भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

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४८ गोलाध्याये दर्शनाच्च प्रतिपदं सूर्यदर्शने भूमिप्रदेश एव व्यवधायक इति प्रतिप्रदेशं दिनरात्रिभेदोपपत्तिः प्रत्यक्षेति न किंचिदपि गणितजातमनुपपन्नमिति ध्येयम् ॥१२॥ केदारदत्तः—पुराणों में पृथ्वी का स्वरूप समतल एक चतुर्भुजाकार एक आदर्श अर्थात् शीशा की तरह कहा गया है। उक्त प्रकार के पृथ्वी के स्वरूप के केन्द्र बिन्दु में मेरु पर्वत कहा गया है, मेरु पर्वत के चतुर्दिक् चारों तरफ एक लाख योजन व्यास मान का जम्बूद्वीप बताया गया है, जम्बूद्वीप के बाहर चारों तरफ क्षार सागर कहा गया है। पुनः दो लाख योजन दूरी पर अन्य द्वीप की संस्थिति कही गई है, तदनन्तर समुद्र तदनन्तर अन्य द्वीप संस्था इत्यादि वर्णन पुराणों में है। सातवें पुष्कर द्वीप के मध्य में वलयाकार मानस पर्वत कहा गया है। मानसपर्वत के शिर से एक लाख योजन की दूरी पर विषुवद्दिन में अर्थात् गोल मेष संक्रमण दिन में सूर्य का रथ-चक्र उत्तर गोल में उत्तर और दक्षिण भ्रमण करता है, इत्यादि प्रकार का सुविशद वर्णन पुराणों में वर्णित है जो सुलभ है दृष्टव्य है मननीय और विचारणीय भी है। यहाँ पर आचार्य पुराणों में कथित उक्त प्रकार के उल्लेख की चर्चा मात्र पर्याप्त समझ कर, क्वचित् पुराणों में वर्णित कुछ विषयों का ग्रहगणित खगोल से भी समन्वय होना आवश्यक समझ कर जो सही बात है उसे बताते हुये अव्यक्त रूप से खगोल ज्ञान की सर्वोपरिता व्यक्त कर रहे हैं। सीधी सी बात है कि आदर्श की तरह समतल पृथ्वी की कल्पना से सदोदित ही सूर्य का दर्शन होना चाहिए और वह सदा दिन ही रहना चाहिए—सूर्यास्त का प्रश्न ही नहीं उठता क्योंकि द्रष्टा पुरुष के दृष्टि पथ में दृश्य वस्तु के अवरोधक अन्य पदार्थ का अभाव हो जाता है। इत्यादि। किन्तु पृथ्वीवासी समाज सूर्योदय के बाद सूर्य का अस्त पुनः उदय इत्यादि दिन रात की ग्रहगोलीय गतिविधि प्रत्यक्ष देख कर ऐसी दशा सिद्ध होने पर पृथ्वी समतल आदर्शवत् न होकर गोलाकृतिक है अतः उदयक्षितिज से अस्त क्षितिज तक १८०° प्रदेशीय पृथ्वी समाज में सूर्यदर्शन तक दिन, गोल के अधोभाग १८०° तक में सूर्य का अदर्शन अर्थात् रात्रि का अनवरत क्रम चल रहा है पृथ्वी के गोलाकार होने की यह एक प्रबल युक्ति है। इस सम्बन्ध के और भी अनेक विषय यथा स्थान आगे स्पष्ट होंगे। यहाँ पर यदि मेरुपर्वत से ढका हुआ सूर्य है तो रविराच्छादक मेरुपर्वत का भी दर्शन होना चाहिए वह मेरु पर्वत कहाँ है ? आगे स्पष्ट होगा। यदि कहिये मेरु के किनारे से सूर्योदय होता है तो प्राची दिशा के उत्तर तरफ ही सदा सूर्य का उदय देखा जाना चाहिए क्योंकि मेरु पर्वत उत्तर में ही है, यह भी नहीं होता क्योंकि दक्षिण दिशाओं के भूपृष्ठ में भी सूर्योदय प्रकृत्या यत्र तत्र दृष्टिगत होता है ॥११॥१२॥