भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

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१२ गोलाध्याये तद्भिग्नो गोलाध्याय इति भ्रमवारणार्थं सिद्धान्तशिरोमणावित्युक्तम् । पाताधिकारान्तमु- द्दिष्टसिद्धान्तपदार्थानामललिता (ता) नामनिरूपणात् । गोलाध्यायनिरूपणसंगतिरुक्तैतद्- ग्रन्थेनाग्रे गोलो निरूपयिष्यत इति न क्षतिः । दैवज्ञवर्यगणसंततसेव्यपार्श्वश्रीरङ्गनाथगणकात्मजनिर्मितेऽस्मिन् । याता शिरोमणिमरीच्यभिधे प्रशंसा गोलस्य सुज्ञगणकाभिमता समाप्तिम् ॥ इति श्रीसकलगणकसार्वभौमश्रीरङ्गनाथगणकसुतविश्वरूपापरनामक- मुनीश्वरगणकविरचिते सिद्धान्तशिरोमणिमरीचौ गोलप्रशंसा संपूर्णा ॥ केदारदत्तः—आचार्य अपने इस गोलाध्याय के अध्ययन के लिये छात्रों को प्रवृत्त कर रहा है—हे विद्वन् ! यदि आपकी गोलाध्याय पढ़ने की इच्छा है तो भास्कराचार्य विरचित इस गोलाध्याय को सुनिए अर्थात् पढ़िये । यतः पण्डित सभा में यह गोलाध्याय पाण्डित्य का प्रकाशक होता है, अर्थात् गोल- शास्त्र का पाठक छात्र ही पाण्डित्य पूर्णता से प्रत्येक पण्डित का विशेष आदरणीय हो जाता है । यह गोलाध्याय न तो अत्यन्त संक्षिप्त ही है और न क्रम प्राप्त बहुत विस्तार ही है । थोड़े ही उपदेश से छात्रों के लिए यह सुबोध मय हो जाता है । इस गोलाध्याय का गर्भ, सुललित पद और सुन्दर प्रश्नों से युक्त होने से बड़ी सरलता से ज्ञान लोलुप सुयोग्य शिष्यों के लिए अत्यन्त सरल है ॥९॥ इति सिद्धांतशिरोमणि गोलाध्याय–१ की पण्डित हरिदत्त ज्योतिर्विदात्मज पर्वतीय श्री केदारदत्त जोशी कृत सोपपत्तिक 'केदारदत्तः' हिन्दी व्याख्यान सम्पन्न ।