सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ११ ) विद्वान् गणितज्ञों एवं फलित ज्योतिषियों का भी इतिवृत्त वर्णित है। निःसन्देह में ज्योतिष के इतिहास आदि दृष्टि से पाठकों के लिए यह ग्रन्थ लाभाय है, साथ ही दीक्षित जी के अत्यन्त गहन अध्ययन और श्रम का परिचायक भी है । इस प्रकार से श्री भास्कराचार्य के पूर्व और परवर्ती ग्रह गणितज्ञों एवं फलित ज्योतिर्विदों के संक्षिप्त परिचय से विज्ञ पाठक अवश्य लाभान्वित होंगे । चिरप्रतीक्षित सिद्धान्तशिरोमणि 'ग्रहगोलाध्याय' भाग की सोपपत्तिक 'केदारदत्तः' व्याख्यान का हेतु इत्यादि भास्कराचार्य कृत समग्र “सिद्धान्त शिरोमणि” तथा इसका आचार्यकृत स्वयं का “वासना” भाष्य एवं साथ में आचार्य मुनीश्वर की “मरीचि” टीका जिसको मैं “खगोल ग्रह गणित का मरीचिभाष्य” कह रहा हूँ, यह सभी विषय संस्कृत भाषा के माध्यम से लिखे गये हैं। मेरी समझ से “मरीचिभाष्य” में समस्त ग्रन्थ का निशेष ग्रहगोल पाण्डित्य की उपलब्धि के अनन्तर किसी भी अन्य व्याख्यान की संस्कृत वाङ्मय में आवश्यकता नहीं है। फिर भी एक अनिवार्य अत्यन्त आवश्यकता थी भारत राष्ट्र की राष्ट्रभाषा “हिन्दी” माध्यम के एक बृहत्सोपपत्तिक व्याख्यान की । राष्ट्रभाषा “हिन्दी” अति जाग्रत हो चुकी है, सर्वतो वर्द्धमान है एवं सारे राष्ट्र में व्यापक होती हुई विश्व के अन्य देश-देशान्तरों में प्रसिद्धि पा रही है, इसमें सन्देह का स्थान नहीं है। अतएव संस्कृत वाङ्मय के ज्ञान भण्डार को राष्ट्रभाषा हिन्दी के माध्यम से यत्र-तत्र सर्वत्र प्रचारित एवं प्रसारित करना अत्यन्त आवश्यक है, इसी सत्प्रेरणा से प्रेरित होकर उक्त ग्रन्थ के “मरीचि” संस्कृत भाष्य के बाद श्री भास्कराचार्य के खगोल ग्रहगणित के कौशलपूर्ण गूढ़ आशयों को हिन्दी माध्यम से “राष्ट्र को समर्पण किया जाय” इस प्रकार की ऐसी मेरी चिरप्रतीक्षित इच्छा थी, जो वार्धक्य के कठिन से कठिनतम समय से गुजरते हुये भी सफल हो रही है जिसे मैं श्रद्धारूपिणी माता अन्नपूर्णा और विश्वास का एकमात्र स्थल पिता रूप बाबा विश्वनाथ का आशीर्वाद समझता हूँ । “सौधाकरीय” गुरु परम्परा से अधीत इस ग्रन्थ की अति महत्त्व की गणित की उपपत्तियाँ इस युग के अध्ययनाध्यापन में लुप्त प्रायः हो चुकी हैं उन्हें आज राष्ट्रभाषा हिन्दी माध्यम से प्रकाश में लाकर उक्त ग्रन्थ का सोपपत्तिक हिन्दी “केदारदत्तः” व्याख्यान जो मननशील विज्ञ पाठकों के लिए सन्तोषप्रद और रुचिकर भी अवश्य होगा । ऐसी मेरी शुभ आशा से यह प्रकाशन सफल हो पा रहा है । ध्यान देने की बात है कि “सोपपत्तिक केदारदत्तः” व्याख्यान गुरुमुख से शिष्य- मुख तक का एक स्वतन्त्र व्याख्यान है जिसमें किसी भी व्याख्यान, व्याख्या और भाष्य