सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४ गोलाध्याये गणित शास्त्र की उपपत्तिज्ञान रहित भूग्रहादिकों की यथास्थान स्थिति का तत्त्वज्ञान सूर्यसिद्धान्तादिक ग्रन्थों में संक्षिप्त होने से अनभिज्ञों को कठिनता से बोध होने के कारण उस संक्षिप्त ज्ञान का आचार्य द्वारा यहाँ पर इस ग्रन्थ में विशदीकरण किया जा रहा है। उपपत्तिज्ञान रहित भूग्रहादिकों की यथास्थान स्थिति का तत्त्वज्ञान सूर्यसिद्धान्तादिक ग्रन्थों में संक्षिप्त होने से अनभिज्ञों के लिए कठिनता से सुबोधक होता है, अतः आचार्य द्वारा उक्त संक्षिप्त ज्ञान का यहाँ पर इस ग्रन्थ में विशदीकरण किया जा रहा है। आचार्य ने यहाँ पर अनिर्वचनीय सरस्वती की उपमा नर्तकी स्त्री से की है। साधारण नर्तकी को जो नृत्य भूमि होती है वही यहाँ पर पण्डितों (गणितज्ञों) के मुख को ही नृत्य स्थान माना है। मुख में ही सरस्वती का निवास होने से, जैसे भाग्यवान् पुरुषों के घर के आंगन में कोई नर्तकी नाचती है वैसे ही पण्डितों के मुखरूप आंगन में सरस्वती रूपा नर्तकी नित्यमेव नृत्य करती है ॥१॥ अथ गोलग्रथनकारणमाह— मध्याद्यं द्युसदां यदत्र गणितं तस्योपपत्तिं विना प्रौढिं प्रौढसभासु नैति गणको निःसंशयो न स्वयम्। गोले सा विमला करामलकवत्प्रत्यक्षतो दृश्यते तस्मादस्युपपत्तिबोधविधये गोलप्रबन्धोद्यतः ॥२॥ वा० भा०—स्पष्टार्थम् ॥२॥ मरीचिः—ननु गोलनिरूपणारम्भः प्रयोजनाभावाद्व्यर्थ इत्यतः प्रतिज्ञातं गोलनिरूपणं सप्रयोजनं शार्दूलविक्रीडितेन प्रतिजानीते—मध्येति । तस्मात्कारणात्। अत्र सिद्धान्तग्रन्थ- पूर्वार्धे द्युसदां ग्रहाणां मध्याद्यं मध्यस्पष्टादिशदशविधं गणितं यत्प्रतिपादितं तस्य ग्रहगणित- निरूपकग्रन्थस्योपपत्तिबोधविधये तदुत्पा (पपा) दकयुक्तिरूपपत्तिस्तस्या ज्ञानार्थं यो विधिः प्रकारस्तन्निमित्तं गोलप्रबन्धोद्यतो गोलस्वरूपज्ञानप्रतिपादकग्रन्थसंदर्भार्थं गोलबन्धार्थं वा। अग्रे तद्बन्धस्योक्त (त्वात्)। अत एव पूर्वं गोलनिरूपणस्य प्रतिज्ञातत्वाद्वितीया गोलबन्ध- प्रतिज्ञा युक्ता। अन्यथा प्रतिज्ञायाः पुनरुक्तत्वापत्तेः। प्रवृत्तोऽस्मीति क्रियाबलादहमिति कर्त्राक्षेपः। तथा चोपपत्तिज्ञानं प्रयोजकत्वाद्गोलनिरूपणं व्यर्थं नेति भावः। नतूपपत्तिज्ञानार्थमुपपत्तिर्निरूपणीया न गोल इत्यतः सूचितं कारणमाह—गोल इति। सा उपपत्तिः। गोले निरूपिता गोले विमला निर्दूषणा प्रत्यक्षप्रमाणाद्दृश्यते ज्ञायते गोल- स्वरूपविद्भिर्गणकैरिति शेषः। प्रत्यक्षप्रमाणात्कथं ज्ञायत इत्यतो दृष्टान्तद्वारेणाऽऽह— करामलकवदिति। हस्तस्थितामलकफलं चाक्षुषप्रत्यक्षेण निश्चित्य मम हस्त आमलकोऽ- स्तीति ज्ञानं जा (जा) यते तद्वद्गोलस्वरूपं निश्चित्य तत्र क्षेत्रदर्शनस्य सुशकत्वादुपपत्तिः सुज्ञेया। तस्य गणितपदार्थस्वरूपाश्रयत्वेनोपपत्तिस्वरूपत्वादिति भावः। अत्राऽऽमलक- निदर्शनं गोलस्वरूपावगमार्थमिति ध्येयम्।