सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८२ गोलाध्याये निरक्ष देशीय खमध्य का, अर्थात् भूमध्य रेखा के साथ याम्योत्तरवृत्त का सम्पात बिन्दु का नाम निरक्ष खमध्य बिन्दु होता है। एक व्यासार्ध गोल के एक धरातल के गोल में दो बड़े वृत्तों का सम्पात दो जगह होने से उक्त वृत्तों का दूसरे सम्पात स्थान का नाम अधो खमध्य होता है। किसी भी खमध्य से ९० (नब्बे) अंश की दूरी पर किये गये वृत्त का नाम उस खम- ध्यीय भू-स्थान का क्षितिज वृत्त होता है। यहाँ पर निरक्ष देशीय क्षितिज का नाम उन्मण्डल गोल परिभाषा से स्पष्ट है। निरक्ष देशीय क्षितिज के साथ निरक्ष देशीय पूर्वापर वृत्त (नाडी वृत्त या विषुवद्वृत्त) के सम्पात बिन्दु का नाम पूर्व स्वस्तिक और पश्चिम स्वस्तिक होता है। इस प्रकार निरक्ष स्थानीय लङ्का का स्थान भूमध्य में होने से, पूर्वस्वस्तिक का नाम यमकोटि, पश्चिम स्वस्तिक का नाम रोमक पत्तन, और अधो स्वास्तिक का नाम गोल परिभाषा से सिद्धपुर कहना समीचीन है। अतः पूर्वस्वस्तिक रूप यमकोटि के खमध्यगत सूर्य बिम्ब की स्थिति से, यमकोटि में में मध्याह्न, लङ्का में सूर्योदय, रोमकपत्तन में अर्द्ध रात्रि, और सिद्धपुर में सूर्यास्त का होना गोल रीति से सुस्पष्ट होता है। अभी तक पुराणों के मतानुसार आचार्य ने मेरु पर्वत की सविशेष स्थिति पूर्व व्याख्यानों में स्पष्ट कर दी है किन्तु गोलीय नियमानुसार 'मेरु' की वस्तुस्थिति कहाँ है ? और उसका अपर नाम क्या है ? इत्यादि विषयों को यहाँ पर आचार्य गोल दृष्टि से और अधिक स्पष्ट कर रहे हैं। भू पृष्ठीय समाज का जो कोई जीव पृथ्वी पर जो जहाँ स्थित है, उस बिन्दु की पूर्व दिशा में वहाँ का सूर्योदय बिन्दु है, और उस बिन्दु की ९० अंश दूरी पर पश्चिम दिशा वहाँ का सूर्यास्त सिद्ध होता है, यह एक साधारण नियम है। सूत्र से ही प्राची प्रतीची दिशा का ज्ञान आचार्य ने··· 'तत्कालापमजीवयोर्विवरात्' इसी ग्रन्थ के ग्रहगणिताध्याय के त्रिप्रश्ना- धिकार में स्थल विशेष पर स्पष्ट कर दिया है। सूर्योदयास्त बिन्दुगत पूर्वापर रेखा पर लम्ब रूप याम्योत्तर रेखा में उत्तर एवं दक्षिण ध्रुव बिन्दु होते हैं जो गोल क्षेत्र से सुस्पष्ट है। इन्हीं दोनों उत्तर दक्षिण बिन्दुओं का अपर नाम सुमेरु (उत्तरध्रुव) कुमेरु (दक्षिण ध्रुव) कहा गया है। एक दिन की क्रान्ति गति शून्य मान कर सायन मेषादि तुलादि में सूर्योदयास्त बिन्दु द्वयगत पूर्वापर धरातलीय रेखा पर लम्ब रूप रेखा के उत्तर शीर्ष में उत्तर और दक्षिण शीर्ष में दक्षिण ध्रुव समीचीन सिद्ध होते हैं। प्राचीन आचार्य एक रेखा पर दूसरी रेखा को लम्ब रूप करने में रेखान्त और रेखादि बिन्दुओं से नवत्यंश वृत्तों के सम्पात द्वय पर रेखा को याम्योत्तर रेखा कहते थे।