भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

पृष्ठ 175, कुल 723 में से

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भुवनकोशः ७३ में सुगन्ध पर्वत, पश्चिम में विपुल और उत्तर में सुपार्श्व नाम की आधार शिलाएँ विद्य- मान हैं । इन आधार शिलाओं में क्रमशः कदम्ब, जम्बू (जामुन) वट और पीपल के वृक्ष सुशोभित हैं । विशाल जम्बू वृक्ष के सुन्दर पके फलों से द्रवित एकीभूत रस से जम्बू नदी बहती है जिससे इलावृत सम्बन्धिनी मृत्तिका (मिट्टी) रसयुक्त होकर सुवर्णमय हो जाती है अतएव सुवर्ण का नाम जाम्बूनद कहा गया है तथा तत्र स्थित देव योनि के जीव अमृत से भी अधिक सुस्वादु जम्बू रस का पान करते रहते हैं । इस रस के पान से देवगण अपने शरीर को सुवर्णमय कर लेते हैं । मेरु के उक्त उन चार आधार पर्वतों के पूर्व के मन्दर पर्वत में चैत्ररथ, दक्षिण के गन्धमादन में अप्सराओं व नन्दनन्दनों का विहार स्थान, पश्चिम के विपुल पर्वत में धृतिसंज्ञक वन, और उत्तर के सुपार्श्व नामक पर्वत (मेरु का आधारपर्वत) वैभ्राज संज्ञक वन में अनेक प्रकार के पक्षियों में मयूर-हंस-शुक-सारिकादि पक्षिगण सुखपूर्वक विहार करते रहते हैं । उक्त वन सम्पत्तियों में अनेक प्रकार के सुन्दर (१) अरुण, (२) मानस, (३) महाह्रद और (४) श्वेतजल नामक चारों तरफ चार सरोवर हैं जिनमें देवगण अप्सरा गणों के साथ जल विहार की आनन्दानुभूति लेते रहते हैं । मेरु की तीन चोटियाँ सुन्दर हैं, रत्न और सुवर्णमय सुशोभित हैं । जिसके एक शिखर (चोटी) में विष्णु भगवान् का वैकुण्ठ नगर, दूसरी चोटी पर ब्रह्मा का शातकुम्भ नामक नगर और मेरु पर्वत की तीसरी चोटी पर आशुतोष भगवान् शङ्कर की नगरी सुशोभित है । पूर्व में कथित नगरों के अधो (नीचे) भाग में अर्थात् मेरु पर्वत के चारों तरफ की आठों की दिशाओं में और आठ ८ नगर बसे हैं— (१) मेरु के पूर्व भाग में इन्द्र की अमरावती नगरी, (२) अग्नि कोण में वह्नि की तेजोवती नाम की नगरी, (३) दक्षिण भाग में यमराज की संयमिनी नाम की नगरी, (४) नैऋत्य दिशा में राक्षसों की कृष्णाङ्गना नामक नगरी, (५) पश्चिम भाग में वरुण की श्रद्धावती नाम नगरी, (६) वायु दिशा में वायु देवता की गन्धवती नामक नगरी, (७) उत्तर दिशा में कुबेर की महोदया नामक नगरी और (८) और ईशान में महेश्वर भगवान् शिव की यशोवती नामक नगरी स्थित है । तथा अधोभाग में दश दिक्पालों की मध्यभाग में सिद्ध महात्माओं को नगरी है ॥३१॥३२॥३३॥३४॥३५॥३६॥ तत्रान्यं विशेषमाह— विष्णुपदी विष्णुपदात् पतिता मेरौ चतुर्धाऽस्मात् । विष्कम्भाचलमस्तकशतस्तरःसंगताऽऽगता वियता ॥३७॥

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