ्गनाथगणकात्मजनिर्मितेऽस्मिन् । याता शिरोमणिमरीच्यभिधे प्रशंसा गोलस्य सुज्ञगणकाभिमता समाप्तिम् ॥ इति श्रीसकलगणकसार्वभौमश्रीरङ्गनाथगणकसुतविश्वरूपापरनामक- मुनीश्वरगणकविरचिते सिद्धान्तशिरोमणिमरीचौ गोलप्रशंसा संपूर्णा ॥ केदारदत्तः—आचार्य अपने इस गोलाध्याय के अध्ययन के लिये छात्रों को प्रवृत्त कर रहा है—हे विद्वन् ! यदि आपकी गोलाध्याय पढ़ने की इच्छा है तो भास्कराचार्य विरचित इस गोलाध्याय को सुनिए अर्थात् पढ़िये । यतः पण्डित सभा में यह गोलाध्याय पाण्डित्य का प्रकाशक होता है, अर्थात् गोल- शास्त्र का पाठक छात्र ही पाण्डित्य पूर्णता से प्रत्येक पण्डित का विशेष आदरणीय हो जाता है । यह गोलाध्याय न तो अत्यन्त संक्षिप्त ही है और न क्रम प्राप्त बहुत विस्तार ही है । थोड़े ही उपदेश से छात्रों के लिए यह सुबोध मय हो जाता है । इस गोलाध्याय का गर्भ, सुललित पद और सुन्दर प्रश्नों से युक्त होने से बड़ी सरलता से ज्ञान लोलुप सुयोग्य शिष्यों के लिए अत्यन्त सरल है ॥९॥ इति सिद्धांतशिरोमणि गोलाध्याय–१ की पण्डित हरिदत्त ज्योतिर्विदात्मज पर्वतीय श्री केदारदत्त जोशी कृत सोपपत्तिक 'केदारदत्तः' हिन्दी व्याख्यान सम्पन्न ।
अथ गोलस्वरूपप्रश्नाध्यायः अथ भूसंस्थानप्रश्नं श्लोकद्वयेनाह— भ्रमद्भचक्रचक्रान्तर्गगने गगनेचरैः । वृता धृता धरा केन येन नेयमियादधः ॥१॥ किमाकारा कियन्माना नानाशास्त्रविचारणात् । कीदृग्द्वीपकुलाद्रीन्द्रसमुद्रैर्मुद्रितोच्यताम् ॥२॥ वा० भा०—इयं भूर्गगनेचरैः खेचरैर्वृता केन धृता सती गगने परितो वर्त- मानेऽधो नेयान्न गच्छेत् । कथमियं गगने स्थितेत्यवगतम् । यतो भ्रमद्भचक्र- चक्रान्तर्वर्तते । भानां चक्रं समूहः । भचक्रमेव चक्रं भचक्रचक्रम् । यदि भूमेर्मूर्ता- धारपरम्पराऽङ्गीक्रियते तदा समन्ताद्वर्त्तमानघनभचक्रस्याऽऽधारे स्खलितस्य भ्रमणं नोपपद्यत इत्यर्थः । तथा च सा भूः किमाकारा कियन्माना द्वीपानां कुला- चलेन्द्राणां च कीदृगवस्थानमिति सर्वं नानाशास्त्रविचारणात् । बौद्धादिप्रतिवादि- पक्षमधरीकृत्योच्यतामित्यर्थः ॥१॥२॥ मरीचिः—अथ य(मे)रुधिष्ण्यग्रहसंस्थितिरूपगोलनिरूपणस्योपपत्तिज्ञानोपजीव्यत्वेना- ऽऽरम्भणात्पूर्वग्रन्थसंगत्यवगमार्थमुपपत्तिप्रश्नरूपगोलप्रश्ननिबन्धनोऽयं प्रश्नाध्यायः । पूर्वाध्यायेन गणितपदार्थानां सामान्यतो ज्ञानातद्विशेषजिज्ञासोदयादवश्यंभावादयमेव पूर्वार्ध- खण्डनाध्यायत्वेन फलित इत्यवगम्यते । एतत्पदार्थतत्त्वज्ञानादृते यावत्खण्डनं न क्रियते तज्जि- ज्ञासकेन तावत्तस्य तत्तत्त्वप्रतिपादने सम्यगिच्छानुदयात् । गुरोस्तत्प्रतिपादनेच्छया शिष्याणां