सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १० ) ६ ० ६ ० ६ ० ६ ० ———————— ६ ६ ६ ६ ० अंकभेद ज्ञानगणित में तुल्य अंकों के पृथक् भेदों से समग्र भेदों में भाग देने से लब्ध तुल्य अंक के सही भेद होते हैं। जैसे—४८५५५ यही अंक है तो पूर्व नियमानुसार १×२×३×४×५ = १२० भेद होते हैं। किन्तु ५५५ इनके १×२×३ = ६ भेदों से १२० में भाग देने से १२०/६ = २० भेद होंगे अतः ४८५५५, ४५८५५, ४५८८५.... २४ के तुल्य लिखकर योग करना कठिन होने से ४+८+५+५+५ = २७ को भेद से गुणाकर अंक स्थान ५ से भाग देने पर (२७ × २०) / ५ = १०८ को एक स्थान से हटाकर ५ जगह लिखकर योग १०८ १०८ १०८ १०८ १०८ १०८ —————————————— १ १ ९ ९ ९ ९ ८ ८ के तुल्य अंक योग हो जाते हैं। आज के युग में गणितविद्या के इस गणितसागर का नाम संभवतः स्टैटिक्स कहा जाता होगा ? भास्कराचार्य इस गणित के विषय में कहते हैं— “न गुणो न हरो, न कृतिर्नघनः पृष्टस्तथापि दुष्टानाम्। गर्वितगणकबहूनां स्यात्पातोऽवश्यमङ्कपाशेऽस्मिन् ॥” अर्थात् इस गणित में गुणन भजन वर्ग रचना··· आदि कोई नियम न होने पर भी गणिताभिमानी, गर्वी गणितज्ञों के लिये यह एक शिर झुकाने का विषय अवश्य हो जाता है। श्री भास्कराचार्य के अप्रतिम गणित पाण्डित्य प्रकाशन पर कुछ विद्वान लेखकों, शोधकर्ताओं ने अपने प्रकाशनों पर “लीलावती” ग्रन्थ के सम्बन्ध में ‘लीलावती’ नामक भास्कराचार्य की कन्या का उल्लेख किया है। जिसे देखकर क्लेश व कष्ट होना स्वाभाविक है। ग्रन्थ के आमूलचूड़ अध्ययन की उपेक्षा होने से लेखकों आदि द्वारा