सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ गोलाध्याये उत पार्श्वः साकल्यावधेः स्यादिति लघ्वार्यभट्टोक्तेः । मध्ये समन्तादण्डस्य भूगोलो व्योम्नि तिष्ठति । बिभ्राणः परमां शक्तिं ब्रह्मणो धारणात्मिकामिति सूर्यसिद्धान्ताच्चेति भावः ।।६।। केदारदत्तः—‘‘पृथ्वी अपनी शक्ति से आकाश में स्थित है’’ इस कथन की युक्ति से पुष्टि की जा रही है कि— जैसे सूर्य और अग्नि में स्वाभाविक उष्णता है, जैसे चन्द्रपिण्ड में शैत्यानुभूति होतो है, जल में द्रवता, (आर्द्रता) जैसे स्वाभाविक है, जैसे पत्थर में स्वतः काठिन्य है और वायु में स्वाभाविक गमनशीलता है उसी प्रकार पृथ्वो में अचलत्व स्वाभाविक है, अर्थात् वह आकाश में अपनो जगह यथास्थान स्थित है अर्थात् आकाश में पृथ्वी का केन्द्र बिन्दु यथास्थान स्थिर है । परमात्मा की यह अद्भुत शक्ति अतिविचित्र है और अवर्णनीय भी है । इसके बावजूद पृथ्वी में गुरुत्वाकर्षणशक्ति है जो आकाश के गुरु पदार्थों को खींचकर अपने धरातल में ले आती है । (Centre of attianction) पृथ्वी में यह एक ईश्वरदत्त गुरुत्वाकर्षणशक्ति सदा वर्त्तमान रहती है, जो आकाश में अपनी सीमा के भीतर भी किसी भी गुरु पदार्थ को खींचकर अपने धरातल में ले आती है और जो साधारण द्रष्टा को आकाशीय पदार्थों का पृथ्वी में गिरने का सा अनुभव होता है । पृथ्वी के चारों तरफ ही आकाश है आकाश में पृथ्वी यथास्थान स्थित है तो पृथ्वी आकाश में अपने स्थान से सरासर नीचे जा रही है ऐसी कल्पना का कोई तथ्यगत आधार नहीं है ।।५-६।। इदानीं बौद्धादियुक्तिमाह— भपञ्जरस्य भ्रमणावलोकादाधारशून्या कुरिति प्रतीतिः । खस्थं न दृष्टं च गुरु क्षमाऽतः खेऽधः प्रयातीति वदन्ति बौद्धाः ।।७।। द्वौ द्वौ रवीन्दू भगणौ च तद्वदेकान्तरौ वावुदयं व्रजेताम् । यदब्रुवन्नेवमनम्बराद्या ब्रवीम्यतस्तान् प्रति युक्तियुक्तम् ।।८।। वा० भा०—भूमेः समन्ताद्वर्त्तमानस्य भपञ्जरस्य भ्रमणान्यथानुपपत्त्या निरा- धारा भूरिति तेषां प्रतीतिरभूत् । तथाऽऽकाशस्थं गुरु वस्तु किमपि न दृष्टम् । भूरधो यातीति बौद्धा वदन्ति । यथा नौस्थो नावं गच्छन्तीमपि न वेत्ति तथा भूस्थो जनो न वेत्तीति । तथा द्वौ सूर्यौ । द्वौ चन्द्रमसौ । चतुष्पञ्चाशन्नक्षत्राणि । चतु- र्भुजस्तम्भनिभो मेरुः । एकान्तरकोणस्थौ सूर्यौ मेरुकोणवशेनेकान्तरौ तावुदयं गच्छत इति जैनाश्चाब्र वन् ।।७।।८।। Indological Truths