भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

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भुवनकोशः ८९ केदारदत्तः —अक्षांश रहित भूपृष्ठीय देशों में अर्थात् निरक्ष देशों में रहने वाले प्राणी उत्तर और दक्षिण ध्रुव को अपने क्षितिज में देखते हैं। क्योंकि निरक्ष देशीय भूपृष्ठ खमध्य से ९०° अंश की दूरी पर जो वृत्त बनेगा वह निरक्षदेशीय क्षितिज कहा जाता है। अथवा उसका दूसरा नाम ऊनमण्डल भी कहते हैं जो गोल परिभाषा से स्पष्ट है। इसलिये निरक्ष देशीय मानव, भ्रमणशील नक्षत्र चक्र को अपने मस्तक के ऊपर पश्चिमाभिमुख जल यन्त्र की तरह देखता है। निरक्ष देश से जैसे जैसे उत्तर दिशा की ओर नर का अभियान जब होगा तो दक्षिण दिशाभिमुख नक्षत्र मण्डल नत दिखाई देता है। इसलिये कि उत्तरध्रुवाभिमुख भूपृष्ठ देश जो निरक्ष खमध्य से उत्तर अक्षांशस्थ हैं अर्थात् स्वदेशीय खमध्य से निरक्ष देशीय खमध्य अक्षांश तुल्यान्तर से दक्षिण को नत हुआ है। ऐसी स्थिति में याम्योत्तर वृत्त में ध्रुव से अपने खमध्य तक उठा हुआ ध्रुव का उन्नतांश = लम्बांश, और खमध्य से निरक्षखमध्य तक अक्षांश तुल्य ध्रुव का नतांश होता है। योजनात्मक अक्षांश से भूपरिधियोजन ज्ञान त्रैराशिक से किया जा रहा है। जैसे— उपपत्तिः—यदि भूपरिधि योजन में अंशात्मक ३६०° उपलब्ध होते हैं तो निरक्ष व स्वखमध्य द्वयान्तर तुल्य अपसार योजन में उपलब्ध अंश = अक्षांश सिद्ध होते हैं। ३६०° × अपसार योजन ────────────────── = अक्षांश । भूपरिधि योजन तथा अक्षांश और भूपरिधि योजन ज्ञान से भूपरिधि योजन × अक्षांश ──────────────────── = स्वनिरक्ष खमध्यों की योजनात्मक अन्तरित ३६० दूरी सिद्ध होती है ॥४८॥४९॥५०॥ अतस्तत्र ध्रुवर्क्षसंस्थानमाह— सौम्यं ध्रुवं मेरुगताः खमध्ये याम्यं च दैत्या निजमस्तकोर्ध्वे । सव्यापसव्यं भ्रमदृक्षचक्रं विलोकयन्ति क्षितिजप्रसक्तम् ॥५१॥ इदानीं भूपरिधिमानं प्राक्कथितमपि विशेषार्थमनुवदति स्म— प्रोक्तो योजनसंख्यया कुपरिधिः सप्ताङ्गनन्दाब्धय-४९६७ स्तद्व्यासः कुभुजङ्गसायकभुवः सिद्धांशकेनाधिकाः १५८१ १/२४ पृष्ठक्षेत्रफलं तथा युगगुणत्रिंशच्छराष्टाद्रयो ७८५३०३४ भूमेः कन्दुकजालवत्कुपरिधिव्यासाहतेः प्रस्फुटम् ॥५२॥