भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

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गोलस्वरूपप्रश्नाध्यायः २३ त्यर्थः । पुनः सद्वृत्ततां सदाचारनिष्ठतां प्राप्नोतीति किं चित्रम् । शिष्टानुग्रहस्य तथात्वा- दिति भावः ॥१०॥ एवं खण्डने निरूपिते फक्किकायाऽऽह—इति गोलप्रश्नाध्याय इति । उद्दिष्टप्रश्न निरूपिता इति भ्रमवारणार्थं गोलेति । उद्दिष्टास्तु गणितप्रश्नाः सोत्तरास्ते ग्रन्थान्त उक्ताः । एते तु गोलस्थितपदार्थस्वरूपपृच्छात्मका अनुद्दिष्टा अपि संगत्यर्थं निरूपिता इति भावः ॥१०॥ दैवज्ञवर्यगणसंततसेव्यपार्श्वश्रीरङ्गनाथगणकात्मजनिर्मितेऽस्मिन् याता शिरोमणिमरीच्यभिधे समाप्तिं पूर्वार्धखण्डनमया खलु गोलपृच्छा ॥ इति श्रीसकलगणकसार्वभौमश्रीरङ्गनाथगणकसुतविश्वरूपापरनामकमुनीश्वर- गणकविरचिते सिद्धान्तशिरोमणिमरीचौ गोलप्रश्नाध्यायः संपूर्णः । केदारदत्तः—शृङ्गोन्नति में चन्द्रमा के क्षय और वृद्धि का हेतु—पौर्णमासी की रात्रि में सकलचन्द्रमण्डल रात्रि के अतिसंग से सुवर्तुलता को प्राप्त होते हुए भी रात्रि संग के अनन्तर चन्द्रशुक्ल की क्रमशः हानि से चन्द्रमण्डल पूर्ण वर्तुल न होकर कुवृत्त की तरह क्यों हो जाता है ? जैसे सदाचार निष्ठ ब्राह्मण, भ्रम से उत्पन्न पाप के संसर्ग से अपने ब्रह्म तेज की हानि से कुवृत्त होकर पुन स्त्रैविद्य पूर्ण अन्य ब्राह्मण के संसर्ग से सदाचार संलग्न होकर क्रमशः तेज वृद्धि से सदाचार सम्पन्न होते हुए सद्वृत हो जाता है। तद्वत् चन्द्रमा भी सूर्य के सामीप्य और सान्निध्यवश अपनी कलाओं से क्षीण और वर्द्धमान हो जाता है ॥१०॥ इति सिद्धान्त शिरोमणि ग्रहगोलाध्याय के गोलस्वरूपप्रश्नाध्यायः-२ की श्री पण्डित हरिदत्त ज्योतिर्विदात्मज पर्वतीय श्री केदारदत्त जोशी कृत सोपपत्तिक “केदारदत्तः” हिन्दी व्याख्यान सम्पन्न । •