तत्तत्त्वबोधसंभवाधि(दि)त्यारम्भोऽयं प्रश्नाध्यायो व्याख्यायते । तत्र पूर्वाध्यायप्रतिपादित- ग्रहगणितोक्तव्यवश(ग)तभचक्रसंस्थानं तदुपजीव्यं निराकर्तुं तन्मध्यस्थितत्वेनावगतभूमि- गोलस्य निराधारस्याऽऽधारप्रश्नव्याजेन भूमेन्निराधारतामनुष्टुभा खण्डयति—भ्रमदिति । भ्रमद्भचक्रचक्रान्तः । भानामश्विन्यादिनक्षत्राणां चक्रं समूहस्तस्याऽऽश्रयीभूतं यच्चक्रं पाञ्चभौतिकं गोलाकारं वस्तु भ्रमतस्तद्गोलस्यान्तर्मध्ये गोलप्रदेशेभ्यस्तत्परिधिव्यासार्धेन यदेकं स्थानं तन्मध्यस्थिताकाशे जातं तद्गोलकेन्द्रं तत्र गगने स्थिता धरा गगनेचरैर्ग्र- हैश्चन्द्रबुधशुक्रसूर्यादिभिर्वृता समन्ताद्व्याप्ता । यथा नक्षत्राधिष्ठितगोलो भूमेः समन्ता- तुल्यान्तरेणास्ति तथा ग्रहास्तदन्तर्गताकाशे भूमेस्तुल्यान्तरेण भ्रमन्तीत्यर्थः । एतादृशीयं स्वाश्रयतया प्रत्यक्षा भूः केनाऽऽधारेण धृता तन्मध्यस्थाकाशविशेषस्थत्वेन सदा स्थिरेत्यर्थः । येनाऽऽधारेणेयं भूरधस्तन्मध्यस्थाकाशविशेषादधोभागे नेयान्न गच्छेत्तमाधारं वदेति शेषः ।
१४ गोलाध्याये अयमभिप्रायः । सृष्ट्वा भचक्रमित्यादिना भूमेः समन्तात्तुल्यान्तरेण नक्षत्रचक्रग्रहाः प्रवह- वाय्वाघातेनाऽऽकाश उदयस्तदर्शनान्यथानुपपत्त्या भ्रमन्तीति ज्योतिःशास्त्रतत्त्वज्ञैरुक्तं तन्न युक्तिसहम् । एतेषां भूमितोऽभितो ग्रहणे भूमेस्तन्मध्यस्थत्वानुपपत्तेः । नह्याधारं विनाऽऽकाशे किंचिदपि वस्तु प्रसिद्धम् । प्रत्युत गुरुत्वात्पतनमेव भूमेस्तेन भूसमन्ताद्भचक्रादीनां भ्रमणाऽनुपपत्तिः । यदि चाऽऽधारेणैव भूमिस्तद्गोलमध्यस्थैव तदा तदाधारस्याऽऽकाशस्त्वेन पतनसंभवादाधारान्तरमेवं तस्याप्येवमाधारपरम्परा भ्रमद्गोलप्रदेशविशेषसंलग्नेति तद्भ्र- मणानुपपत्तिः । तथा चैतद्भचक्रसंस्थानस्यायुक्तत्वात्तन्मूलकसर्वग्रहगणितायुक्त्युच्छेदः । उक्तग्रहगणितस्य ग्रहगत्युपजीव्यत्वात् । ग्रहगतेश्च पूर्वतोऽपरत्र भूमावाधारे वा प्रतिबन्ध- कत्वासंभवः । गणितस्यानियतविषयत्वाभावादिति । भ्रमद्भचक्रचक्रान्तरित्यनेन नक्षत्र- ग्रहस्वरूपसंस्थानप्रवहवाय्वादीनां प्रश्नोऽपि सूचितः ॥१॥ नन्वाधारपरम्परायामप्याधारग्रहनक्षत्राणि विभिद्य गच्छन्तीति तद्भ्रमणे बाधका- भावादगणितानुपपत्तिर्नेत्यतो भूमेः प्रश्नविशेषच्छलेन गणितैकदेशानुपपत्तिमत्तुष्टुभाऽऽह— भूः किमाकारेति । उच्यतां निर्णीतां भूमेराकारः कथमस्तीति विचारणीयम् । तथा च भुवो मुकुरोदराकारत्वस्य प्रत्यक्षसिद्धत्वेन सर्वदेशेषु युगपत्सूर्योदयास्तसंभावनया दिनमानभेदचर- देशान्तरानुपपत्तेः । क्षितिजभेदाभावात् । दिनमानादिभेदचरदेशान्तरोपपत्त्यर्थं