सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
पृष्ठ 18, कुल 723 में से
संदर्भ में पढ़ें( ११ ) "लीलावती को भास्कराचार्य की कन्या है" ऐसा कहना बड़ा भ्रामक एवं तथ्यों से बहुत दूर हैं । अतएव उदाहरणार्थ 'लीलावती' ग्रन्थ के कतिपय चमत्कारिक प्रश्नों के हल के साथ यत्र-तत्र आये हुये सम्बोधनों आदि का उल्लेख विज्ञपाठकों के मनन तथा विचारार्थ प्रस्तुत कर रहा हूं— १--अंकों के योग उदाहरण के अवसर पर भास्कराचार्य अपनी 'लीलावती' नामक पत्नी से प्रश्न करते हैं— "अये बाले ! लीलावति ! मतिमति ब्रूहि सहितान् !" इत्यादि २, ५, ३२, १९३, १८, १० और १०० अंकों का एकीकरण कितना होगा ? साथ ही 'शतोपेतानेतानयुत वियुतांश्चापि वद मे । यदि व्यक्ते युक्तिर्व्यवकलन मार्गेऽसि कुशला' । उक्त योगांक को १००० में घटाने से क्या फल होगा ? एक ही श्लोक में अंको के स्थानीय मानो के अनुसार योग और अंतर का अत्यंत सुन्दर उदाहरण उपस्थित किया गया है । ( योग, ३६० इसे १००० में घटाने से अंतर = ६४४ ) २—"सखे नवानां च चतुर्दशानां ब्रूहित्रीहीनस्य शतत्रयस्य । पंचोत्तरस्याप्ययुतस्य वर्गं जानासि चेद्वर्गविधानमार्गम् ॥ उपरोक्त श्लोक में भास्कराचार्य कह रहे हैं कि हे मित्र ( सखे ) यदि तुम वर्ग करने की विधि जानते हो, तो ९, १४, २९७ और १०००५ का वर्ग बताओ ? यदि लीलावती उनकी पुत्री होती तो वे पुत्री या लीलावती सम्बोधन कर सकते थे न कि सखे ! सम्बोधन करते । ३—इसी प्रकार अन्यत्र भी सखे ! सम्बोधन का व्यवहार किया गया हैं । "नवघनं त्रिघनस्य घनं तथा कथयस्यपञ्चघनस्य घनञ्च में । घन पदं च ततोऽपि घनात्सखे । यदिघनेऽस्ति घना भवतो मतिः ॥ अर्थात हे सखे घनमूल जानने में यदि तेरी बुद्धि घनी है तो ९ का घन और ३ के घन का २७ का घन का और ५ के घन १२५ का घन आगत अंको का धनमूल भी बताओ । ४—व्यस्त गणित के उदाहरण में— यस्त्रि घ्नस्त्रिभिरन्वितः स्वचरणैर्भक्त स्ततः सप्तभिः स्वत्र्यंशेन विवर्जितः स्वगुणितो हीनो द्विपञ्चाशता । तन्मूलेऽष्टयुते हृतेऽपि दशभिर्जातं द्वयं ब्रूहि तं राशिं वेत्सि हि चंचलक्षि ! विमलं बाले ! विलोमक्रियाम् ॥