क्षितिजभेदस्या- ऽऽवश्यकत्वेन तस्य गोलाकारत्वे सूपपन्नत्वात् । तन्मते भुवो गोलाकारत्वसिद्धौ प्रत्यक्षबाधो महान्दोष इति भावः । ननु यथा चन्द्रबिम्बात्मको गोलोऽस्माभिः शृङ्गोन्नत्युपजीव्योऽपि मण्डलाकारतया प्रतीयते तथैव भूगोलोऽपि केनचिद्दोषेणाऽऽदर्शाकारत्वेन प्रतीयत इति न दोष इत्यत आह—कियन्मानेति । भूः कियत् मानं प्रमाणं यस्याः । भूमिः कियद्योजन- परिमिताऽस्तीति निर्णीयताम् । नानाशास्त्रविचारणात् । अनेकशास्त्राणि पुराणज्योतिषार्ष- ग्रन्थादयस्तेषां विचारादेकवाक्यत्वरूपादित्यर्थः । तथा चानेकग्रन्थेषु सूर्यसिद्धान्ताद्यार्षार्य- भटब्रह्मगुप्तलल्लश्रीपतिभट्टकृतेषु पुराणेषु च भूमेर्माने परस्परमसंवादात्तदेकवाक्यताक- रणस्य ब्रह्मणोऽप्यशक्यत्वाच्चैकतरमाननिर्णयासंभवाद्भूमानजनितगणिताद्युच्छेदापत्तिः । ननु यत्परिध्यानीतं गणितं संवदति स एव भूपरिधिस्तेन न गणितोच्छेद इत्यत आह—कीदृ- [
(7 syllables): 13: – 14: – 15: u 16: – 17: – 18: u 19: – Wait! If 13 is –, 14 is –, 15 is u, 16 is –, 17 is –, 18 is u, 19 is –: Wait, in "कस्मात् पातः स्मृतः" or whatever is written: Look at: "कस्मात्" (or "कस्तात्") "पातः" "स्मृतः": If it is: कस् (13, –) मात् (14, –) पा (15, –) -> but 15 needs to be short! Wait! What is written? Look at the characters: क (ka) स्मा (sma) त (ta) त् (t) ? No, wait! Look at the letter: क स् मा त् ? No, wait, look at the word: Is it "कस्मात्"? Wait, look at: "क" "स्मा" "त्" "पा" "तः" "स्मृ" "तः" Wait, could it be "कस्मात्"? Let's look at the letter between क and पातः: It is: क, then स्, then त? Or स्, then मा? Wait, look at: "कस्तात्" Why would it
धिकरान्तराणां" or "निरस्तानांमधिकरान्तराणां"? Look at: "निरस्तानां" has an anusvara. Then "मधिकरान्तराणां" or "मधिकारा"? Wait, look at "धिकर": धि (dhi) क (ka) ा (aa) ?? Wait! Look at 'क': does it have an 'ा' matra? Line 14: 'म', 'धि', 'का', 'रा', 'न्त', 'रा', 'णां' -> Wait! Look between 'क' and 'र': There IS a vertical stem! It's 'का'! Wait, look: 'म' 'धि' 'का' 'रा' 'न्त' 'रा' 'णां'! Wait, let's look closely: म - धि - क - wait, is it 'का'? Compare 'का' in 'अधिकारयोः' (line 7): क + ा. In line 14: नि - र - स्ता - नां - [space] म - धि - का - रा - न्त - रा - णां Wait, is there an anusvara on 'नां'? Look above 'ना': yes, a clear dot: नां. Then 'म': standalone 'म'. Then 'धि'. Then 'का': wait, is